काशी तमिल संगमम् 4.0 के अंतर्गत बीएचयू में पहला अकादमिक सत्र आयोजित

विविधताओं के बीच भारतीयों की समानताओं पर विशेषज्ञों ने दिया जोर
महाकवि भरतियार के जीवन और उनके योगदान पर हुई चर्चा
भारतीय संस्कृति विविधताओं को आत्मसात करते हुए एकता को सुदृढ़ करती है: अमीश त्रिपाठी
केटीएस उत्तर और दक्षिण भारत के लोगों के बीच संवाद एवं संपर्क को बना रहा है मजबूत: प्रो. अजित कुमार चतुर्वेदी
तमिलनाडु से आए विद्यार्थी प्रतिनिधिमंडल ने बीएचयू और आईआईटी-बीएचयू में कई स्थानों और सुविधाओं का किया भ्रमण
वाराणसी, 03.12.2025: विविधताओं के बीच मौजूद समानताएँ हमें भारतीय के रूप में हमारी मूल पहचान से एक साथ बांधे रखती हैं। काशी तमिल संगमम् के चौथे संस्करण के तहत काशी हिंदू विश्वविद्यालय स्थित पं. ओंकार नाथ ठाकुर सभागार में आयोजित एक शैक्षिक सत्र के दौरान यह विचार रेखांकित हुआ। “तमिल कल्पना में काशी: महाकवि सुब्रमण्य भारती और उनकी विरासत” विषय पर आधारित केटीएस 4.0 के पहले अकादमिक सत्र में विशेषज्ञों ने काशी और तमिलनाडु-दो प्राचीन संस्कृतियों-के गहरे संबंधों पर विचार साझा किये। तमिलनाडु से आए 200 सदस्यीय विद्यार्थी प्रतिनिधिमंडल ने इस सत्र में भाग लिया।
सत्र के मुख्य अतिथि जाने माने लेखक और पूर्व राजनयिक अमीश त्रिपाठी ने “मैं माँ तमिऴ को नमन करता हूँ” कहकर अपना संबोधन प्रारंभ किया और काशी तथा तमिलनाडु की संस्कृतियों के बीच कई समानताओं का उल्लेख किया। उन्होंने तमिल शब्द ‘वनक्कम’ और संस्कृत शब्द ‘वंदे’ के बीच भाषायी समानताओं को रेखांकित किया, जिनका अर्थ “नमन करना” है। उन्होंने कहा कि भारतीय संस्कृति विविधता का सम्मान करते हुए एकता को सुदृढ़ करती है। अपने बचपन की स्मृति को साझा करते हुए उन्होंने बताया कि मंदिरों में पूजा से संबंधित परंपराएँ विभिन्न क्षेत्रों में अलग-अलग होती हैं, फिर भी वे साझा श्रद्धा से जुड़ी रहती हैं। उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि 1500 वर्ष पूर्व श्रीलंका के बौद्धों ने तमिलनाडु पहुँचने पर वहां की धरती को चूमा, क्योंकि वे मानते थे कि ये वही भूमि है जहाँ बुद्ध का जन्म हुआ था, भले ही यह भौगोलिक और सांस्कृतिक रूप से नेपाल और बिहार से दूर है। उन्होंने इस सभ्यतागत एकता को आत्मसात करने की आवश्यकता पर बल दिया, जिसका उल्लेख विष्णु पुराण में भी मिलता है, और कहा कि केटीएस जैसे प्रयास इस एकता को मजबूत करते हैं।
