ट्रैक से संसद तक क्यों भारत के भविष्य का नेतृत्व महिलाओं को करना चाहिए – डॉ.पी टी ऊषा

महिला आरक्षण से बदलेगा भारत का लोकतांत्रिक चेहरा – डाक्टर पी.टी.ऊषा ||
नारी शक्ति वंदन अधिनियम समान प्रतिनिधित्व की ऐतिहासिक पहल ||
खेल से संसद तक महिलाओं के नेतृत्व की बढ़ती ताकत,महिलाओं को अवसर मिलेगा तो बदलेगी सोच और व्यवस्था ||
आधी आबादी की भागीदारी से ही बनेगा विकसित भारत
वाराणसी :- डॉ.पी टी ऊषा राज्यसभा सांसद,भारतीय ओलंपिक संघ की अध्यक्ष और राष्ट्रमंडल खेल संघ,भारत की अध्यक्ष ने कहा की मैंने अपना पूरा जीवन भागदौड़ में ही बिताया है पहले केरल की कच्ची सड़कों पर,फिर वैश्विक मंचों पर और अब सार्वजनिक जीवन के गलियारों में | हर कदम पर मुझे कई मुश्किलो का सामना करना पड़ा है कुछ प्रत्यक्ष और कुछ अनकही बाधाओं का भी जिन्होंने महिलाओं को यह बताया कि उनका यहाँ कोई स्थान नहीं है | मैंने यह भी देखा है कि जब ये बाधाएं टूटने लगती हैं तो क्या होता है | अवसर परिणामों को बदल देता है और इससे भी ज़रुरी बात यह है कि यह लोगों की सोच को बदल देता है | यही कारण है कि संविधान (एक सौ अट्ठाईसवाँ संशोधन) विधेयक 2023 नारी शक्ति वंदन अधिनियम केवल एक विधायी उपलब्धि नहीं है यह एक लंबे समय से प्रतीक्षित संरचनात्मक सुधार है | लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में एक तिहाई सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित करना न तो कोई रियायत है और न ही दिखावा यह अधिक प्रतिनिधि और प्रभावी लोकतंत्र की दिशा में एक ज़रुरी कदम है |
खेलों ने हमें क्या सिखाया है
जब मैंने 1984 के लॉस एंजिल्स ओलंपिक में हिस्सा लिया और कुछ ही सेकंड के अंतर से पदक से चूक गई,तब बहुत कम भारतीय लड़कियां थीं जो वैश्विक मंच पर खुद को देख पाती थीं लेकिन पिछले कई दशकों में यह स्थिति बदली है | प्रशिक्षण,बुनियादी ढांचे और पहचान तक पहुंच में सुधार के साथ भारतीय महिलाएं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रमुखता हासिल करने लगीं है |
पी.वी.सिंधु,मीराबाई चानू,विनेश फोगाट और मैरी कॉम जैसी एथलीटें अकेले नहीं उभरीं वे एक ऐसी व्यवस्था का परिणाम हैं जिसने धीरे-धीरे ही सही,पहुंच को व्यापक बनाना शुरू किया | प्रतिनिधित्व आकांक्षाएं पैदा करता है और आकांक्षा,जब समर्थित होती है तो उपलब्धि दिलाती है | सबक साफ है जब महिलाओं को स्थान दिया जाता है तो वे व्यवस्था में केवल भाग नहीं लेतीं,वे शानदार प्रदर्शन भी कर दिखाती हैं |
हर भारतीय के लिए बेहतर शासन
भारत में जमीनी स्तर पर महिलाओं के नेतृत्व का प्रभाव पहले ही देखा जा चुका है 73वें संवैधानिक संशोधन द्वारा पंचायती राज संस्थाओं में महिलाओं के लिए आरक्षण लागू किए जाने के बाद से विभिन्न राज्यों में किए गए कई अध्ययनों से पता चला है कि महिला प्रतिनिधियों के नेतृत्व वाले क्षेत्रों में पेयजल,स्वच्छता,शिक्षा और प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल तक पहुंच में सुधार हुआ है | ये महज़ “महिलाओं के मुद्दे” नहीं हैं, बल्कि ये राष्ट्रीय प्राथमिकताएं हैं | महिला नेता अक्सर सुरक्षित सार्वजनिक स्थान,सुचारू रूप से चलने वाले स्कूल,पोषण और स्वास्थ्य सेवाओं जैसी शासन से जुड़ी उन रोजमर्रा की चुनौतियों पर ध्यान केंद्रित करती हैं जो परिवारों और समुदायों को सीधे तौर पर प्रभावित करती हैं | इस प्रतिनिधित्व को राज्य विधानसभाओं और संसद तक विस्तारित करना केवल निष्पक्षता की बात नहीं है यह शासन की गुणवत्ता में सुधार से जुड़ा है |
