AIRA NEWS NETWORK – मुझे कहने में जरा भी ग्लानी नहीं है कि आज हर इंसान अपने अधिकार और मान-सम्मान पाने के लिए अग्रसर है, चाहे वह किसी भी पद या राजनैतिक संगठन, धार्मिक सम्प्रदाय, जाति, समाज प्रशासन से जुडा़ हो। हर व्यक्ति चाहता है कि मेरी जाति ऊँची रहे, मेरा पद ऊँचा रहे, मेरी कुर्सी ऊँची हो, मेरा आसन ऊँचा हो, मेरा धर्म ऊँचा रहे. समाज और सम्राज्य में मैं ही सबसे ऊँची स्पर्धा का रहुँ. आज प्रत्येक व्यक्ति अपने धर्म, राजनैतिक, जाति, कुर्सी, एश्वर्य के झण्डे को सबसे ऊँचा देखना चाहता है, चाहे इसके लिए उस व्यक्ति को समाज में बदले में भ्रष्ट होना पडे़।
आतंक फैलाना पडे़, किसी की हत्या करनी पडे़, किसी को जेल भेजवाना पडे़, यहाँ तक की राज्य या देश को भी बाँटना पडे़ तो भी वह अपनी शान और सत्ता के लिए देश और देश की माटी को बाँटने में जरा भी विलंब नहीं करेगा. आज हम यह भी जानते हैं कि इंसान झुटी लडा़ई लड़ कर भी अपने व्यक्तिगत झण्डे को ऊँचा रखना चाहता है।इसके लिए उसे कितना भी नीचा गिरना पडे़. परन्तु आज इंसान यह नहीं जानता कि इस देश के प्रति, देश के संविधान के प्रति हमारा कर्तव्य क्या है ? देश के झण्डे के प्रति हमारा क्या दायित्व है ?
वह इस बात से अनभिज्ञ रहना चाहता है. उसे अपने संसद भवन के उपर राष्ट्रीय तिरंगा लहराता नजर नहीं आता, लाल किले पर राष्ट्रीय झण्डा फहराता नजर नहीं आता है, कि यह हम भारत वासियों को क्या उपदेश दे रहा है ? कौन सी राह की ओर इशारा कर रहा है ? लेकिन हमें तो सिर्फ नजर आता है तो अपनी स्वार्थ का झण्ड, धर्म, जाति, सत्ता, कुर्सी, प्रशासन, वैभव, एश्वर्य बस यही झण्डे लहराते रहे. इसी में हर व्यक्ति सम्मान समझता है।
अगर संसद भवन का तिरंगा वायु के आवेग के कारण न लहराता दिखे या छिप जाए या सूर्य की तपती किरणों से बदरंग हो जाए तो भी उसके नीचे बैठे लोगो की नजर नहीं जाती है और न ही बाहरी वातावरण में रहने वालों की. क्योंकि उनको तो सिर्फ चिन्ता है अपने व्यक्तिगत झण्डे की. किसी भी देश का झण्डा उसके देश राष्ट्र का गौरव और मान-सम्मान का प्रतिक माना जाता है. इसी कारण हर व्यक्ति को अपने राष्ट्रीय झण्डे की गरिमा और सम्मान रखना परम कर्तव्य एवं मौलिक अधिकार हो जाता है।
राष्ट्रीय झण्डे का महत्व – किसी शायर ने ठीक कहा है .
- कौमी तिरंगे झण्डे, ऊँचे रहो जहाँ में.
- हो तेरी सर बुलन्दी, ज्यों चाँद आसमां में.
- तू मान है हमारा, तू शान है हमारी.
- तू जीत का निशाँ है, तू जीत है हमारी..
राष्ट्रीय झण्डे का झुकना समस्त देश का अपमान के साथ नत-मस्तक होकर अपनी गरिमा, आन, बान और शान का समाप्त होना माना जाता है, इसलिए इस तिरंगे के सम्मान की रक्षा और गौरव के लिए देश के प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य है कि मरणोपरांत तक राष्ट्रीय झण्डे को हमेशा आसमान की ऊँचाई से भी ऊँचा रखे।
हमारा राष्ट्रीय झण्डा ही निर्बलों को बलवान, डरपोक को साहस और कंकालो में प्राण शक्ति का प्रदान करने का आधार भी है. यह तिरंगा ही प्रेरणाओं का असीम आधार है क्योंकि इसी के कारण किसी भी देश के सामने हम अपने सिर को बुलन्द और अस्तित्व को कायम रख सकते हैं.
अंग्रेजो के शासनकाल में भारतवासियों को आभास हुआ कि इस शासनकाल से मुक्ति मिले और अधिर हो कर स्वतंत्रता-संग्राम का शंख बजाया तथा संचालको और झण्डे का आवश्यकता महशुस हुई. फलस्वरूप गाँधीवादी चरखायुक्त तिरंगे झण्डे को स्वीकारा. लेकिन विभिन्न तर्को को पार कर 22 जुलाई सन् 1946 ई0 को प0 जवाहरलाल नेहरू द्वारा अशोक चक्र युक्त तिरंगे को संविधान सभा के अन्तर्गत सर्वसम्मति से पारित किया गया।
तिरंगे के स्वरूप की जो मर्यादा इस प्रकार झण्डे के मध्य में अशोक चक्र गुण, धर्म और सत्य का प्रतीक, श्वेत रंग प्रकाश, उजाला, सादगी, सत्य की प्रेरणा देता है. हरा रंग भारत के कृषि प्रधान और प्रकृति से प्यार करने का उपदेश देता है. केशरिया रंग त्याग, बलिदान और विनम्रता का भाव जगाने की प्रेरणा देता है और तिरंगे के मध्य में नीले रंग का चक्र हमारे ह्रदय में लोक कल्याण, समाज सेवा की भावनाओं को अग्रसित करता है।
आज हमें कहने में गर्व तो होता है कि हम स्वतंत्र है. गमारा दायित्व पहले की अपेक्षा और भी बढ़ जाता है. हमारा संकल्प होना चाहिए कि किसी भी कीमत पर राष्ट्र का गौरव, गरिमा को (जो तिरंगे झण्डे में छिपी है) झुकने नहीं देंगे मरते दम तक. भारत माता के प्रत्येक नागरिक का परम कर्तव्य हो जाता है. किसी भी परिस्थिति में झण्डे की, राष्ट्र ध्वज की मान-सम्मान और गरिमा बनाऐं रखें।


