मुख्य वक्तव्य प्रस्तुत करते हुए राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (एनसीईआरटी) के प्रो. आर. मेगनाथन ने महाकवि सुब्रमण्य भारती के शक्ति, भक्ति और ज्ञान के आदर्शों पर बात की। भारती के साहित्य, दर्शन और जीवन पर चर्चा करते हुए उन्होंने विस्तार से बताया कि तमिल साहित्य की इस प्रतिष्ठित हस्ती ने राष्ट्रीय एकता और साझा भारतीय पहचान को कैसे प्रोत्साहित किया। उन्होंने भारती की प्रसिद्ध कविता “अचमिल्लै, अचमिल्लै, अचमेनबा थिल्लैये” (“डर नहीं, डर नहीं, डर जैसी कोई चीज़ नहीं है”), उनके राष्ट्रवाद, सार्वभौमिकता और श्री अरविंदो के साथ उनके वैचारिक संवाद की चर्चा की। केटीएस 4.0 की थीम-“लेट अस लर्न तमिऴ – तमिऴ कर्कलाम”—के तहत प्रो. मेगनाथन ने गैर-तमिल भाषी लोगों के बीच तमिल भाषा सीखने को बढ़ावा देने वाली विभिन्न पहलों के बारे में बताया। उन्होंने एनसीईआरटी द्वारा निर्मित भारती पर एक डॉक्यूमेंट्री भी प्रस्तुत की और बताया कि कवि को 25 से अधिक भाषाओं का ज्ञान था तथा वे राष्ट्रवादी, साहित्यकार, पत्रकार और स्वतंत्रता सेनानी थे। उन्होंने एनसीईआरटी द्वारा विकसित तमिल भाषा ट्यूटोरियल भी प्रदर्शित किया। प्रो. मेगनाथन ने कहा कि सभी भारतीयों को एक तीसरी भाषा अवश्य सीखनी चाहिए। उन्होंने अपनी एक कविता के साथ वक्तव्य समाप्त किया, जिसमें उन्होंने भारती की कविता, उसके सामाजिक प्रभाव और विशेष रूप से लोगों की राष्ट्रीय भावनाओं पर उनके प्रभाव का वर्णन किया।
सत्र की अध्यक्षता करते हुए कुलपति प्रो. अजित कुमार चतुर्वेदी ने संगमम के महत्व पर जोर दिया और बताया कि यह कार्यक्रम किस प्रकार उत्तर और दक्षिण के लोगों के बीच संवाद को सुगम बना रहा है। प्रो. चतुर्वेदी ने आपसी समझ को मजबूत करने के लिए निरंतर संवाद के महत्व को रेखांकित किया और कहा कि भारत के राज्यों के बीच समानताएँ विविधता को कम नहीं करतीं; बल्कि वे भारतीय पहचान को और मजबूत करती हैं। उन्होंने विकसित भारत की दृष्टि को आगे बढ़ाने में केटीएस की भूमिका की सराहना की और ‘शब्द’ नामक एआई-आधारित अनुवाद उपकरण का उल्लेख किया, जिसने उनके वक्तव्य का तमिल और हिंदी में रियल टाइम में अनुवाद किया। कुलपति ने दोहराया कि केटीएस हमें इस कार्यक्रम के मूल दर्शन और उद्देश्य-एकता का उत्सव और “विभिन्न तरीकों से एक होने” की भावना-की याद दिलाता है।
अतिथियों का स्वागत करते हुए प्रबंधन अध्ययन संस्थान, बीएचयू के प्रो. पी. वी. राजीव ने काशी तमिल संगमम से परिचित कराया और तमिल छात्रों व शिक्षकों को काशी हिंदू विश्वविद्यालय का अवलोकन दिया। उन्होंने दोनों क्षेत्रों को जोड़ने वाले प्राचीन सांस्कृतिक संबंधों पर प्रकाश डाला और बताया कि रामेश्वरम को अक्सर “दक्षिण का काशी” कहा जाता है।
