बुन्देलखण्ड राष्ट्र समिति ने राम रक्षा सूत्र बांध कर जंगलों को बचाने का लिया संकल्प
फतेहपुर – बुन्देलखण्ड राष्ट्र समिति ने बुन्देलखण्ड के सभी जिलों में बुंदेली वीरांगना महारानी लक्ष्मीबाई के शौर्य दिवस 18 जून को हम बुंदेलों ने बुंदेलखंड बचाओ दिवस के रूप में मनाया l फतेहपुर में खागा नगर के रेलवे पार्क में बुंदेलियों ने वृक्षों की पूजा कर राम रक्षा सूत्र बांध कर जंगल बचाने का संकल्प लिया l
समिति के केन्द्रीय अध्यक्ष प्रवीण पाण्डेय ने बताया अंग्रेजों से अपनी रियासत झांसी को बचाने के लिए लड़ी थीं और हम बुंदेलखंड के जंगल, पहाड़ और नदियों को बचाने के लिए सरकारों से लड़ रहे हैं। हमारा बुंदेलखंड हमारी असली रियासत है जिसको अपनी स्वार्थपूर्ति के लिए सरकारें पूरी तरह मिटाने पर आमदा हैं। हमारे पहाड़ और नदियां पहले ही उनके निशाने पर आ चुके हैं, अब हमारे बचे खुचे जंगलों की बारी है। छतरपुर जिले का बक्सवाहा जंगल इसका ज्वलंत उदाहरण है जिसके नीचे दबे हीरों को निकालने के लिए मध्यप्रदेश की तत्कालीन कमलनाथ सरकार ने 2019 में आदित्य बिड़ला समूह को 382 हेक्टेयर जंगल के 2.15 लाख पेड़ों को काटने की मंजूरी दे दी।
इसके बाद पन्ना टाइगर रिजर्व के 23 लाख पेड़ों की बारी है जो केन-बेतवा नदी जोड़ो परियोजना की बलि चढ़ने वाले हैं। सवाल ये है कि हीरे ज्यादा जरूरी हैं या जंगल। वो भी इस कोरोना महामारी के नाजुक दौर में जब आक्सीजन की कमी के चलते हजारों लोग मौत के मुंह में चले गये। सरकार को विदेशों से आक्सीजन मंगानी पड़ी। जगह-जगह आक्सीजन प्लांट लगवाने पड़े। जंगल तो हमारे सबसे बड़े आक्सीजन प्लांट है। चंद हीरों के लालच में उनको काटने का फैसला क्या आत्मघाती कदम नहीं है ? सरकार दावा कर रही है कि एक पेड़ के बदले 15 पेड़ लगवा देंगे लेकिन पौधरोपण की हकीकत किसी से छुपी नहीं। फिर पौधरोपण से जंगल नहीं बनते।
वो तो हजारों साल की सतत प्रक्रिया से स्वतः बनते हैं। ये जंगल न केवल हमारे बेसकीमती प्राकृतिक आक्सीजन प्लांट हैं बल्कि हजारों, लाखों जीव जंतुओं, पशु पक्षियों को जीवन देते हैं। लोगों को रोजगार देते हैं, जलस्रोतों को जीवित रखते हैं, पर्यावरण को शुद्ध व संतुलित रखते हैं। इसके अलावा सरकारों को विभिन्न तरीकों से राजस्व भी देते हैं। 50 वर्ष की आयु वाला एक वृक्ष एक दिन में 4 लोगों के लिए जरूरी आक्सीजन देता है लेकिन सरकारों को ये सब नहीं दिखता, उनको तो सिर्फ हीरे दिख रहे हैं जिनको चाटने भर इंसान की मौत हो जाती हैं।
चाहे मध्यप्रदेश की सरकारें रही हों चाहे उत्तर प्रदेश की सरकारें। सभी सरकारों की गिद्ध दृष्टि सिर्फ बुंदेलखंड की खनिज संपदा पर रही है। कैसे इनका ज्यादा से ज्यादा दोहन किया जाए। पन्ना जिले का उदाहरण सबके सामने हैं। जब से हमने होश संभाला, पन्ना को सिर्फ हीरों के लिए जाना लेकिन वहां की हीरा खदानों से किसको लाभ हुआ। बाहर के बड़े बड़े लोगों का। दुनिया भर को सबसे ज्यादा हीरा देने वाला पन्ना आज भी मध्यप्रदेश के सबसे पिछड़े जिलों में शामिल है। वहां के लोग दिल्ली, मुंबई जैसे महानगरों में मजदूरी कर कीड़े-मकोड़ों जैसी जिन्दगी जी रहे हैं। पंजाब में 5 नदियां हैं तो बुंदेलखंड में 7 बड़ी नदियां हैं फिर भी यहां के किसान आज भी पानी के लिए तरस रहे हैं।
