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हिंदुत्व, राष्ट्रवाद और एनकाउंटर जैसी बातें लोग भूल चुके, कानपुर के बदले समीकरण

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AIRA NEWS NETWORK – कानपुर के इस बार समीकरण बदल गए हैं। सबसे चर्चित मुद्दे बिकरू कांड यानि एनकाउंटर की बात नहीं हो रही है। पिछली बार हिंदुत्व और राष्ट्रवाद का मुद्दा खूब उछाला गया था, ये मुद्दे भी इस बार नजर नहीं आ रहे हैं। तो फिर कानपुर में ऐसा क्या है जिस पर चुनाव हो रहा है।

दैनिक भास्कर की टीम जब कानपुर पहुंची तो उसने 10 सीटों में से शहर की 4 सीटों का चुनावी समीकरण जाना। प्रत्याशियों से बात की और लोग क्या सोचते हैं, ये टटोला तो राजनीति के पंडितों के सारे कयास जीरो नजर आए। कानपुर में इस बार चुनाव में सिर्फ ‘मैं, मेरा काम और मेरी जाति’ ही चल रहा है।

1. कल्याणपुर सीटः साइकिल सबसे आगे चल रही है:

सबसे पहले बात करते हैं कल्याणपुर विधानसभा सीट की। कल्याणपुर सीट से खुशी दुबे की बहन नेहा तिवारी कांग्रेस की टिकट से लड़ रही हैं। खुशी दुबे विकास दुबे के भतीजे अमर दुबे की पत्नी हैं। शादी के 48 घंटे बाद, 17 साल की उम्र में उस पर 17 गंभीर आरोप लगे। अभी जेल में है।

कांग्रेस ने खुशी दुबे के परिवार को पीड़ित माना और नेहा तिवारी को टिकट दिया। यहां से खुशी की मां गायत्री देवी को टिकट दिया जाना था, लेकिन दस्तावेजों में दिक्कत होने के चलते खुशी की बहन को टिकट मिला। कल्याणपुर सीट पर नेहा तिवारी की चर्चा है। सपा के पूर्व विधायक सतीश निगम और भाजपा की मौजूदा विधायक नीलिया कटियार के बीच कांटे की टक्कर है।

आंकड़ों में कल्याणपुर सीट:

साल 2017 में नीलिमा कटियार को कुल 86,620 वोट मिले थे जबकि सतीश निगम को 63,270 वोट मिले थे। साल 2012 में यहां सतीश निगम ही विधायक थे उन्होंने प्रेम लता कटियार को हराया था। इससे पहले यहां पांच बार लगातार प्रेमलता कटियार ही विधायक रहीं। यहां कुल मतदाता 3,34,240 हैं।

2. किदवई नगर सीटः कांग्रेस-भाजपा के बीच कांटे की टक्कर:

कानपुर की किदवई नगर विधानसभा की बात करें तो यहां सीधा मुकाबला सिर्फ कांग्रेस प्रत्याशी अजय कपूर और भाजपा प्रत्याशी महेश त्रिवेदी के बीच है। अजय कपूर यहां से तीन बार विधायक रह चुके हैं। किदवई नगर में कांग्रेस भाजपा पर भारी पड़ती दिखाई दे रही है।

जातिगत समीकरण:

जातिगत समीकरणों को देखें तो यहां एक लाख दस हज़ार ब्राह्मण वोट हैं, यह वोट निर्णायक हैं। यहां कुल 3,54,693 मतदाता हैं। साल 2017 में महेश त्रिवेदी ने अजय कपूर को 33, 983 मतों से हराया था। महेश त्रिवेदी को कुल 1,11,407 वोट और अजय कपूर को 77, 424 मिले थे।

3. सीसामऊ सीटः 25 साल से यह सीट हाजी इरफान सोलंकी परिवार के पास:

कानपुर की मुस्लिम बहुल सीसामऊ विधानसभा सीट समाजवादी पार्टी की सबसे मजबूत सीट है। बीते 25 साल से यह सीट हाजी इरफान सोलंकी परिवार के पास है। मोदी लहर में भी यह सीट समाजवादी पार्टी के खाते में ही रही। समाजवादी प्रत्याशी हाजी इरफान सोलंकी यहां से लगातार तीन बार विधायक रहे हैं। इससे पहले इनके पिता हाजी मुश्ताक सोलंकी भी यहां से लगातार जीतते रहे। हाजी मुश्ताक हिंदुओं के भी उतने ही चहेते रहे, जितने मुसलमानों के।

