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कण्व श्रृषि अमृत सरोवर का शुभारम्भ उसकी नींव पर स्वयं फावड़ा चला कर किया श्रमदान, साथ में पुलिस अधीक्षक दिनेश सिंह ने भी चलाया फावड़ा

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आईरा न्यूज़ नेटवर्क बिजनौर से विकास अग्रवाल

बिजनौर डीएम उमेश मिश्रा द्वारा कण्व आश्रम स्थित कण्व श्रृषि प्राकृतिक खेती प्रशिक्षण केन्द्र का विधि विधान से यज्ञ कर वहां निर्मित होने वाले कण्व श्रृषि अमृत सरोवर का शुभारम्भ उसकी नींव पर स्वयं फावड़ा चला कर किया श्रमदान, साथ में पुलिस अधीक्षक दिनेश सिंह ने भी चलाया फावड़ा

बिजनौर डीएम उमेश मिश्रा ने भरत की जन्म स्थली, महश्रृषि कण्व की तपोस्थलि तथा दुष्यंत एवं शकुंतला की परिणय स्थली रही धरती में जन्म लेने वाले ग्राम प्रधानों से उक्त स्थल को प्राकृतिक खेती प्रशिक्षण स्थल के रूप में विकसित और पर्यटन के क्षेत्र में विकसित करने के कार्य में मांगा सहयोग

गाय के गोबर एवं मूत्र पर आधारित प्राकृतिक खेती समय की सबसे बड़ी आवश्यता, प्राचीन काल में प्राकृतिक खेती का प्रचलन था, जो आज के युग में वातावरण को स्वच्छ एवं स्वास्थ्यवर्धन के लिए और अधिक हो गया प्रासांगिक, प्राकृतिक खेती प्रक्रिया को पुर्नजीवित करने के प्रयास क्रांतिकारी क़दम- पुलिस अधीक्षक दिनेश सिंह

