कभी तो पुलिस के दर्द को भी समझिए साहब

शीर्षक: वर्दी के पीछे छुपा दर्द—कभी पुलिस वाले के दिल में उतर कर तो देखिए्
सलाउद्दीन अली आईरा न्यूज़ वाराणसी
बनारस की गलियों से लेकर देश के हर थाने तक, जब हम-आप अपने घरों में चैन की नींद सोते हैं, तब कोई अपना घर-परिवार छोड़कर सड़कों पर पहरा दे रहा होता है। वो है खाकी वर्दी वाला।
लेकिन अफसोस, पुलिस का दर्द आम जनता नहीं समझ पाती।
पुलिस सबके लिए सोचती है, पर पुलिस के लिए कौन सोचता है
दिन हो या रात, त्योहार हो या आंधी-तूफान—ड्यूटी 24 घंटे। 8 घंटे की नौकरी कागजों में है, हकीकत में 14-16 घंटे की शिफ्ट आम बात है। न वीकली ऑफ पक्का, न छुट्टी की गारंटी।
छुट्टी मांगना भी सजा है आम आदमी को छुट्टी चाहिए तो एक एप्लीकेशन काफी। पुलिस वाले को CL चाहिए तो CO साहब से SO तक, फिर इंस्पेक्टर तक चक्कर लगाओ। और त्योहार का सीजन आया नहीं कि VIP ड्यूटी का फरमान आ गया। दिवाली पर घर में दिया जलाना है, ईद पर बच्चों को गले लगाना है, पर वर्दी वाला चौराहे पर खड़ा है। बीमार मां को देखने जाना है तो भी “साहब अभी फोर्स कम है” सुनने को मिलता है।
रात भर गश्त, सुबह कोर्ट, दिन में विवेचना और बीच-बीच में साहब की ‘बेगारी’।
परिवार बच्चों को पूछता है “पापा कब आओगे?”, और पापा केस डायरी में उलझे हैं। बीवी फोन पर कहती है “सब आपसे ही उम्मीद करते हैं, हम किससे करें?”, और वर्दी वाला चुप रह जाता है
जेब से नौकरी, सेहत से समझौता
किसी चौकी क्षेत्र में लावारिस लाश मिली तो क्रिया-कर्म का खर्च चौकी इंचार्ज की जेब से। मुलजिम पकड़ने मुंबई जाना है या चेन्नई—टिकट, होटल, खाना IO की सैलरी से। TA/DA साल भर बाद पास होगा, वो भी आधा-अधूरा।
थाने की कुर्सी टूटी है, पंखा खराब है, रंग-रोगन कराना है—फंड नहीं है। जनता से चंदा मांगो या खुद लगाओ। वर्दी साल में दो जोड़ी मिलती है, बाकी जूते-बेल्ट-टोपी अपनी तनख्वाह से खरीदो।
नतीजा क्या 30% पुलिसकर्मी BP-शुगर के मरीज। नींद 4 घंटे, खाना सड़क किनारे, तनाव मेज में खाना मनपसंद नहीं जवान डिप्रेशन और बर्नआउट से जूझ रहे हैं। छोटी बात पर गुस्सा आना, चिड़चिड़ाना अब मजबूरी बन गई है।
और बदले में क्या मिलता है
गलती हो तो सस्पेंशन, सही काम हो तो तारीफ भी ठीक से नहीं जनता मुश्किल में सबसे पहले 112 डायल करती है, और काम निकल जाने के बाद उसी पुलिस को कटघरे में खड़ा कर देती है।
दरोगा के दर्द को सिर्फ दरोगा ही समझ सकता है”ये लाइन हर थाने की दीवार पर लिखी होनी चाहिए। थाना इंचार्ज, चौकी इंचार्ज, सब इंस्पेक्टर—सब विवेचना के बोझ तले दबे हैं। ऊपर अधिकारियों का दबाव, नीचे राजनीतिक दखल, बीच में कुर्सी बचाने की जद्दोजहद।
अब वक्त है सोच बदलने का
पुलिस हमारी सुरक्षा की पहली लाइन है। अगर पहली लाइन ही टूटी हुई, बीमार और हताश होगी तो समाज महफूज कैसे रहेगा
भर्ती बढ़े स्टाफ पूरा होगा तो 8 घंटे ड्यूटी और समय पर छुट्टी का सपना पूरा होगा।
- लीव पॉलिसी पारदर्शी हो CL-EL के लिए सिंगल विंडो सिस्टम हो। त्योहार पर रोटेशन से छुट्टी मिले ताकि हर जवान अपने परिवार के साथ 1-2 दिन मना सके।
- फंड समय पर मिले विवेचना खर्च, बॉडी डिस्पोजल, थाने का मेंटेनेंस— की जेब पर बोझ न पड़े।
- सेहत पर ध्यान हर थाने में योग, मेडिकल चेकअप, काउंसलिंग अनिवार्य हो।
- सम्मान मिले: एक ‘थैंक यू’, एक कप चाय, एक बार ‘ड्यूटी कैसी चल रही है सर?’ पूछ लेना।वर्दी वाले का दिन बना देता है अच्छा
वर्दी की इज्जत तभी मुकम्मल होगी जब वर्दी पहनने वाले इंसान की इज्जत होगी। उसके दर्द, उसकी थकान, उसकी मजबूरी को भी समझा जाएगा।
कभी फुर्सत मिले तो किसी पुलिस वाले की आंखों में झांककर देखिएगा। वहां नींद नहीं, फिक्र तैरती मिलेगी—आपकी, हमारी, पूरे समाज की।
क्योंकि जब तक वो जागता है, तभी तक हम चैन से सोते हैं फिर भी समाज पुलिस को अचानक हुई घटना के सिलसिले में दोषी मानता है🤔


















