AIRA NEWS NETWORK – 80 – 90 के दशक में हम जैसे गरीब परिवारों के बच्चो पर घर वाले जब कभी कभी ज्यादा खुश हो जाया करते थे या दुकान से खरीद कर कुछ खाने के लिए कई बार माँगने पर कभी कभी कभार 50 पैसे या 1 रुपये का सिक्का दे दिया करते थे।
आज जिस तरह से भारतीय बाजार में से महंगाई बढ़ने के 50 पैसे और 1 रुपये के सिक्के विलुप्त हुए है और 100 200 500 2000 के नोटो ने अपनी जगह बनाई है ठीक उसी प्रकार से होली दीपावली के त्योहारों पर समाज मे आपसी भाईचारे और नैतिकता में भी सामाजिक स्तर पर विलुप्तता / गिरावट आई है।
जैसे जैसे दिल्ली एनसीआर में करीब 2 से 3 दशकों में गरीब और मध्यम वर्ग के लोगो के पास अचानक कई अलग अलग स्रोतों से पैसा ( कुछ क्षेत्र के लोगो के पास खेती के मुआवजो के पैसे सहित ) और तथाकथित अमीरी ( लोन पर चलने वाली जिंदगी ) आयी है तब से भी समाज मे आपसी भाईचारे और नैतिकता में भी गिरावट आयी है और कमर्शियल / व्यवसायिक / स्वार्थ से परिपूर्ण तथाकथित / हमदर्दी दिखाने वाले दोस्तो / रिश्तेदारो में पूर्ण बहुमत की सरकारे बनवाने की तरह अवसर देखकर पार्टी और पार्टियों के बड़े नेताओं में आस्था जताने वालो की बाढ़ सी आयी है, सिक्का बेशक छोटा है मगर सन्देश बड़ा है।
राजीव कुमार शर्मा, मानव अधिकार पक्षकार


















