नई दिल्ली

तिकड़मी दिग्विजय की फर्जी चिट्ठी,इस्तीफे का खेल

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तिकड़मी दिग्विजय की फर्जी चिट्ठी, इस्तीफे का खेल
रितेश सिन्हा (वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक
विश्लेषक)।
विधानसभा चुनाव के लिए मध्यप्रदेश कांग्रेस की पहली सूची घोषित होते ही दिग्विजय सिंह की चिट्ठी वायरल हो गई, जिसे कुछ घंटों के बाद दिग्गी ने फर्जी बताते हुए इसे भाजपा की शरारत करार दिया। पूर्व मुख्यमंत्री व राजनीति के घाघ दिग्विजय सिंह ने पुलिस में इसकी शिकायत दर्ज कराने की घोषणा की, लेकिन अब तक सूबे के किसी थाने में इस प्रकार की कोई शिकायत दिग्विजय के द्वारा नहीं दी गई, न ही दिल्ली में अपने आवास के थाने जिसका पता उनके लेटर हेड पर है, कोई शिकायत दर्ज नहीं की गई है। अलबत्ता मध्य प्रदेश कांग्रेस ने डाक्टर हितेश बाजपेयी के ट्वीटर हैंडल पर वायरल पत्र की प्रति को आधार बनाकर शिकायत के नाम पर लीपापोती जरूर की गई है।
डीसीपी, साइबर सेल, पुलिस थाना कोहेफिजा, भोपाल को भेजे शिकायती पत्र का क्रमांक 2908/23, दिनांक 15/10/2023 है, जिसमें शिकायत करने की वास्तविक समय नहीं उद्धृत किया गया है। शिकायत कितनी गंभीर है कि तीन पदाधिकारी जिनके नाम योगेंद्र सिंह परिहार, केके मिश्रा और जेपी धनोपिया हैं, उन्होंने शिकायत पत्र लिखा है। अब तक दिग्विजय सिंह के तथाकथित पत्र पर कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने इस मामले में चुप्पी साधी हुई है। वहीं मीडिया में गड़गड़ा रहे दिग्विजय सिंह और पुलिस में शिकायत दर्ज कराने की बात कहने वाले गंभीर नेता अब तक खुद इस बाबत कोई शिकायत तक दर्ज नहीं करा पाए। कांग्रेस कार्यालय में कार्यकर्ताओं और नेताओं की कानाफूसी पर अगर गौर करें तो ये दिग्विजय सिंह का यह राजनीतिक पैतरा है जो पुराना पड़ चुका है।
इस मसले को 24 घंटे से अधिक समय बीत चुका है। मीडिया में बयानवीर दिग्विजय सिंह बोल तो बहुत कुछ गए हैं, मगर कुछ करने के लिए सोच में डूबे हैं। फर्क इतना जरूर पड़ा कि कुछ सीटों पर दवाब बनाकर अपने चहेतों को दिलाने में कामयाब हो जाएंगे। अब तक जारी सूची में दिग्विजय सिंह के चहेतों के नाम गायब हैं। दिग्विजय ने 2019 का लोकसभा का चुनाव भोपाल से लड़ा था और भाजपा की साध्वी प्रज्ञा ठाकुर से बुरी तरह हार गए थे। अब तक जारी पहली सूची उनके समर्थकों के नाम नदारद हैं। दिग्विजय के चाहने वाले एक भ्रम फैलाते आए हैं कि मध्य प्रदेश में उनकी मजबूत पकड़ है, जो जमीनी हकीकत से कोसों दूर है।
वर्तमान विधायक और कमलनाथ सरकार में मंत्री पी.सी. शर्मा, गोविंदपुरा सीट पर रविन्द्र साहू झूमरवाला सहित कई नाम हैं, जो दिग्गी का झंडा उठाए प्रचार कर रहे थे, अब कमलनाथ के यहां तार जोड़ने में जुटे हैं। भाजपा ने पलटवार करते हुए इसे दिग्विजय सिंह की दबाव एवं तिकड़म की राजनीति करार दिया है। मध्य प्रदेश में अब हीरो से जीरो बने हुए दिग्विजय सिंह कांग्रेस संगठन में हो रहे बदलाव को देखते हुए पार्टी के महासचिव बनने को बेकरार हैं। ये उनको एक बड़ा मौका हाथ लगा है। कभी राहुल का स्वयंभू झंडाबरदार बताने वाले दिग्विजय सिंह हर तरह से हाशिए पर हैं।
उन्हें सीडब्लूसी में जगह तो मिली है, लेकिन पार्टी महासचिव बनने के लिए हर दांव मारने को तैयार हैं। अतिउत्साही और वक्त-बेवक्त कुछ भी बोलने वाले दिग्विजय की बौखलाहट लाजिमी है। पहले भी दिग्विजय जुबानी स्तर पर इस्तीफे की पेशकश करते रहे हैं, लेकिन अब उनके दांव को टीम राहुल बेहतर तरीके से समझ रही है और कनिष्क सिंह के साथ उनके रिश्तों में दूरी स्पष्ट दिखती है। कांग्रेस अध्यक्ष खड़गे और उनकी टीम उनसे खासे नाराज हैं। जोड़-तोड़ में माहिर जरूर दिग्गी धरातलीय राजनीति पर कभी कामयाब नहीं दिखे।