डॉ. जगदीशन टी., भारतीय भाषा विभाग, कला संकाय, ने सत्र के विषय पर विस्तार से चर्चा की। उन्होंने महाकवि सुब्रमण्य भारती के काशी से गहरे संबंध, आधुनिक तमिल कविता में उनके योगदान तथा काशी और तमिलनाडु के बीच सांस्कृतिक संबंधों को मजबूत करने में उनकी भूमिका पर चर्चा की। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि भारत की वास्तविक समझ के लिए तमिल और संस्कृत दोनों का ज्ञान आवश्यक है, और यह भी उल्लेख किया कि महाकवि ने महामना द्वारा आरंभ किए गए काशी हिन्दू विश्वविद्यालय की स्थापना के महान मिशन का समर्थन करने का आग्रह भी किया था।
इस अवसर पर नेशनल बुक ट्रस्ट द्वारा प्रकाशित तमिल में बच्चों की पुस्तकों के अनुवाद का कुलपति द्वारा विमोचन किया गया, जिन्हें पहली बार मुख्य अतिथि द्वारा ग्रहण किया गया। यह अनुवाद काशी हिंदू विश्वविद्यालय के तमिल विभाग के शिक्षकों और विद्यार्थियों ने तैयार किये हैं। कार्यक्रम का संचालन आईआईटी–बीएचयू की डॉ. लवण्या ने किया तथा धन्यवाद ज्ञापन डॉ. सरवनकुमार ई., आईआईटी–बीएचयू ने प्रस्तुत किया।
भारत कला भवन भ्रमण और कला संकाय में पैनल चर्चा
विद्यार्थी प्रतिनिधियों को भारत कला भवन और दृश्य कला संकाय की आर्ट गैलरी के भ्रमण के माध्यम से समृद्ध सांस्कृतिक परिचय प्राप्त हुआ। भारत कला भवन के उपनिदेशक डॉ. निशांत और प्रदर्शनी समन्वयक डॉ. सुरेश चंद जांगीड़ के समन्वय में प्रतिनिधियों ने अद्भुत मूर्तियों का अवलोकन किया, जिन्होंने भारत के कलात्मक विकास, आध्यात्मिक प्रतीकवाद और सांस्कृतिक इतिहास की गहरी समझ प्रदान की। श्री अमीश त्रिपाठी भी भारत कला भवन के इस भ्रमण में शामिल हुए। इसके बाद प्रतिनिधियों ने दृश्य कला संकाय में जारी भ्रमण के दौरान देशभर के कलाकारों द्वारा रचित प्रभावशाली चित्रों का अवलोकन किया।
इसके बाद भारतीय भाषा विभाग के तमिल खंड, कला संकाय में पैनल चर्चा आयोजित की गई। डॉ. जगदीशन ने 1945 में स्थापित तमिल खंड की समृद्ध विरासत का परिचय देते हुए तमिल भाषा अध्ययन, शैव सिद्धांत और तमिल दर्शन में इसके योगदानों पर प्रकाश डाला। प्रो. गंगाधरण ने महाकवि भरतियार पर एक ज्ञानवर्धक व्याख्यान दिया, जिसमें उन्होंने बताया कि तमिल भाषा को काशी में विशेष स्थान क्यों प्राप्त है और कैसे भरतियार के विचारों ने जाति और भाषा के विभाजनों को पार कर भारत की एकता को आकार दिया। सुब्रमण्य भारती की पोती डॉ. जयंती मुरली ने भरतियार के 16 वर्ष की आयु में काशी आगमन, उनके प्रसिद्ध गीत “वेल्लै तमरै पूविन्निले” की रचना, अनेक भाषाओं में उनकी दक्षता और काशी की संस्कृति के उन पर पड़े परिवर्तनकारी प्रभाव से जुड़े निजी और ऐतिहासिक संस्मरण साझा किए। प्रतिष्ठित तमिल कवि इसैकवि रमणन ने काशी को विश्व की सबसे प्राचीन जीवित नगरियों में से एक और “धर्म का द्वार” बताते हुए भरतियार के युवा दिनों की प्रेरक कथाएँ, उनके प्रभावशाली भाषण, नारी अधिकारों के प्रति उनके समर्थन और चेल्लम्मा को लिखे गए पत्रों में दर्ज उनके जीवंत अनुभवों का वर्णन किया। नेपाली खंड, भारतीय भाषा विभाग के प्रो. दिवाकर प्रधान ने भी पैनल चर्चा में सहभागिता की।