प्रतिनिधित्व का आर्थिक महत्व
भारत में महिला श्रम बल की भागीदारी विश्व में सबसे कम है जो लगभग 25 प्रतिशत के आसपास है यह केवल एक सामाजिक चिंता नहीं,बल्कि एक आर्थिक समस्या भी है | विधानसभाओं में महिलाओं का अधिक प्रतिनिधित्व उन नीतियों को प्राथमिकता देने में मदद कर सकता है जो इस अप्रयुक्त क्षमता को उजागर करती हैं जैसे किफायती बाल देखभाल,सुरक्षित कार्यस्थल,ऋण तक पहुंच और महिला उद्यमियों के लिए समर्थन |
मैकिन्से ग्लोबल इंस्टीट्यूट का अनुमान है कि लैंगिक समानता को बढ़ावा देने से भारत की जीडीपी में 700 बिलियन डॉलर तक की वृद्धि हो सकती है | अधिक समावेशी संसद न केवल एक लोकतांत्रिक आवश्यकता है बल्कि एक आर्थिक अनिवार्यता भी है |
सुरक्षा,गरिमा और भागीदारी
भारत भर में लाखों महिलाओं के लिए सार्वजनिक जीवन में भागीदारी अभी भी सुरक्षा,भेदभाव और असमान पहुंच की चिंताओं से प्रभावित है चाहे खेल हो,शिक्षा हो या कार्यस्थल,ये समस्याएं हमारे समाज में गहराई से जड़ें जमा चुकी हैं | संसद में अधिक महिलाओं का मतलब है कि कानून और नीतियां महज़ समझ से नहीं,बल्कि वास्तविक जीवन की हकीकत से आकार लेती हैं | इसका मतलब है प्रवर्तन के लिए मजबूत वकालत, सहायता प्रणालियों के लिए संसाधनों का बेहतर आवंटन और एक न्याय ढांचा जो उत्तरदायी और सुलभ हो | शासन तभी अधिक प्रभावी होता है जब वह उन लोगों के अनुभवों को दर्शाता है जिनकी वह सेवा करता है |
प्रतिनिधित्व और आकांक्षाओं की शक्ति
भारत में सत्ता की छवि लंबे समय से मुख्य रूप से पुरुष प्रधान रही है उस छवि को बदलना केवल प्रतीकात्मक नहीं है बल्कि यह एक बदलावकारी प्रक्रिया है जब मणिपुर,झारखंड,राजस्थान या भारत के किसी भी हिस्से की कोई युवती अपने जैसी दिखने वाली, अपने जैसी बोलने वाली और समान पृष्ठभूमि से आने वाली किसी महिला को देश के कानूनों को आकार देते हुए देखती है तो यह सिर्फ प्रेरणा ही नहीं देता,बल्कि यह संभावनाओं के प्रति उसके विश्वास को भी बदल देती है | आकांक्षा ही सामाजिक परिवर्तन का आधार है। विधानसभाओं में आरक्षण से स्तर कम नहीं होता बल्कि अवसरों का दायरा बढ़ता है | भारत की महिलाओं ने खेल जगत,सशस्त्र बलों,विमानन और व्यावसायिक पदों पर पहले ही कई बाधाओं को पार कर लिया है विधायी प्रतिनिधित्व इस यात्रा का स्वाभाविक अगला कदम है |
अब है कार्यवाही का वक्त
राज्यसभा में सेवा करने का सौभाग्य प्राप्त करने के बाद मैंने प्रत्यक्ष रूप से देखा है कि कैसे विविध दृष्टिकोण बहस और निर्णय लेने की प्रक्रिया को मजबूत बनाते हैं | फिर भी आज लोकसभा में महिलाओं की हिस्सेदारी केवल लगभग 15 प्रतिशत है जो वैश्विक औसत से काफी कम है | नारी शक्ति वंदन अधिनियम पारित हो चुका है अब बस इसे पूरी तरह, निष्ठापूर्वक और बिना देर किए लागू करने की राजनीतिक इच्छाशक्ति की ज़रुरत है |
भारत अपनी आधी आबादी को सर्वोच्च निर्णय लेने वाले निकायों में कम प्रतिनिधित्व देते हुए विकसित राष्ट्र बनने की आकांक्षा नहीं रख सकता | आधी प्रतिभा को दरकिनार करके विकसित भारत का निर्माण नहीं किया जा सकता,न ही आधी आवाज़ पर सच्चा लोकतंत्र फल-फूल सकता है | आगे का रास्ता साफ है सवाल यह है कि क्या हम उस पर चलने का दृढ़ संकल्प रखते हैं (लेखक
राज्यसभा सांसद,भारतीय ओलंपिक संघ की अध्यक्ष और राष्ट्रमंडल खेल संघ,भारत की अध्यक्ष हैं) ||


