यूथ कांग्रेस में दिग्विजय सिंह पहला पद दिलाने वाले पूर्व मंत्री अरूण सिंह ‘‘मुन्ना‘‘ ने उन्हें राजनीति में स्थापित किया था। एक जमाने में ‘‘मुन्ना‘‘ मध्य प्रदेश के प्रभारी भी थे। जातिवादी राजनीति के समीकरण में दिग्गज अर्जुन सिंह ने दिग्विजय को यूथ कांग्रेस का कोषाध्यक्ष बनवा दिया था। राष्ट्रीय स्तर पर भी यूथ कांग्रेस में कोषाध्यक्ष पद कभी नहीं रहा, मगर अपवाद स्वरूप दिग्गी को बिठाया गया। दिग्विजय ने अर्जुन सिंह से नजदीकी का फायदा उठाया और उनके छोटे बेटे अजय सिंह के साथ रिश्तेदारी गांठ ली जिसके बाद उन्होंने उन्होंने भरपूर राजनीतिक लाभ लिया। मौके की ताक में दिग्गी ने अर्जुन सिंह की राजनीतिक विरासत को हड़प लिया।
पलटीमार दिग्विजय एक समय कांग्रेस अध्यक्ष के सलाहकार जितेंद्र प्रसाद के दरबारी बन गए और अपनी मुख्यमंत्री की कुर्सी भी बचायी। जब सीएम दिग्विजय सिंह अपनी दूसरी पारी खेल रहे थे, कांग्रेस ने मध्यप्रदेश में बड़े जाट नेता राजेश पायलट के नेतृत्व में तीन सदस्यीय दल को चुनावी सर्वेक्षण करने के लिए भेजा। वहां भी अर्जुन विरोधी पायलट को दिग्गी फांसने में कामयाब रहे। पायलट कमिटी की रिपोर्ट में आलाकमान को बताया गया कि 6 महीने पहले सीएम बदलने से पार्टी को कोई लाभ नहीं होगा। इसकी बजाए विधायकों के काम का आकलन करने के बाद ही उन्हें पार्टी दुबारा उम्मीदवार बनाए।
उसके बाद दिल्ली हाईकमान ने अपनी टीम मप्र भेजी जिसमें इनमें हरियाणा के चौधरी वीरेंद्र सिंह जो वर्तमान में भाजपा में हैं, दूसरे महाराष्ट्र के बड़े क्षत्रप व पूर्व सांसद नरेश पुगलिया जैसे खुर्राट नेता शामिल थे। इस टीम ने दिग्विजय खेमे के 40 प्रतिशत विधायकों का टिकट काटा जिसका परिणाम हुआ कि कांग्रेस की दोबारा सरकार बन गई। दिल्ली में अर्जुन सिंह विरोधी खेमा सक्रिय था, जिसमें अहमद पटेल और अंबिका सोनी ने दोबारा दिग्गी को मुख्यमंत्री बनाने में मदद की। दिग्विजय के संगठन में प्रभावी रहते कांग्रेस सूबे में उबर नहीं सकेगी, ऐसा आम कांग्रेसियों का मानना है।
कभी गांधी परिवार के सबसे करीबी रहे और कांग्रेस की सरकार बनाने वाले ज्योतिरादित्य सिंधिया के पार्टी छोड़ने की मुख्य वजह दिग्विजय सिंह ही थे। बतौर महासचिव यूपी और बिहार के प्रभारी रहते संगठन को बर्बाद करने में सबसे बड़ी भूमिका निभाई, ऐसा मानने वाले इन दोनों राज्यों में हर जिले में मौजूद हैं। आज इन्हीं की बदौलत यूपी और बिहार में कांग्रेस का आंकड़ा इकाई और दहाई में सिमटा हुआ है। उनकी राजनीतिक अपरिपक्वता की वजह से लगातार चौथी बार शिवराज सिंह चौहान सूबे में मुख्यमंत्री बने। इन बीतों वर्षों में दिग्विजय ने कोई सरकार विरोधी आंदोलन नहीं किया।
अल्पसंख्यक नेता भी इनकी बयानबाजी से असहज महसूस करते हैं। गोवा और मणिपुर में कांग्रेस की बदहाली के जिम्मेदार दिग्विजय को मानते हुए उन्हें इन दोनों राज्य के प्रभारी पद से हटा दिया गया था। कांग्रेस के गर्दिश के दिनों में भी लोकसभा चुनाव की बजाए राज्यसभा सांसद बनते आए। अब देखना है कि इस विधानसभा चुनाव के बहाने दिग्विजय सिंह कौन सा शगूफा छोड़ते हैं और दवाब की अपनी रणनीति में कितने कामयाब होते हैं, ये तो वक्त बताएगा। एक बात तय है कि दिग्विजय सिंह, कमलनाथ को मुख्यमंत्री बनने लायक छोड़ेंगे इसमें संदेह है। ऐसे नेताओं ने ही कांग्रेस की लुटिया डुबोयी है।

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