बिजनौर । डीएम उमेश ने आज कण्व आश्रम स्थित कण्व श्रृषि प्राकृतिक खेती प्रशिक्षण केन्द्र का विधि विधान से यज्ञ कर वहां निर्मित होने वाले कण्व श्रृषि अमृत सरोवर का शुभारम्भ उसकी नींव पर स्वयं फावड़ा चला कर किया। इस अवसर पर पुलिस अधीक्षक दिनेश सिंह, मुख्य विकास अधिकारी पूर्ण बोरा, परियोजना निदेशक ज्ञानेश्वर तिवारी सहित अन्य अधिकारी, आसपास के ग्राम प्रधान एवं गणमान्य व्यक्ति मौजूद थे। जिलाधिकारी श्री मिश्रा ने इस अवसर पर ग्राम प्रधानों का आहवान किया कि उन्होंने भरत की जन्म स्थली, महश्रृषि कण्व की तपोस्थलि तथा दुष्यंत एवं शकुंतला की परिणय स्थली रही धरती में जन्म लिया है, जिसके तहत आपका कर्तव्य है कि इस पावन भूमि को प्राकृतिक खेती प्रशिक्षण केन्द्र के रूप में विकसित करने में प्रशासन का सहयोग करें और इस प्रकार विकसित करें कि दूर-दूर से लोग इसके आकर्षण से प्रभावित हो कर इस स्थान के दर्शन के लिए ललायित हो सकें। उन्होंने कहा कि दूषित वातावरण एवं धरती को बढ़ते हुए विभिन्न प्रकार के प्रदूषणों से सुरक्षित रखने और आने वाली पीढ़ी को स्वस्थ जीवन यापन के लिए संर्घष करना होगा। उन्होंने कहा कि यह कार्य तभी सम्भव हो सकता है जब हम अपनी खेती को प्राकृतिक तर्ज पर उत्पादित कर विकसित करें। उन्होंने कहा कि यहां प्राकृतिक खेती प्रशिक्षण केन्द्र की स्थापना इसी लिए की गई है कि भारत के लोग यहां आकर इसके महत्व को समझें और यहां से प्रशिक्षण लेकर अपने अपने क्षेत्रों में प्राकृतिक खेती का विकास करें। उन्होंने कहा प्राकृतिक खेती गाय पर आधारित है, जिसके लिए गौशाला का निर्माण नितांत आवश्यक है ताकि गाय के गोबर और मूत्र से प्राकृतिक खेती को परवान चढ़ाया जा सके। उन्होंने बताया कि इसी उद्देश्य के दृष्टिगत कण्व श्रृषि स्थल पर एक बड़े गोशाला का निर्माण कराया जा रहा है तथा गायों को समुचित चारे के लिए भी इसी क्षेत्र में चरी आदि फसल के अलावा भूसा भण्डार की भी व्यवस्था की गई है। उन्होंने यह भी बताया कि कण्व श्रृषि स्थल के वातावरण की अनुकूलता को दृष्टिगत रखते हुए इस स्थान पर प्राकृतिक खेती प्रशिक्षण केन्द्र की स्थापना का निर्णय लिया गया है। उन्होंने कहा कि इस स्थल को सुन्दर और आकर्षक बनाने के लिए कण्व श्रृषि अमृत सरोवर का निर्माण कराया जा रहा है, जिसकी शुरूआत स्वयं उनके तथा पुलिस अधीक्षक द्वारा उसकी नींव खोद कर की गई है। बिजनौर डीएम उमेश मिश्रा ने उप जिलाधिकारी सदर को निर्देश दिए कि कण्व श्रृषि स्थल पर किसी भी प्रकार का खनन तथा अवैध कब्जा न होने पाए और जो व्यक्ति भी दुस्साहस करने का प्रयास करें उसके विरूद्व कठोर कार्यवाही अमल में लाएं। उन्होंने परियोजना निदेशक डीआरडीए को निर्देश दिए कि प्रस्तावित कण्व श्रृषि सरोवर तालाब का पूरा नक़शा तैयार करें और उसको सौंदर्य और आकर्षक बनाने के लिए कार्ययोजना भी बनाएं। उन्होंने यह भी निर्देश दिए उक्त परियोजना का कार्य मनरेगा से कराएं ताकि स्थानीय लोगों को रोजगार भी प्राप्त हो सके। इसी के साथ उन्होंने यह भी निर्देश दिए कि इस क्षेत्र की सुरक्षा के लिए फैंसिंग कराना भी सुनिश्चित करें। उन्होंने पीडी डीआरडीओ को यह भी निर्देश दिए कि यहां से गुजरने वाली मानल नदी के किनारे बांस की पौधे रोपित कराएं और तालाब के किनारों पर फूल, औषधि और फलों के पौधों को रोपित कराना सुनिश्चित करें। इस अवसर पर पुलिस अधीक्षक दिनेश सिंह ने कहा कि प्राकृतिक खेती समय की सबसे बड़ी आवश्यता है, यह खेती जैविक खेती से भिन्न है। उन्होंने उक्त खेतियों की भिन्नता को स्पष्ट करते हुए कहा कि प्राकृतिक खेती गाय के गोबर एवं मूत्र पर आधारित होती है जबकि जैविक खेती में गाय के गोबर के अलावा अन्य प्रकार के भी खादों का प्रयोग किया जाता है। उन्होंने कहा कि प्राचीन काल में प्राकृतिक खेती का प्रचलन था, जो आज के युग में और अधिक प्रासांगिक और आवश्यक हो गया है। उन्होंने कहा कि इसी प्रक्रिया को पुर्नजीवित करने का यहां प्रयास किया जा रहा है। उन्होंने ग्राम प्रधानों एवं जन सामान्य का आहवान किया कि इस पुण्य कार्य में अपना महत्वपूर्ण योगदान निभाएं।

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