आईआईटी–बीएचयू में भ्रमण और संवाद
कौशल संस्थानों से आए विद्यार्थी प्रतिनिधियों ने भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) बीएचयू के आइडिएशन इनोवेशन एंड इनक्यूबेशन (I-3) फाउंडेशन का भी भ्रमण किया, जहाँ उन्होंने संस्थान की नवोन्मेषी पहलों और इनक्यूबेशन गतिविधियों के बारे में जानकारी प्राप्त की। प्रतिनिधिमंडल ने पैनल चर्चा में भी भाग लिया। आईआईटी–बीएचयू के इलेक्ट्रॉनिक्स एवं संचार इंजीनियरिंग विभाग के प्रो. मनोज कुमार मेशराम ने संस्थान में उद्यमिता यात्रा का विवरण प्रस्तुत किया। उन्होंने ज़ोस्टेल, क्रिकबज़, शॉपक्लूज़ और क्लीन इलेक्ट्रिक सहित आईआईटी–बीएचयू के पूर्व विद्यार्थियों द्वारा संचालित स्टार्टअप्स की उल्लेखनीय सफलता की कहानियों को रेखांकित किया तथा संस्थान में नवाचार और उद्यमिता की बढ़ती संस्कृति पर जोर दिया।
सत्र का समापन आर्यो ग्रीन टेक प्रयोगशाला के भ्रमण के साथ हुआ, जो I-3 फाउंडेशन की एक प्रमुख पहल है, जहाँ प्रतिभागियों को जारी अनुसंधान गतिविधियों और नवाचारपूर्ण तकनीकी समाधानों से अवगत कराया गया।
अटल इन्क्यूबेशन सेंटर में भ्रमण और संवाद
सीडीसी में अपने भ्रमण के दौरान, तमिलनाडु के विद्यार्थी समूह ने स्टार्ट-अप इकोसिस्टम, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, साइबर-सुरक्षा और कृषि में नवीनतम प्रथाओं का प्रत्यक्ष ज्ञान प्राप्त किया। कार्यक्रम का समन्वय सुश्री सिमरन दुबे द्वारा किया गया और स्वागत भाषण डॉ. राजकिरण प्रभाकर, इंस्टिट्यूट ऑफ मैनेजमेंट स्टडीज़ द्वारा दिया गया। एमआईएनआरएयू टीम की सुश्री श्वेता सिंह ने विकसित लिक्विड बायोप्सी पर आधारित उन्नत तकनीकों पर प्रस्तुति दी, जो प्रोस्टेट कैंसर के प्रारंभिक और प्रभावी उपचार के लिए उपयोगी है। साइबर-सुरक्षा सत्र के दौरान, कोबरा ऑनलाइन सर्विस के श्री मृत्युंजय सिंह ने डिजिटल युग में डेटा प्राइवेसी, अकाउंट हैकिंग और ऑनलाइन धोखाधड़ी से जुड़े महत्वपूर्ण विषयों पर चर्चा की। मिथिलेश सिंह ने एग्रो-टूरिज़्म और कृषि में नवीनतम प्रथाओं पर बात की। शिक्षा के भविष्य पर एक सत्र में, केप्लर एआई के श्री रोहित तिवारी ने बताया कि एआई आधारित स्मार्ट टूल्स किस प्रकार शिक्षकों की मदद कर रहे हैं और उनके कार्यभार को कम कर रहे हैं। व्यवसायिक संचार में एआई के अनुप्रयोगों पर बोलते हुए, स्टेचैट के संस्थापक श्री आयुष साहू ने अपनी कंपनी व्याटोमकी द्वारा विकसित एक बहुभाषी जेन-एआई संचार प्रणाली का प्रदर्शन किया। यह तकनीक होटल और अस्पताल क्षेत्रों के लिए तेज, सटीक और 24×7 ग्राहक इंटरैक्शन सहायता प्रदान करती है





