“डीजीपी का तुगलकी फरमान: अपराध बढ़े, जवाबदेही घटी,अब सिर्फ प्रेस नोट से होगी पुलिस की बात!”

“डीजीपी का तुगलकी फरमान: अपराध बढ़े, जवाबदेही घटी, अब सिर्फ प्रेस नोट से होगी पुलिस की बात!”
आईरा न्यूज़ नेटवर्क
खबर वही जो हो सही
उपसंपादक: सुमन मिश्रा, कटिहार से खास रिपोर्ट
बिहार पुलिस मुख्यालय से एक ऐसा आदेश जारी हुआ है, जिसने लोकतंत्र के चौथे स्तंभ – मीडिया – की भूमिका पर ही सवालिया निशान लगा दिया है। अब न डीजीपी पत्रकारों से बात करेंगे, न कोई अन्य वरिष्ठ अधिकारी। चाहे लूट हो या हत्या, अपहरण हो या गैंगवार – मीडिया को अब सिर्फ एक “प्रेस नोट” थमा दिया जाएगा।
आदेश में स्पष्ट किया गया है कि –
“कोई भी पुलिस अधिकारी या कर्मी मीडिया से सीधे संवाद नहीं करेगा।
प्रेस नोट भी प्रवक्ता की अनुमति के बाद ही जारी होंगे।”
मतलब, जो पुलिस पहले जनता के सवालों का ज़वाब देती थी, अब वह सिर्फ फाइलों और कागज़ों की भाषा बोलेगी।
पत्रकारों और सामाजिक कार्यकर्ताओं की नाराज़गी:
इस आदेश को लेकर पत्रकारों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने तीखी प्रतिक्रिया दी है। उनका कहना है कि यह कदम पुलिस की जवाबदेही से बचने की सोची-समझी रणनीति है।
एक वरिष्ठ पत्रकार ने कहा –
“जब अपराध बेलगाम हों और पुलिस बयान देने से भी डरे, तो समझिए सिस्टम में गहरी सड़न है।”
बड़े सवाल जो उठते हैं:
क्या यह लोकतंत्र में सूचना के अधिकार की हत्या नहीं है?
क्या यह “जन सेवा” की जगह “जन दूरी” नहीं है?
जब डीजीपी जवाब नहीं देंगे, तो जवाबदेही तय कैसे होगी?
आईरा न्यूज़ नेटवर्क
खबर वही, जो हो सही।


















