नई दिल्ली

खड़गे के नकारा चेहरों को देख वरिष्ठ कांग्रेसी नाराज,आम कार्यकर्ताओं में निराशा

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खड़गे के नकारा चेहरों को देख वरिष्ठ कांग्रेसी नाराज, आम कार्यकर्ताओं में निराशा

  • एआईसीसी की नई बोगस टीम से प्रधानमंत्री मोदी का मुकाबला नामुमकिन
    रितेश सिन्हा, (वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक)।
    कांग्रेस ने शनिवार को अपनी नई राष्ट्रीय कार्यकारिणी गठित की। कांग्रेस संगठन में कई नियुक्तियां की गई जिसमें पार्टी की नई रणनीति का प्रभाव छोड़ने वाली कोई बात नजर नहीं आती। इतना जरूर हुआ है कि कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं को दूर रखा गया है। वहीं दूसरे दल से आए नेताओं को महत्वपूर्ण पद जरूर मिला। सर्वाधिक आलोचना मोहन प्रकाश, अविनाश पांडे और देवेंद्र यादव की नियुक्तियों को लेकर है। अपने-अपने क्षेत्रों में कार्पोरेटरों का चुनाव तक नहीं जीतने वाले इन प्रभावहीन कांग्रेसी चेहरे को दिग्गज की श्रेणी में डाल दिया गया। इन पर टिकटों की खरीद-फरोख्त से लेकर संगठन को बर्बाद करने तक के गंभीर आरोप लगे हैं। जनता पार्टी के टिकट पर 77 में विधानसभा का एक बार मुंह देखने वाले मोहन प्रकाश अब बिहार के प्रभारी बनाए गए। दिवंगत अहमद पटेल की खोज मोहन प्रकाश पूर्व में महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश जम्मू-कश्मीर के प्रभारी भी रहे जहां कांग्रेस का बेड़ा गर्क हुआ। यूपी के प्रभार के दौरान स्क्रीनिंग के चेयरमैन बनाए गए थे।
    मोहन प्रकाश ने पकड़-पकड़ कर जनता पार्टी और जनता दल के लोगों को टिकट और ओहदा दिलवाया। ये सभी चुनाव भी लड़े और गायब भी हो गए। आम कांग्रेसियों की आरोपों पर ध्यान दें तो चुनाव में टिकटार्थियों के साथ चुनावी फंड में इनका हिस्सा भी तय था। कांग्रेस तभी से जीरो पर खड़ी है। वे मध्य प्रदेश में भी अपना कमाल दिखा चुके हैं। जिलेवार उन पर आब्जर्बर भेजकर वसूली के आरोप लगे थे। तत्कालीन कांग्रेसी नेता ज्योतिरादित्य सिंधिया के द्वारा सबूत और आरोप की लंबी सूची सौंपने के बाद राहुल ने इन्हें जबरन महासचिव पद से हटाया था। तब से राजनीतिक वनवासी के रूप में मोहन प्रकाश सपा और राजद के चक्कर काट रहे थे। लालू यादव और मोहन प्रकाश दोनों एक जमाने में चौधरी देवीलाल के पट्ठे कहे जाते थे।
    लालू अपनी जमीनी राजनीति के कारण बिहार में टिक गए। मोहन प्रकाश यूपी की राजनीति से होते हुए राजस्थान में उठापटक कर दिल्ली में बस गए। अपना कोई राजनीतिक क्षेत्र और आधार नहीं बना पाए। लालू का आश्वासन और पैरवी अब काम आ गया। नीतीश कुमार के खड़गे को आंख दिखाने के बाद उनके करीबी प्रभारी भक्तचरण दास को चलता किया गया। वर्तमान में बिहार कांग्रेस अध्यक्ष लालू के ही प्यादे हैं। उनके खिलाफ नेता और कार्यकर्ता लामबंद हो रहे हैं। अखिलेश सिंह के हटने की खबरों के बीच लालू ने प्रभारी के तौर मोहन प्रकाश को प्रभारी बनवा कर कांग्रेस को फिर से अपनी जेब में रख लिया। राहुल गांधी तो अखिलेश के प्रदेश अध्यक्ष बनने के साथ से ही नाराज चल रहे हैं। दो-दो बार बिहार के नेताओं की मीटिंग बुलाने के बाद राहुल के अड़ियल रवैये से बैठक स्थगित होती रही है। ऐसी स्थिति में लालू ने खड़गे के जरिए मोहन प्रकाश को बिहार का प्रभार दिलवाकर बड़ी राहत की सांस ली है।
    महासचिव अविनाश पांडे भी कांग्रेस का बदनुमा चेहरा रहे हैं। यहां तक कि टिकट बेचने के आरोप में बिहार, उत्तराखंड और राजस्थान में खासा बदनाम रहे। लो और दो की राजनीति में आज भी वे शिखर पर हैं। अपने निवास और निकाय क्षेत्र नागपुर में कार्पोरेटर तक नहीं चुनवा पाने की हैसियत रखने वाले अविनाश पांडे को यूपी जैसे बड़े राज्य में प्रभारी महासचिव बनाया गया। वे कितना कर पाएंगे, ये तो खड़गे ही बता पाएंगे। इसी कड़ी में देवेंद्र यादव का नाम भी शामिल है। दिल्ली में कार्पोरेटर तक की हैसियत खो बैठे देवेंद्र यादव राजस्थान, बिहार, उत्तराखंड में अपनी राजनीति के जौहर दिखा चुके हैं। उत्तराखंड में तो कांग्रेस की जीती हुई बाजी को हार में बदलने का उन्हें अच्छा-खासा अनुभव है। ये लाभ अब कांग्रेस को पंजाब में मिलने वाला है।
