काशीपुर-उत्तराखण्ड़

रामपुर तिराहा कांड: 32 साल बाद CBI कोर्ट का फैसला, फर्जी हथियार बरामदगी में 3 पुलिसकर्मी दोषी

WhatsApp Image 2026-04-18 at 09.08.39
previous arrow
next arrow

काशीपुर / देहरादून / उत्तराखंड (रिज़वान अहसन ),,,,,,उत्तराखंड राज्य आंदोलन के सबसे चर्चित और संवेदनशील रामपुर तिराहा गोलीकांड से जुड़े फर्जी हथियार बरामदगी मामले में 32 वर्ष बाद न्याय की दिशा में एक बड़ा फैसला सामने आया है। मुजफ्फरनगर की विशेष सीबीआई अदालत ने मंगलवार को तत्कालीन छपार थानाध्यक्ष बृजकिशोर, कांस्टेबल उमेश चंद और अनिल कुमार को दोषी करार दिया है। *कोर्ट का फैसला* विशेष सीबीआई अदालत के पीठासीन अधिकारी डी.के. फौजदार ने तीनों आरोपियों को डेढ़-डेढ़ वर्ष के कठोर कारावास और 21-21 हजार रुपये के अर्थदंड की सजा सुनाई। अधिवक्ता अनुराग वर्मा ने बताया कि यह फैसला उत्तराखंड आंदोलन से जुड़े लोगों के लिए न्याय की महत्वपूर्ण जीत है।*क्या था पूरा मामला* 1-2 अक्टूबर 1994 को अलग उत्तराखंड राज्य की मांग को लेकर हजारों आंदोलनकारी दिल्ली के राजघाट की ओर कूच कर रहे थे। मुजफ्फरनगर के रामपुर तिराहा पर पुलिस ने उन्हें रोक दिया। विवाद के बाद पुलिस ने लाठीचार्ज, आंसू गैस और फायरिंग की, जिसमें कई आंदोलनकारियों की मौत हुई और अनेक घायल हुए। उस दौरान पुलिस पर आंदोलनकारी महिलाओं के साथ दुष्कर्म और छेड़छाड़ के गंभीर आरोप भी लगे थे।*फर्जी बरामदगी का आरोप* घटना के बाद पुलिस ने अपनी कार्रवाई को सही ठहराने के लिए दावा किया कि आंदोलनकारियों के पास से अवैध तमंचे, कारतूस और अन्य हथियार बरामद हुए थे और उन्होंने पुलिस पर फायरिंग की थी। इसी आधार पर कई मुकदमे दर्ज किए गए।*CBI जांच में खुली साजिश की परतें* इलाहाबाद हाईकोर्ट के आदेश पर मामले की जांच CBI को सौंपी गई। जांच में सामने आया कि आंदोलनकारियों से हथियार बरामद होने का दावा पूरी तरह फर्जी था। CBI ने पाया कि जब्ती मेमो तैयार कर झूठे साक्ष्य बनाए गए और गवाहों से दबाव में हस्ताक्षर कराए गए थे। जांच एजेंसी ने निष्कर्ष निकाला कि आंदोलनकारियों को बदनाम करने और अदालत को गुमराह करने के लिए यह पूरी कहानी रची गई थी।*इन धाराओं में चली सुनवाई* इसके बाद CBI ने तत्कालीन SHO बृजकिशोर, कांस्टेबल उमेश चंद और अनिल कुमार के खिलाफ फर्जी दस्तावेज तैयार करने, धोखाधड़ी, जालसाजी और आपराधिक साजिश सहित विभिन्न धाराओं में चार्जशीट दाखिल की।*आंदोलनकारियों की प्रतिक्रिया* करीब तीन दशक तक चली कानूनी प्रक्रिया के बाद आए इस फैसले को उत्तराखंड आंदोलन के इतिहास में एक महत्वपूर्ण पड़ाव माना जा रहा है। आंदोलनकारियों और उनके परिजनों का कहना है कि भले ही न्याय मिलने में लंबा समय लगा, लेकिन आखिरकार सच की जीत हुई। यह फैसला केवल तीन पुलिसकर्मियों की सजा तक सीमित नहीं है, बल्कि यह संदेश भी देता है कि कानून से ऊपर कोई नहीं है और झूठे साक्ष्य बनाकर न्याय व्यवस्था को गुमराह करने वालों को अंततः जवाबदेह होना पड़ता है।

RIZWAN AHSAN

50% LikesVS
50% Dislikes

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button