समाजवादी पार्टी के प्रत्याशी हाजी इरफान सोलंकी और कांग्रेस के प्रत्याशी हाजी सुहेल अहमद के बीच अगर मुस्लिम वोट बंट गए तो भाजपा के सलिल विश्नोई को फायदा हो सकता है। सलिल विश्नोई सीसामऊ में हिंदू कार्ड खेलते भी नजर आ रहे हैं। हालांकि वो इस बात से इनकार कर रहे हैं, लेकिन प्रचार साफ दिख रहा है। 42 फीसदी मुस्लिम और 28 फीसदी ब्राह्मण वोट हैं। सलिल विश्नोई कहते हैं कि 25 साल से यहां की सीट एक ही परिवार के कब्जे में है जिसे छुड़वाना है।

2017 का चुनाव परिणाम:

समाजवादी पार्टी के हाजी इरफान सोलंकी ने साल 2017 में भारतीय जनता पार्टी के सुरेश अवस्थी को 5826 वोटों के मार्जिन से हराया था। उन्हें कुल 73030 और भाजपा के सुरेश अवस्थी कुल 67204 वोट मिले थे।

4. गोविंदनगर सीटः कांग्रेस का करिश्मा:

कानपुर की गोविंदनगर सीट भाजपा का गढ़ रही है लेकिन इस दफा युवा कांग्रेस प्रत्याशी करिश्मा ठाकुर यहां के भाजपा प्रत्याशी को टक्कर दे रही हैं। करिश्मा ठाकुर का काफिला देखकर लगता है कि चुनाव मैनेजमेंट में 25 साल की इस युवा प्रत्याशी का मैनेजमेंट अच्छा है। उसकी वजह है कि वह एनएसयूआई की दिल्ली में नेता रही हैं। उनके चुनाव का जिम्मा एनएमयूआई की युवा टीम के पास है। बीते उपचुनाव में करिश्मा ठाकुर 10,000 मतों से हार गई थी।

उपचुनाव के बाद से यहां से भाजपा प्रत्याशी सुरेंद्र मैथानी विधायक हैं और इस दफा भाजपा प्रत्याशी भी हैं। भाजपा के मैथानी को यहां से पार्टी के नाम पर वोट मिल सकते हैं। रावतपुर जैसा इलाका इसी विधानसभा क्षेत्र में आता है। रावतपुर वह इलाका है जहां राम लला का मंदिर है हिंदू राजनीति के लिए जाना जाता है। साल 2012 के बाद से यहां भाजपा कभी नहीं हारी है। यह वो सीट है जहां कानपुर में भाजपा सबसे ज्यादा बार जीती है। इसलिए मैथानी जीतने की स्थिति में हैं।

करिश्मा ठाकुर की खास बात यह है कि अगर सुरेंद्र मैथानी भाजपा का हिंदूवादी चेहरा हैं तो करिश्मा ठाकुर युवा चेहरा हैं। दिल्ली यूनिवर्सिटी की छात्रा रही करिश्मा लखीमपुर में किसानों के साथ हुई हिंसा के चलते ट्रैक्टर से चुनाव प्रचार कर रही हैं। वह कहती हैं कि किसानों और महिलाओं के साथ हिंसा का मुद्दा उनके लिए अहम है।

युवाओं को रोज़गार के मुद्दे पर करिश्मा ठाकुर खूब बरस रही हैं। करिश्मा ठाकुर प्रियंका गांधी की टीम का पसंदीदा चेहरा हैं और इनके पिता राजेश सिंह भी राजनीति में रहे हैं। वह 2014 में बसपा की टिकट पर कन्नौज से अखिलेश यादव के खिलाफ चुनाव लड़े लेकिन हार गए। अब उन्होंने बेटी करिश्मा ठाकुर को विधायक बनाने में ताकत झोंक रखी है।

SOURCE

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