बिजनौर-उत्तरप्रदेश

परमवीर चक्र विजेता अब्दुल हमीद की याद मे-फैसल खान(जिला अध्यक्ष आईरा इंटरनेशनल)

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हमारे देश के वीर जवानों ने एक नहीं कई बार पाकिस्तान की सेना को मुंहतोड़ जवाब दिया है. चाहे 1965 का युद्ध हो, 1971 का या कारगिल युद्ध सभी में भारत को विजय मिली. आज हम एक ऐसे वीर की कहानी बताने जा रहे हैं, जिन्होंने अकेले दम पर पाकिस्तान की सेना को छठी के दूध याद दिला दिए थे. जी हां, हम बात कर रहे हैं परमवीर चक्र विजेता अब्दुल हमीद की, जिन्होंने युद्ध में शहीद होने से पहले पाकिस्तानी सेना के आठ पैटन टैंको को नष्ट कर लड़ाई का रुख पलट दिया था. पाकिस्तान को भागना पड़ा था और इस तरह से भारतीय सेना को विजय मिली थी.

उत्तर प्रदेश के गाजीपुर जिले में हुआ था जन्म
अब्दुल हमीद का जन्म 1 जुलाई 1933 को उत्तर प्रदेश के गाजीपुर जिले के धामूपुर गांव में हुआ था. उनके पिता मोहम्मद उस्मान पेशे से दर्जी थे. सेना में आने से पहले अब्दुल हमीद अपने पिता के काम में मदद किया करते थे. हमीद 20 साल की उम्र में वाराणसी में सेना में भर्ती हुए थे.

पहला युद्ध चीन से लड़े थे
निसाराबाद ग्रिनेडियर्स रेजिमेटंल सेंटर में प्रशिक्षण के बाद 1955 में हमीद 4 ग्रेनेडियर्स में तैनात कर दिए गए. 1962 में भारत-चीन युद्ध में उन्होंने थांग ला से 7 माउंटेन ब्रिग्रेड, 4 माउंटेन डिविजन की ओर से भाग लिया. वीर अब्दुल हमीद की पत्नी रसूलन बीवी के अनुसार सेना में भर्ती के बाद पहला युद्ध अब्दुल ने हमीद चीन से लड़ा और जंगल में भटक कर कई दिनों तक भूखे रहकर किसी तरह घर आए थे, जहां पत्ता तक खाना पड़ा था.

पंजाब में थे तैनात
चीन से युद्धविराम के बाद हमीद अंबाला में कंपनी क्वार्टर मास्टर हवलदार नियुक्त हुए. 8 सितंबर 1965 को जब पाकिस्तान ने भारत पर हमला किया, उस समय हमीद पंजाब के तरनतारन जिले के केमकरण सेक्टर में तैनात थे. वह पाकिस्तान के साथ युद्ध से पहले 10 दिन के लिए छुट्टी पर घर आए थे. रेडियो से सूचना मिली तो हड़बड़ी में जंग के मैदान में जाने को बेताब हो गए. घर वाले मना करते रह गए, जाते वक्त कई अपशगुन हुए उनकी बेडिंग खुल गयी, साइकिल पंचर हो गयी लेकिन भोर में वो निकल ही गए और जिस जांबाजी से उन्होंने लड़ाई लड़ी वो फिर सबको पता है.

ध्वस्त कर दिए थे पैटन टैंक
पाकिस्तान ने उस समय के अमेरिकन पैटन टैंकों से खेमकरण सेक्टर के असल उताड़ गांव पर हमला कर दिया. उस वक्त ये टैंक अपराजेय माने जाते थे. लेकिन अब्दुल हमीद ने कम संसाधनों के बावजूद भी पाकिस्तान सेना में तबाही मचा दी. अब्दुल हमीद की जीप 8 सितंबर 1965 को सुबह 9 बजे चीमा गांव के बाहरी इलाके में गन्ने के खेतों से गुजर रही थी. वह जीप में ड्राइवर के बगल वाली सीट पर बैठे थे. उन्हें दूर से टैंक के आने की आवाज सुनाई दी. कुछ देर बाद उन्हें टैंक दिख भी गए. वह टैंकों के अपनी रिकॉयलेस गन की रेंज में आने का इंतजार करने लगे और गन्नों की आड़ का फायदा उठाते हुए फायर कर दिया. अब्दुल हमीद के साथी बताते हैं कि उन्होंने एक बार में 4 टैंक उड़ा दिए थे. उनके 4 टैंक उड़ाने की खबर 9 सितंबर को आर्मी हेडक्वॉर्टर्स में पहुंच गई थी. उनको परमवीर चक्र देने की सिफारिश भेज दी गई थी.

वतन की हिफाजत के लिए हो गए शहीद
अब्दुल हमीद ने 10 सितंबर को तीन और टैंक नष्ट कर दिए थे. जब उन्होंने एक और टैंक को निशाना बनाया तो एक पाकिस्तानी सैनिक की नजर उन पर पड़ गई. दोनों तरफ से फायर हुए. पाकिस्तानी टैंक तो नष्ट हो गया, लेकिन अब्दुल हमीद की जीप के भी परखच्चे उड़ गए. इस तरह से भारत माता के लाल वतन की हिफाजत के लिए शहीद हो गए.

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