वाराणसी/उत्तरप्रदेश

ज़कात माफिया की “शाह कुंजी” और लुटती हुई अमानतें:

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एक सोचने का पल
दीन के नाम पर दुनिया बनाने वाले “नौ रत्नों” की लालच अब सारी हदें पार कर चुकी है। बनारस, जो इल्म और अदब का गहवारा रहा है, वहाँ के कुछ तथाकथित नाज़िम और इंतज़ामिया ने ज़कात व सदक़ात को इबादत के बजाय अपनी तिजोरियों का ईंधन बना लिया है।
पच्चीस लाख की वसूली और “तमलीकी हलाला” का ड्रामा
मदरसہ मजहरुल उलूम के पिछले साल के हिसाब में पच्चीस लाख रुपये (25,00,000) की बड़ी रकम ज़कात व सदक़ात की मद में वसूल हुई। हैरत की बात यह है कि जरूरतमंदों तक पहुँचने के बजाय यह पूरी रकम “तमलीकी हलाला” के नाम पर खर्च दिखा दी गई।
क्या बनारस और उसके आसपास ज़कात का कोई असली हकदार बाकी नहीं था?
या फिर तमलीक के नाम पर इस रकम को इंतज़ामिया की बंदरबांट और गड़बड़ी की भेंट चढ़ाना ही असली मकसद था?
यह तमलीक का खेल दरअसल गरीबों के हक पर डाका डालने और बदनीयती पर धार्मिक पर्दा डालने की कोशिश लगती है।
मस्जिद पजाया तले: डेढ़ करोड़ का हिसाब कहाँ है?
यह वही “शाह कुंजी” इंतज़ामिया है, जिसका अतीत अनियमितताओं से भरा रहा है। 2013 में मस्जिद पजाया तले की तामीर के नाम पर लोगों ने अपनी मेहनत की कमाई दी, औरतों ने अपने गहने तक पेश कर दिए। कुल मिलाकर डेढ़ करोड़ रुपये जमा हुए। मगर यह रकम कहाँ गई?
नमाज़ी आज भी जवाब मांग रहे हैं।
मोहल्ले के बुज़ुर्ग हिसाब मांगते हैं तो बदतमीज़ी की जाती है।
सवाल करने वालों के साथ दबंगई का रवैया इस बात की निशानी है कि जवाबदेही से बचा जा रहा है।
अहल-ए-खैर से अपील: अपनी ज़कात बेकार न जाने दें
याद रखिए, ज़कात देना जितना बड़ा सवाब है, उसे सही जगह देना उतनी ही बड़ी जिम्मेदारी है। अगर आपकी दी हुई रकम जरूरतमंदों तक पहुँचने के बजाय गलत हाथों में जा रही है, तो आप अनजाने में गलत काम को बढ़ावा दे रहे हैं।
“जो लोग डेढ़ करोड़ का हिसाब न दे सकें और पच्चीस लाख की ज़कात को तमलीक के नाम पर हज़म कर जाएँ, उन्हें ज़कात देना गलत रवैये को सहारा देना है।”
अपना हाथ रोकिए। अपनी मेहनत की कमाई सोच-समझकर दीजिए। ज़कात वहीं दें जहाँ हर पैसे का साफ हिसाब हो और जहाँ खिदमत करने वाले जवाबदेह हों, न कि दबाव बनाने वाले।

Sallauddin Ali

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