अगर नदियों का बेहतर जल प्रबंधन किया गया होता तो आज बुंदेलखंड खाद्यान्न उत्पादन में पंजाब से आगे होता। केन व बेतवा नदी को जोड़ने की जो योजना बनाई जा रही है, उससे फायदा कम नुकसान ज्यादा होना है। कुल मिलाकर हमारी नदियां सरकारों के लिए दुधारू गाय बन गयी हैं। सिर्फ बालू खनन का अड्डा बनकर रह गयी हैं। इसी तरह हमारे खूबसूरत पहाड़ों को खत्म कर पूरे बुंदेलखंड को बंजर और रेगिस्तान बनाया जा रहा है। गिट्टी बालू भी हमारे हीरे जवाहरात हैं जो बाहर के लोग लूटे लिए जा रहे हैं और बुंदेलखंड के लोग काम की तलाश में महानगरों में भटक रहे हैं। देश मे सर्वाधिक 39% पलायन बुंदेलखंड में है। हमारी सभी ऐतिहासिक धरोहरें नष्ट हो रही हैं।
जिस बुंदेलखंड की धरा पर आकर युवराज राम प्रभु श्रीराम बने हों, गोस्वामी तुलसीदास, महर्षि वेदव्यास व बैजूबावरा ने जन्म लिया हो, भगवान राम ने अपने वनवास का ज्यादातर समय व्यतीत किया हो, आल्हा ऊदल व महाराजा छत्रसाल जैसे वीरों ने जन्म लिया हो, गुरू गोरखनाथ ने तप किया हो। उस गौरवशाली बुंदेलखंड का अतीत अब इतिहास के पन्नों में सिमट गया है। हम बुंदेलों के माथे पर गरीबी, पिछड़ेपन का कालिख पोत दिया गया है।
आखिर हम बुंदेलों को कब तक ऐसी यातनाएं भोगनी होंगी। बुंदेलखंड की अकूत संपदा का दोहन आखिर कब तक यूं ही चलता चलेगा। इस सवाल का सिर्फ एक ही जबाव है अलग बुंदेलखंड राज्य। जब तक हमारा अलग बुंदेलखंड राज्य नहीं बनेगा, तब तक हालात बदलने वाले नहीl
आज रानी लक्ष्मी बाई शौर्य दिवस, बुन्देलखण्ड बचाओ कार्यक्रम में मुख्य रूप से प्रवीण पाण्डेय, ज्ञानेंद्र सिंह, संतोष केसरवानी, धर्मेंद्र सिंह, देवब्रत त्रिपाठी, शक्ति सामंत, अथर्व सिंह, प्रखर गुप्ता, आकर्ष साहू, आदित्य सोनी, विपिन सिंह, विवेक सिंह, मयंक सिंह, अमन कुमार, पवन निषाद , शिवचंद्र शुक्ला, अनुपम शुक्ला आदि रहे l
जंगल नदियां पहाड़ बचाने हेतु सायकिल यात्रा 21 जून से कामतानाथ चित्रकूट से प्रारंभ होकर दिल्ली के लोकतंत्र के मंदिर संसद भवन और न्याय के मंदिर सर्वोच्च न्यायालय की करेंगे परिक्रमा। इस यात्रा में बुन्देलखण्ड के लिए सभी जिलों से बुन्देली 20 जून चित्रकूट कामतानाथ में एकत्र होंगे, कामतानाथ स्वामी की परिक्रमा से यात्रा का आगाज होगा l
यात्रा में महोबा से बुन्देलखण्ड राष्ट्र समिति के राष्ट्रीय संयोजक तारा पाटकर, हरिओम निषाद , बुन्देलखण्ड बचाओ अभियान के संयोजक निवाड़ी से हिन्दू सत्यनाथ योगी, छतरपुर से बजरंग सेना के साथी, बांदा से बी आर एस प्रमुख डालचंद्र , फतेहपुर से केन्द्रीय अध्यक्ष प्रवीण पांडेय, देवब्रत त्रिपाठी, आदित्य पांडेय, हरिओम मिश्रा, विपिन कुमार, सुखेन्द्र कुमार, दीपक कुमार, जय प्रकाश, सुरेन्द्र पाल, अनिल त्रिपाठी, अंशु परमार , धीरेन्द्र सिंह शामिल होंगे।


















