AIRA NEWS NETWORK – वीरभूमि महोबा का ऐतिहासिक कीरत सागर अपनी दुर्दशा पर आंसूं बहा रहा है। जिम्मेदारों को कोस रही ऐतिहासिक विरासत अपने अच्छे दिनों की इंतजार कर रही है। ऐसा प्रतीत होने लगा है कि इस खूबसूरत सरोवर की कीर्ति अब इतिहास के पन्नों तक ही सिमट कर रह जाएगी। आल्हा बैठक से अब कर्ण प्रिय आल्हा गायकों के सुर गायब हो चुके हैं। गंदगी और सिर्फ गंदगी उसका सबब बन गई है। घाटों में पानी देखे बरसों बीत गए हैं। आई लव महोबा सेल्फी प्वाइंट से बस तालाब की गंदगी, बदहाली नजर आती है।
चंदेल नरेश कीर्ति वर्मन ने कभी सपने में भी यह नहीं सोचा होगा कि उनके द्वारा बनवाए गए इस तालाब के इतने बुरे दिन भी आ जाएंगे। करीब एक हजार साल पहले बने इस तालाब के चारों तरफ सौन्दर्यीकरण किया जा रहा है। इसके बावजूद जिला प्रशासन ने कीरत सागर को पानी से भरकर उसके वास्तविक सौन्दर्य को संवारने की दिशा में कोई प्रयास नहीं किया।
कीरत सागर के तट पर श्रावण मास की पूर्णिमा तिथि को कजली महोत्सव होता था। महिलाएं घर में उगाई गई कजली को जल में विसर्जित करके पर्व मनाती थीं। वर्षों पुरानी परंपरा और कीरत सागर की दुर्दशा देखकर अब नहीं लगता कि इस बार यहां कजली महोत्सव हो पाएगा। इतिहास के पन्नों पर जाएं तो पता चलता है कि चंद्रावल नदी की सहायक नदी चंदनौर के पानी को रोककर सन 1060 से 1090 के मध्य इस विशाल तालाब को बनवाया गया था। इसकी गहराई कभी इतनी अधिक थी कि लोहे को सोना बनाने वाली पारसमणि को दिल्ली नरेश पृथ्वीराज चौहान से बचाने के लिए चंदेल नरेश परमाल ने इसी कीरत सागर में ले आकर फेंक दिया था।
पृथ्वीराज की सेना सन 1182 में आल्हा ऊदल जैसे महोबा के वीरों से इसी कीरत सागर के तट पर हारी थी, लेकिन अब कीरत सागर अपनों से लगातार मिल रही उपेक्षा से स्वयं हार गया है। बुन्देलखण्ड राष्ट्र समिति के राष्ट्रीय संयोजक तारा पाटकर, केन्द्रीय अध्यक्ष प्रवीण पांडेय, डालचंद्र, डा. अजय बिसरिया, देव त्रिपाठी, अंशू सिंह परमार, चंद्रिका सोनू पांडेय आदि लोगों द्वारा लगातार कीरत सागर के संवर्धन संरक्षण के लिए प्रयास किया जा रहा है lजिम्मेदार अधिकारी व प्रदेश सरकार में बैठे उच्च पदस्थ, ऐतिहासिक विरासत को बचाने के लिए समय नहीं निकाल पा रहे हैं।


















