हिंदी पत्रकारिता दिवस लोकतंत्र का प्रहरी और समाज का दर्पण,वरिष्ठ पत्रकार रिज़वान अहसन की कलम से

हिंदी पत्रकारिता पर आईरा न्यूज़ विशेष,,,,30 मई, हिंदी पत्रकारिता दिवस पर हर साल हम उस गौरवशाली परंपरा को याद करते हैं जिसने आम आदमी की आवाज को सत्ता के गलियारों तक पहुंचाया। 30 मई 1826 को पंडित जुगल किशोर शुक्ल ने कलकत्ता से ‘उदन्त मार्तण्ड’ नाम से पहला हिंदी समाचार पत्र प्रकाशित कर हिंदी पत्रकारिता की नींव रखी थी। यह सिर्फ एक अखबार नहीं, बल्कि गुलामी के दौर में जन-जागरण का पहला बिगुल था।
आज 199 साल बाद हिंदी पत्रकारिता सिर्फ कागज तक सीमित नहीं रही। डिजिटल मीडिया, यूट्यूब चैनल, न्यूज पोर्टल और सोशल मीडिया के जरिए हिंदी पत्रकारिता गांव की चौपाल से लेकर वैश्विक मंच तक पहुंच गई है। कोरोना काल में जब हर तरफ अफवाहें थीं, तब हिंदी के पत्रकारों ने ही जमीनी हकीकत सामने रखकर लोगों को जागरूक किया। चाहे किसान आंदोलन हो या बाढ़-भूकंप जैसी आपदा, हिंदी पत्रकारिता ने हमेशा जनता के दुख-दर्द को प्रमुखता से उठाया।
चुनौतियों के दौर में जिम्मेदारी और बढ़ी
आज के दौर में फेक न्यूज, पेड न्यूज और टीआरपी की होड़ ने पत्रकारिता की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े किए हैं। ऐसे में हिंदी पत्रकार की जिम्मेदारी और बढ़ जाती है। उसे खबर के साथ-साथ सत्य, निष्पक्षता और जनसरोकार को भी जिंदा रखना है।
वरिष्ठ पत्रकार रिज़वान अहसन बोले – हिंदी पत्रकारिता संघर्ष का दूसरा नाम
इस मौके पर आईरा न्यूज़ नेटवर्क के उत्तराखंड प्रदेश प्रभारी और वरिष्ठ पत्रकार रिज़वान अहसन* ने कहा, “हिंदी पत्रकारिता कभी आसान नहीं रही। उदन्त मार्तण्ड से लेकर आज के डिजिटल युग तक, हर दौर में हिंदी के पत्रकारों ने संघर्ष किया है। आज जरूरत है कि हम खबर को खबर रहने दें। सनसनी के बजाय संवेदना, और विचारधारा के बजाय सच्चाई को जगह दें। उत्तराखंड जैसे पहाड़ी राज्य में हिंदी पत्रकार ही गांव-गांव की आवाज बनता है। हमारी कलम तब तक नहीं रुकनी चाहिए जब तक आखिरी व्यक्ति तक न्याय न पहुंच जाए।”
उन्होंने आगे कहा कि “नए पत्रकारों को तकनीक के साथ-साथ जमीनी रिपोर्टिंग का हुनर भी सीखना होगा। मोबाइल और कैमरा सबके पास है, लेकिन खबर की परख और भाषा की शुद्धता ही एक पत्रकार को अलग पहचान देती है। आईरा न्यूज़ नेटवर्क उत्तराखंड में निष्पक्ष और निर्भीक पत्रकारिता के लिए प्रतिबद्ध है।”
हिंदी पत्रकारिता दिवस सिर्फ एक तारीख नहीं, बल्कि आत्ममंथन का दिन है। यह दिन हमें याद दिलाता है कि पत्रकारिता मिशन है, कमीशन नहीं। जब तक समाज में आखिरी व्यक्ति की आवाज दबाई जाएगी, तब तक हिंदी पत्रकार की कलम चलती रहेगी। लोकतंत्र को मजबूत करने के लिए हिंदी पत्रकारिता का निष्पक्ष, निर्भीक और जनपक्षधर बने रहना बेहद जरूरी है।


















