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परीक्षाओ से पहले उर्वशी बाली ने विद्यार्थियों और अविभावकों को दिए ज़रूरी टिप्स

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काशीपुर / उत्तराखंड,,,, समाजसेवी एवं डी बाली ग्रुप की डायरेक्टर श्रीमती उर्वशी दत्त बाली कहती हैं कि कुछ स्कूलों में बच्चों की परीक्षाएं शुरू हो चुकी है तो कुछ में शुरू होने वाली हैं। ऐसे में हम सभी अभिभावकों को चाहिए कि अपने बच्चों की पढ़ाई पर अधिक से अधिक ध्यान दें क्योंकि बाद में परीक्षा में कम नंबर आने पर हम दोष देते हैं स्कूलों को। स्कूल बदलना समस्या का समाधान नहीं है। समाधान है हमारे द्वारा अपने बच्चों पर ध्यान रखना। उन्हें समय देना। आपने देखा होगा कि किसी परिवार के दो या तीन बच्चे किसी स्कूल में पढ़ते हैं तो उनमें से किसी के बहुत अच्छे नंबर आते हैं तो किसी के बहुत कम। इसका मतलब है स्कूल तो ठीक है लेकिन कमी हमारी परवरिश और बच्चों की पढ़ाई की देखभाल में है। हमारे जिस बच्चे के नंबर अच्छे आए हैं स्कूल उसका भी वही है और जिस बच्चे के नंबर कम आए हैं स्कूल उसका भी वही है। फिर दोष स्कूल का कहां हुआ?
सभी बच्चों के पास 24 घंटे हैं , फर्क सिर्फ़ दिशा का है।
जो कक्षा में प्रथम आता है, उसके पास भी 24 घंटे हैं।
जो औसत अंक लाता है, उसके पास भी वही समय है।और जो आज पढ़ाई में संघर्ष कर रहा है, उसके पास भी उतने ही घंटे हैं।फर्क समय का नहीं, उसके सही उपयोग और दिशा का है।
आज अक्सर देखा जाता है कि बच्चे के अंक कम आते ही
माता-पिता स्कूल बदलने का निर्णय ले लेते हैं।यह सोच अब पुरानी हो चुकी है और इसमें कोई दम भी नहीं है। इससे बच्चों का समय भी बर्बाद होता है और उनका ध्यान भी भटकता है। हकीकत यह है कि जो बच्चा प्रथम आता है,उसे भी उसी स्कूल में वही शिक्षक पढ़ाते हैं,जो दूसरे बच्चों को पढ़ा रहे हैं, जो कम अंक लेकर आ रहा है, कुछ भी नहीं कर पा रहा, वह भी उसी स्कूल, उसी क्लास उसी टीचर, उन्ही किताबों से पढ़ रहा है। जब शिक्षक और स्कूल वही हैं,तो हर बार दोष उन्हीं पर कैसे डाला जा सकता है।सवाल स्कूल या शिक्षक का नहीं है,सवाल इस बात का है कि घर से बच्चे को कैसी दिशा मिल रही है? एक बच्चा दिन के लगभग 16 – 17 घंटे घर में रहता है,और केवल 5–6 घंटे स्कूल और घटा दो घंटा ट्यूशन में । सम्मानित अभिभावकों स्कूल या ट्यूशन सिर्फ़ दिशा देते है,लेकिन उस दिशा पर बच्चा चल रहा है या नहीं यह देखने की ज़िम्मेदारी माता-पिता की होती है।बच्चों को पूरी तरह स्कूल और ट्यूशन के भरोसे छोड़ देना सही समाधान नहीं है।
माता-पिता का दायित्व है कि
बच्चे की दिनचर्या पर ध्यान दें,उसे टाइम टेबल बनाना सिखाएँ,उसकी मेहनत को समझेंऔर उससे नियमित संवाद बनाए रखें ताकि बच्चे हीन भावना का शिकार न हों।
जब बच्चे अपना समय खुद समझकर बाँटना सीखते हैं,
तो परिणाम अपने आप बदलने लगते हैं।इसी दिशा का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है पढ़ाई शुरू करने से पहले मन को शांत करना।बच्चों को यह आदत सिखाई जानी चाहिए कि
वे पढ़ने से पहले 21 बार आँखें बंद कर“ॐ भूर् भुवः स्वः” का जप करें।यह कोई धार्मिक औपचारिकता नहीं,बल्कि दिमाग को स्थिर और एकाग्र करने का सरल अभ्यास है।
क्योंकि शिक्षा के लिए शांत और केंद्रित मन चाहिए,न कि गुस्से या भटके हुए दिमाग से की गई पढ़ाई।अब जब परीक्षाएँ शुरू होने वाली हैं, और कुछ जगह शुरू हो भी चुकी हैतो हर बच्चे को यही संदेश देना चाहिए कि
ऑल द बेस्ट मेरे बच्चों,अच्छे अंक आएँ तो प्रसन्नता की बात है,और यदि अपेक्षा से कम आएँ,तो हिम्मत हारने की कोई वजह नहीं।दम-ख़म के साथ आगे बढ़ते रहिए,मेहनत जारी रखिए क्योंकि परिणाम आज नहीं तो कलज़रूर बदलेंगे।
श्रीमती बाली कहती है कि मार्क्स से नहीं,अनुशासन, मेहनत और सही मार्गदर्शन से ही बच्चों का भविष्य बनता है।
अगर हमें आने वाली पीढ़ी की दशा सुधारनी है,तो पहले
हम मां बाप को अपनी सोच और ज़िम्मेदारी को सही दिशा में लाना होगा।

RIZWAN AHSAN

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