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नजीबाबाद में एक ऐसा गांव जो आज भी मूलभूत सुविधाओं से वंचित

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नजीबाबाद – जहाँ एक तरफ 2022 विधान सभा चुनाव सर पर योगी सरकार गावँ-गावँ तक प्रधानमंत्री आवास योजना और ग्रामो के विकास पर जोर दे रही है वही जनपद बिजनोर के अधिकारी योगी सरकार की योजनाओं को पलीता लगा अपने विकास पर ध्यान दे रहे है

जी हाँ मामला जनपद बिजनौर के नजीबाबाद तहसील के ग्राम चोहड़ खाता का है जहां आज 21वीं सदी में भी ग्रामीण अपना जीवन रोज़मर्रा की मूलभूत समस्याओं से जूझते हुए नारकीय जीवन व्यतीत कर रहे हैं।

ग्रामीण आज भी कच्चे मकानों झोपड़ी और त्रिपाल डालकर अपना जीवन व्यतीत कर रहे है। वही दूसरी ओर जनपदीय अधिकारी बिजनोर ओडीएफ समीक्षा में बिजनौर प्रशासन अपनी पीठ थपथपा रहा है और दावे किए जा रहे हैं कि जिला बिजनौर खुले में शौचालय मुक्त हो चुका है। परंतु यहां पर ऐसा बिल्कुल भी नहीं है यहां के ग्रामीण आज भी खुले में शौच जाने के लिए मजबूर है क्योंकि ग्राम प्रधानों के द्वारा शौचालय नहीं बनवाए है।

आज भी गांव की महिलाएं लड़कियां बच्चे बुजुर्ग सभी खुले में शौच जाने के लिए अभिशप्त हैं बहू बेटियों को घर में शौचालय ना होने के कारण जंगल में शौच के लिए जाना पड़ता है जहां पर अनेक तरह की समस्याएं का सामना करना पड़ता है परंतु ग्रामीणों की समस्याएं यहीं पर समाप्त नहीं हो रही है गांव में ना तो सड़क है और ना ही पानी की निकासी का कोई विकल्प है सड़क नुमा रास्ते पर पानी भरा रहता है जिसमें समस्त ग्रामीण और राहगीरों को उस मार्ग से ही निकलने के लिए मजबूर होना पड़ता है गंभीर बीमारियों का खतरा बना रहता है आखिर अपनी समस्या कहे तो किस से कहें।

बरसात के मौसम में सड़कों पर पानी भर जाता है जो कि घरों तक में पहुंच जाता है ग्रामीणों के कच्चे मकान बरसात में टपकते रहते हैं जिससे उनके गिरने का भी भय बना रहता है और जान माल की हानि कभी भी हो सकती हैं जिसको न ग्राम प्रधान देखते हैं ना ही सरकारी अधिकारी। अगर उच्च अधिकारी कुछ करते भी हैं तो उनके निचले स्तर के अधिकारी/ कर्मचारी सरकारी योजनाओं का आपस में ही बंटाधार कर मिट्टी में दफन कर देते हैं, जिसके कारण योगी सरकार की छवि को भी बट्टा लग रहा है। ग्रामीण मात्र खेतों में ही कार्य कर कर अपनी जिंदगी का गुजर-बसर करते हैं।

स्वास्थ्य विभाग भी ग्रामीण क्षेत्र में अपनी सुविधाओं को मूल रूप से नहीं पहुंचा पा रहा है यदि कोई ग्रामीण रात्रि में बीमार हो जाता है तो उसको ले जाने के लिए एंबुलेंस को मरीज के घर तक आने में 2 घंटे का समय लगता है रास्ता खराब होने के कारण इसी बीच यह तो मरीज की मृत्यु हो जाती है या रास्ते में ले जाते हुए खड्डे और झटकों की वजह से उसकी मृत्यु हो जाती है।जनप्रतिनिधियों की उपेक्षा के चलते बुक्सा जनजाति के ग्रामीणों को नारकीय जीवन व्यतीत कर रहे है।

बोक्सा जनजाति के ग्रामीणों ने बताया कि हम लोग अपना जीवन बहुत दयनीय स्थिति में कच्चे मकानों में मूलभूत सुविधाओं से वंचित जीवन व्यतीत कर रहे है रोज़ समस्याओं से बच्चों, महिलाओं को दो चार होना पड़ता है। ग्रामीण क्षेत्रों के लिए प्रधानमंत्री जन आवास योजना के माध्यम से बनने वाले मकान बनाने के लिए प्रशासन और सरकार की तरफ से आशा भरी नजर से देख रहे हैं की हम गांव वालों के भी दिन आएंगे आखिर अच्छे दिन कब आएंगे माननीय प्रधानमंत्री जी के सपने आज धूमिल होते नजर आ रहे हैं।

क्योंकि ना तो मकानों पर पक्की छत मिली ना गांव में स्वास्थ्य सेवाएं मिली ना पानी की निकासी और ना सिंचाई के लिए पानी की व्यवस्था है आज भी ग्रामीण बरसात पर ही निर्भर है ग्रामीणों का कहना है कि अगर गांव में सरकारी ट्यूबवेल की सुविधा होती तो हम सब 700 बीघा जमीन मैं खेती करके अनाज की अच्छी पैदावार करके अपने जीवन को और अपनी जरूरतों को पूरा कर सकते हैं अपने बच्चों को एक अच्छा भविष्य दे सकते थे परंतु हम लोग खेती के लिए बारिश पर ही निर्भर हैं जब बरसात होती है तभी हम कोई फसल बो सकते है।

विदित है कि कुछ वर्ष पूर्व एक ग्रामीण के मकान में आग लगने से सब कुछ जलकर राख हो गया था ना अनाज बचा ना पैसा ना घर बिल्कुल बेघर हो गए थे ऐसे परिवार को अभी तक सर ढकने के लिए पक्का मकान तो क्या किसी अधिकारी का आस्वासन तक नही मिला।
सोचना यह है कि इन ग्रामीणों को अपने जनप्रतिनिधि से सरकारी योजनाओं का लाभ कब और कैसे मिलेगा।

कब इनके पक्के मकान बनेंगे, कब सड़कों का निर्माण होगा, ओर कब तक ग्रामीण महिलाएं और लड़कियां बच्चों को खुले में शौच करने जाते रहेंगे। क्या अधिकारी सिर्फ कागजो पर खाना पूर्ति कर अपनी पीठ थपथपाते रहेंगे। कब तक ग्रामीण अपना जीवन इसी तरह जीने को मजबूर रहेंगे क्या उन्हें सपने देखने और सरकार द्वारा मिलने वाली सुविधाओं का अधिकार नहीं है देखते हैं अधिकारीगण कब तक इन ग्रामीणों को सुविधा मुहैया करा पाते हैं।

राजेश सिंघल की रिपोर्ट

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