सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी से फिर चर्चा में समान नागरिक संहिता,विशेषज्ञ बोले संविधान की भावना को साकार करने का समय

समान नागरिक संहिता पर फिर तेज हुई बहस,सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी से बढ़ी चर्चा ||
यूसीसी पर राष्ट्रीय विमर्श तेज,विशेषज्ञों ने बताया संविधान की मूल भावना से जुड़ा विषय ||
महिलाओं के समान अधिकार और न्याय की दिशा में अहम कदम हो सकती है समान नागरिक संहिता ||
अनुच्छेद 44 के तहत समान नागरिक संहिता लागू करने की जरूरत पर फिर उठी आवाज ||
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी के बाद यूसीसी पर देशभर में चर्चा तेज ||
वाराणसी :- देश में समान नागरिक संहिता (यूनिफार्म सिविल कोड -यूसीसी ) को लेकर बहस एक बार फिर तेज हो गई है हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय में एक याचिका की सुनवाई के दौरान अदालत की उस टिप्पणी ने इस विषय को राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का केंद्र बना दिया, जिसमें कहा गया कि समाज में मौजूद भेदभाव का समाधान समान नागरिक संहिता हो सकता है | दरअसल यह मामला मुस्लिम महिलाओं को उत्तराधिकार में पुरुषों के बराबर अधिकार दिए जाने की मांग से जुड़ा था | सुनवाई के दौरान सर्वोच्च न्यायालय की पीठ ने यह संकेत दिया कि यदि समाज में समानता और न्याय सुनिश्चित करना है तो समान नागरिक संहिता जैसे व्यापक समाधान पर गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए | संविधान विशेषज्ञों के अनुसार भारत के संविधान में पहले से ही समान नागरिक संहिता की अवधारणा मौजूद है | संविधान के नीति निदेशक तत्वों में शामिल अनुच्छेद 44 राज्य को यह निर्देश देता है कि वह देश में समान नागरिक संहिता लागू करने की दिशा में प्रयास करे,ताकि सभी नागरिकों को कानून के समक्ष समान अधिकार मिल सकें |
विशेषज्ञ बताते हैं कि वर्तमान समय में विवाह,तलाक,उत्तराधिकार और पारिवारिक मामलों से जुड़े कई कानून अलग-अलग समुदायों के लिए अलग -अलग रूप में लागू हैं | कई मामलों में यह व्यवस्था विशेष रूप से महिलाओं के अधिकारों के संदर्भ में असमानता और विवाद का कारण बनती रही है इसी वजह से न्यायपालिका समय-समय पर अपने फैसलों और टिप्पणियों में इस विषय की प्रासंगिकता को रेखांकित करती रही है |
गौरतलब है कि इससे पहले भी शाह बानो मामला (1985) और सरला मुद्गल केस (1995) जैसे महत्वपूर्ण मामलों में सर्वोच्च न्यायालय ने समान नागरिक संहिता की आवश्यकता पर बल दिया था | अदालत ने तब कहा था कि अलग-अलग व्यक्तिगत कानून कई बार न्याय की समानता में बाधा बन जाते हैं और एक समान कानूनी व्यवस्था इस समस्या का समाधान हो सकती है |
कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि समान नागरिक संहिता का उद्देश्य किसी धर्म विशेष की परंपराओं में हस्तक्षेप करना नहीं है बल्कि नागरिक अधिकारों के स्तर पर समानता और न्याय सुनिश्चित करना है | इसे सामाजिक न्याय और लैंगिक समानता की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जाता है |
इसी संदर्भ में वाराणसी के वरिष्ठ अधिवक्ता एवं बनारस बार एसोसिएशन के वरिष्ठ उपाध्यक्ष शशांक शेखर त्रिपाठी ने कहा कि समान नागरिक संहिता भारतीय संविधान की मूल भावना से जुड़ा विषय है उन्होंने कहा कि संविधान निर्माताओं ने अनुच्छेद 44 के माध्यम से स्पष्ट रूप से यह संकेत दिया था कि देश में नागरिक अधिकारों के स्तर पर समानता स्थापित करने की दिशा में प्रयास होना चाहिए |
त्रिपाठी के अनुसार “भारत एक लोकतांत्रिक और संवैधानिक राष्ट्र है जहाँ कानून के समक्ष सभी नागरिकों को समान माना गया है ऐसे में यदि किसी व्यवस्था में भेदभाव की स्थिति उत्पन्न होती है तो उसे दूर करना समय की मांग बन जाता है उन्होंने कहा कि हाल के वर्षों में महिलाओं के अधिकारों और सामाजिक न्याय के प्रति जागरूकता बढ़ने के साथ-साथ समान नागरिक संहिता पर राष्ट्रीय स्तर पर गंभीर विमर्श भी तेज हुआ है | न्यायपालिका की हालिया टिप्पणियों ने इस चर्चा को और व्यापक बना दिया है |
कानूनी और सामाजिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि इस विषय पर व्यापक संवाद,संवैधानिक प्रक्रिया और सामाजिक सहमति के साथ आगे बढ़ा जाए तो यह भारतीय लोकतंत्र में समानता और न्याय की अवधारणा को और मजबूत कर सकता है |
विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि आने वाले समय में समान नागरिक संहिता का मुद्दा केवल कानूनी बहस तक सीमित नहीं रहेगा,बल्कि यह सामाजिक न्याय और संवैधानिक मूल्यों से जुड़े एक व्यापक राष्ट्रीय विमर्श के रूप में सामने आ सकता है ||




























