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अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद एक संस्था नहीं है, बल्कि यह राष्ट्र के पुनर्निर्माण का आंदोलन है: अमित शाह

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अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद एक संस्था नहीं है, बल्कि यह राष्ट्र के पुनर्निर्माण का आंदोलन है: अमित शाह
युवा शक्ति ही देश एवं समाज को शिखर पर ले जाने का काम करती है

केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री और भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता अमित शाह ने बतौर मुख्य अतिथि शुक्रवार को नई दिल्ली में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के 69वें राष्ट्रीय अधिवेशन का उद्घाटन किया। इस मौके पर शाह ने यह संदेश दिया कि, ‘अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद एक संस्था नहीं है, बल्कि यह राष्ट्र के पुनर्निर्माण का आंदोलन है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी ने आने वाले 25 वर्षों में भारत को दुनिया का महानतम राष्ट्र बनाने का संकल्प लेने का आह्वान किया है। हम इसे पूरा करने के लिए संकल्पित और प्रतिबद्ध हैं। जो युवा अपने कैरियर के साथ-साथ देश को सँवारता है, वही सही मायने में शिक्षा को प्राप्त करता है।’
अगर अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के संघर्ष को देखा जाए तो यह एकमात्र छात्र संगठन है जो शिक्षा जगत की खामियों को दूर करने का संघर्ष कर रहा है और साथ में चरित्र निर्माण का यज्ञ भी चला रहा है। विद्यार्थी परिषद ने ज्ञान, शील और एकता के अपने मूल मंत्र को आत्मसात करते हुए धैर्यपूर्वक एक पथ का निर्माण किया है।
भारतीय जनता पार्टी के दिग्गज नेता अमित शाह स्पष्ट तौर पर यह मानते हैं कि युवाशक्ति किसी भी देश की रीढ़ की हड्डी होती है और युवाशक्ति ही देश एवं समाज को शिखर पर ले जाने का काम करती है। जब तक भारत प्रत्येक क्षेत्र में आत्मनिर्भर और संपन्न नहीं होता तब तक रुके बगैर इसे पूरा करने में युवाशक्ति की भूमिका महत्त्वपूर्ण होगी।
मोदी जी के नेतृत्व और अमित शाह के कुशल मार्गदर्शन में आज भारत उस मुकाम पर पहुँच चुका है, जहाँ हर समस्या के समाधान के लिए विश्व भारत की ओर आशा के साथ देख रहा है। पूरा देश जानता है कि शाह की नीतियों के तहत देश में घुसपैठ के खिलाफ डिटेक्ट, डिलीट और डिपोर्ट के ‘3D संकल्प’ के साथ ABVP ने पूरे देश में घुसपैठ के खिलाफ जनजागृति लाने का काम किया है। चाहे भाषा और शिक्षा का आंदोलन हो या संस्कृति को बरकरार रखना हो, हर क्षेत्र में विद्यार्थी परिषद ने युवाओं के माध्यम से समाज को ‘स्व’ का महत्त्व बताया है।
मोदी-शाह की जोड़ी ने बीते 9 वर्षों में सांस्कृतिक विरासतों के पुनरुद्धार के साथ-साथ आधुनिक विकास की जो नींव रखी है, उससे तो यह साबित हो जाता है कि हमारी सांस्कृतिक विरासत ही हमारे आधुनिक विकास की पूँजी है, इसके आधार पर ही आधुनिक विकास हो सकता है। आज यह सिद्ध हो चुका है कि सांस्कृतिक विरासत को संजो कर रखना और आधुनिकता के साथ विकास करना परस्पर विरोधी बातें नहीं है, बल्कि दोनों एक-दूसरे को मदद करने वाली बातें हैं।
देश की जनता ने देखा है कि बीते 9 वर्षों में घपले-घोटाले की जगह नई-नई नीतियों को अमल में लाया जा रहा है। मोदी-शाह के दौर में तुष्टिकरण, परिवारवाद और जातिवाद की जगह आज पॉलिटिक्स ऑफ परफॉर्मेंस को स्थापित किया जा चुका है। इस बात को मानने से बिलकुल गुरेज नहीं करना चाहिए कि अमृतकाल में नया भारत सुरक्षित हाथों में है।

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