वाराणसी/उत्तरप्रदेशशहर

स्वदेशी प्रथाओं और आधुनिक मनोवैज्ञानिक नवाचारों पर अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन

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कुलपति प्रो. अजित कुमार चतुर्वेदी ने कहा है कि मानसिक स्वास्थ्य आज विश्वविद्यालयों के समक्ष सबसे प्रमुख चुनोतियों में से एक है और इसके समाधान के लिए प्रभावी उपाय किए जाने की आवश्यकता है। कुलपति जी मनोविज्ञान विभाग द्वारा आयोजित अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी “स्वदेशी प्रथाएं और आधुनिक मनोवैज्ञानिक इनोवेशन: स्वास्थ्य और कल्याण को बढ़ावा देने के लिए फासले कम करना”, को संबोधित कर रहे थे।
इस सम्मेलन का आयोजन इंटरनेशनल एसोसिएशन ऑफ एप्लाइड साइकोलॉजी (IAAP) के सहयोग से किया गया है। सम्मेलन का उद्देश्य स्वदेशी ज्ञान प्रणालियों और समकालीन मनोवैज्ञानिक नवाचारों के बीच के फासले को कम करते हुए स्वास्थ्य एवं कल्याण को बढ़ावा देना है।
गुरुवार को उद्घाटन सत्र को संबोधित करते हुए प्रो चतुर्वेदी ने कहा कि विश्वविद्यालय विभिन्न इकाइयों और हितधारकों के सहयोग एवं समर्थन से एक अधिक सहयोगात्मक और तनावमुक्त वातावरण बनाने का प्रयास कर रहा है, जहाँ विद्यार्थी बिना किसी भय के खुलकर अपने विचार व्यक्त कर सकें। उन्होंने मनोवैज्ञानिकों, शोधकर्ताओं और शिक्षाविदों का आह्वान किया कि वे अपने शोध निष्कर्षों को शैक्षणिक दायरे से बाहर साझा करें और समाज में प्रत्यक्ष योगदान दें। सम्मेलन के विषय में कुलपति जी ने मनोवैज्ञानिक शोध में स्वदेशी एवं सांस्कृतिक प्रथाओं को शामिल किए जाने की सराहना की और कहा कि ऐसे दृष्टिकोण विज्ञान को समृद्ध करते हैं। उन्होंने कहा कि विज्ञान हमें हर चीज़ को साथ लाने के लिए प्रेरित करता है और यदि स्वदेशी तथा सांस्कृतिक प्रथाओं को शामिल किया जाता है, तो यह निश्चित रूप से विज्ञान को समृद्ध करेगा और नए सिद्धांतों के विकास का मार्ग प्रशस्त करेगा।
मुख्य अतिथि, दक्षिण बिहार केंद्रीय विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति प्रो. जनक पांडेय ने क्रॉस-कल्चरल साइकोलॉजी पर अपने विचार रखते हुए इसे एक महत्वपूर्ण उपलब्धि बताया, जिसमें भारतीय विद्वानों की उल्लेखनीय भूमिका रही है। अपने संबोधन में उन्होंने औपनिवेशिक मानसिकता को चुनौती देने की आवश्यकता पर जोर दिया, जो स्वदेशी ज्ञान की उपेक्षा करती है और स्थानीय विद्वानों के योगदान को कम आँकती है। उन्होंने कहा कि हमें संस्कृति और संदर्भ का ध्यान रखना चाहिए तथा केवल भारत ही नहीं, अपितु सभी देशों के विद्वानों के योगदान को पढ़ना और समझना चाहिए।
ब्रुनेल यूनिवर्सिटी ऑफ लंदन में मनोविज्ञान की प्रोफेसर ऑफ साइकोलॉजी तथा सेंटर फॉर कॉग्निटिव एंड क्लिनिकल न्यूरोसाइंस की निदेशक प्रो. वीना कुमारी ने “नींद की कमी और इसके न्यूरोप्लास्टिसिटी, संज्ञानात्मक कार्यप्रणाली एवं मानसिक स्वास्थ्य पर प्रभाव” विषय पर अपना वक्तव्य प्रस्तुत किया, जिसमें उन्होंने समकालीन मनोवैज्ञानिक शोध में इसकी बढ़ती प्रासंगिकता पर प्रकाश डाला।
स्वागत उद्बोधन प्रो. योगेश कुमार आर्या, विभागाध्यक्ष, मनोविज्ञान विभाग, द्वारा दिया गया। प्रो. तुषार सिंह ने सम्मेलन की थीम पर चर्चा करते हुए इसके प्रमुख उद्देश्यों पर प्रकाश डाला। उन्होंने मानसिक स्वास्थ्य एवं कल्याण के लिए अधिक नैदानिक एवं समग्र दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता पर बल देते हुए कहा कि “परंपरा विज्ञान से संवाद करती है।”
सत्र का प्रमुख आकर्षण प्रो. शालिनी मित्तल एवं प्रो. तुषार सिंह द्वारा लिखित पुस्तक “भारत में एसिड अटैक: पीड़ितों का प्रतिनिधित्व और उनका पुनर्वास” का विमोचन रहा।
उद्घाटन व्याख्यान की अध्यक्षता प्रो. राकेश पांडेय एवं प्रो. पूर्णिमा अवस्थी, काशी हिंदू विश्वविद्यालय ने की। उद्घाटन कार्यक्रम का समापन काशी हिंदू विश्वविद्यालय के प्रो. जय रंजन द्वारा प्रस्तुत धन्यवाद ज्ञापन के साथ हुआ।
इस अवसर पर इंटरनेशनल एसोसिएशन ऑफ एप्लाइड साइकोलॉजी (IAAP) की अध्यक्ष प्रो. लॉरी फोस्टर, पूर्व अध्यक्ष प्रो. क्रिस्टीन रोलां-लेवी तथा निर्वाचित अध्यक्ष प्रो. पेड्रो नेवेस भी उपस्थित रहे।
तीन दिवसीय अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन के पहले दिन का समापन डॉ. दुर्गेश कुमार उपाध्याय एवं उनकी टीम द्वारा प्रस्तुत सांस्कृतिक कार्यक्रमों के साथ हुआ। सम्मेलन में 150 से अधिक प्रतिनिधियों ने प्रत्यक्ष रूप से तथा 300 से अधिक प्रतिभागियों ने ऑनलाइन माध्यम से भाग लिया। आगामी दिनों में सम्मेलन के अंतर्गत विभिन्न वैज्ञानिक सत्र एवं संगोष्ठियाँ आयोजित की जाएँगी तथा शनिवार को वैलेडिक्टरी सत्र के साथ सम्मेलन का समापन होगा।

Sallauddin Ali

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