    प्रियंका गांधी भी महासचिव बनाई गई। इस कांग्रेसी नेत्री को प्रचार मंत्री का दर्जा मिल गया। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे को प्रधानमंत्री बनाने के लिए प्रियंका अब पश्चिम बंगाल में ममता, बिहार में लालू-नीतीश, यूपी में अखिलेश, तमिलनाडू में स्टालिन के लिए बतौर प्रचार मंत्री वोट मांगेंगी। इनका रोड मैप संदीप सिंह अपने जेएनयू के घिसे-पिटे चेले-चपाटे के साथ बनाएंगे। खड़गे और उनके नाकाबिल सिपाहसलारों ने पूर्व कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी को एक बार फिर से सड़क नापने का ठेका दिया है। संसद में मोदी को देखकर मुस्कुराने वाले ईवीएम पर चुप्पी साधने वाले कांग्रेस अध्यक्ष के लिए टीम राहुल सड़क पर उतरकर उनके आसमानी ख्वाब को जमीन पर उतारने की कोशिश करेंगी।
    पूर्व महासचिव तारिक अनवर से कमरा खाली करवाने का इंतजाम भी कर लिया गया। कांग्रेस मुख्यालय के इसी कमरे से कौमी तंजीम का दफ्तर बनाकर तारिक अपना सियासी कारोबार चला रहे थे। तारिक अपने पूर्व कार्यकाल में कांग्रेस पर बोझ ही साबित हुए जिससे खड़गे ने पीछा छुड़ा लिया। खड़गे ने एक समय में कांग्रेसी रहे गुलाब नबी आजाद की सिफारिश पर जीए मीर को महासचिव बनवा दिया। अब तक कांग्रेस अध्यक्ष से मिलने के लिए भटक रहे कांग्रेसियों ने राहत की सांस ली। कांग्रेस अध्यक्ष के कार्यालय का प्रभार सांसद नासिर हुसैन के साथ प्रणव झा को दिया गया। अब तक एआईसीसी के खड़गे के नाम पर दो-चार लोग अपनी दुकान सजाए हुए थे, उन्हें जरूर झटका मिला है।
    अहमद पटेल के समय का दबदबा किश्तों टूट रहा है। मनीष चतरथ को भी बाहर का रास्ता दिखाया गया है। चतरथ अब तक का व्यवहार कांग्रेस अध्यक्ष को डिक्टेट करने वाला रहा था। गुरदीप सिंह सपल को बैठाकर कांग्रेस कार्यालय की एडमिन की जवाबदेही चतरथ से छीन ली गई। उत्तर-पूर्व राज्य का प्रभारी का दर्जा छीन कर उनके कमरे खाली करने का इंतजाम कर लिया गया है। खुद को स्वयंभू महासचिव समझने वाले दिग्विजय सिंह और बड़ी जिम्मेदारी का ख्वाब पालने वाले कमलनाथ को इनके जिलों तक सीमित करने का पूरा इंतजाम किया गया। छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री बघेल और राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री गहलोत को भी उनकी औकात में समेटते हुए संगठन से बाहर का रास्ता दिखाया गया है। अब तक ये कांग्रेसियों में तोप बने घूम रहे थे। छत्तीसगढ़ में कांग्रेस को सत्ता से बाहर करवाने की जिम्मेदार मानी जाने वाली कुमारी शैलजा अब उत्तराखंड में पार्टी को देखेंगी।
    खड़गे ने भूपेंद्र सिंह हुड्डा परिवार के मशविरे को शैलजा को हरियाणा की राजनीति से दूर रखते हुए देवभूमि का प्रभार दिया। वहीं राजस्थान की राजनीति से बाहर करते हुए सचिन पायलट को महासचिव बनाते हुए छत्तीसगढ़ का प्रभार दिया गया। कोषाध्यक्ष माकन के खिलाफ थोड़े समय में ढेर सारी शिकायतों को गंभीरता से लेते हुए उनके साथ मिलिंद देवड़ा और इंद्रजीत सिंघला को लगाया गया। पवन बंसल की कमी आम कांग्रेसी कार्यकर्ताओं को खल रही है। उनके प्रति कार्यकर्ताओं में सहानुभूति है। अक्सर कमर दर्द का बहाना कर माकन सामान्य कांग्रेसियों से मिलने में कतराते रहे हैं। मिलिंद भविष्य में माकन को रिप्लेस भी कर सकते हैं। मिलिंद पूर्व कांग्रेस अध्यक्ष राहुल और उनकी टीम की पसंद हैं। सिंघला पहले कोषाध्यक्ष रह चुके दिवंगत मोती लाल वोरा के साथ भी काम कर चुके हैं। कांग्रेस की संपत्तियों की देखभाल का जिम्मा उनके पास रहा है। महासचिवों की नियुक्तियों के बाद अगली कड़ी में कांग्रेस की हालिया विधानसभा चुनावी हार की वजह से एक दर्जन सचिवों पर भी गाज गिरना तय है। सबसे अधिक चर्चित नाम चंदन यादव और सीपी मित्तल का है। इन पर छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश में पार्टी की हार सुनिश्चित करवाने की बड़ी सुपारी लेने का संगीन आरोप लग रहा है। चंदन को नासिर बचा पाएंगे, इसमें संदेह है। विश्लेषकों का मानना है कि खड़गे की इस नई बोगस टीम से प्रधानमंत्री मोदी का मुकाबला नामुमकिन है।
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