“जहाँ संस्कृति का संरक्षण हो, वहीं लोकमाता का आदर्श जीवित है” — डॉ. प्रशांत सिंह ने दी अहिल्याबाई होल्कर की 301वीं जयंती पर श्रद्धांजलि

काशीपुर / उत्तराखंड (रिज़वान अहसन ),,,,सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिक पुनर्जागरण की महान प्रेरणा, मालवा की लोकमाता महारानी अहिल्याबाई होल्कर की 301वीं जयंती आज पूरे देश में श्रद्धा और सम्मान के साथ मनाई गई। इस अवसर पर वसुधैव समिति के संस्थापक अध्यक्ष एवं अधिवक्ता डॉ. प्रशांत सिंह ने लोकमाता को विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए कहा — “जहाँ संस्कृति का संरक्षण हो, धर्म का सम्मान हो और प्रजा का कल्याण सर्वोपरि हो — वहीं लोकमाता अहिल्याबाई होल्कर का आदर्श जीवित रहता है।”
कार्यक्रम में उमड़ा जनसैलाब
डॉ. प्रशांत सिंह द्वारा जारी पोस्टर में लोकमाता अहिल्याबाई होल्कर को “हिन्दू धर्म की रक्षक और महिला सशक्तिकरण की प्रबल हस्ताक्षर महान वीरांगना रानी” बताया गया है। 31 मई को आयोजित श्रद्धांजलि कार्यक्रम में बड़ी संख्या में सामाजिक कार्यकर्ताओं, अधिवक्ताओं और युवाओं ने भाग लिया। लोगों ने लोकमाता की प्रतिमा पर पुष्प अर्पित कर शत्-शत् नमन किया।
डॉ. प्रशांत सिंह ने बताया लोकमाता का योगदान
डॉ. सिंह ने कहा कि रानी अहिल्याबाई होल्कर का शासनकाल 1767 से 1795 तक रहा। उन्होंने न केवल मालवा में सुशासन स्थापित किया बल्कि पूरे भारत में सांस्कृतिक पुनर्जागरण का कार्य किया।
डॉ. प्रशांत सिंह ने कहा कि लोकमाता अहिल्याबाई का जीवन बताता है कि शासन का मूल मंत्र “प्रजा का कल्याण” होना चाहिए। उन्होंने औरंगजेब द्वारा तोड़े गए मंदिरों का पुनर्निर्माण कराकर सांस्कृतिक स्वाभिमान को जगाया। आज जब हम उनकी 301वीं जयंती मना रहे हैं, तो हमें उनके आदर्शों को अपने जीवन में उतारने का संकल्प लेना होगा।
वसुधैव समिति द्वारा जल्द ही युवाओं के लिए “लोकमाता अहिल्याबाई होल्कर सुशासन व्याख्यान माला” शुरू करने की घोषणा भी की गई, ताकि नई पीढ़ी उनके जीवन से प्रेरणा ले सके।
कौन थीं लोकमाता अहिल्याबाई होल्कर?
- जन्म: 31 मई 1725, चौंडी गाँव, महाराष्ट्र • शासन: 1767-1795, महेश्वर को राजधानी बनाया • उपलब्धि: इतिहासकारों ने उन्हें “दार्शनिक रानी” कहा है। ब्रिटिश इतिहासकार जॉन कीय ने लिखा — “बिना कलंक के 30 साल शासन करने वाली एकमात्र शासक”
कार्यक्रम का समापन “लोकमाता अहिल्याबाई अमर रहें” के नारों के साथ हुआ।


















