वाराणसी/उत्तरप्रदेश

उर्दू और फ़ारसी साहित्य की विरासत के महान शाइर रम्ज़ी इटावी -फ़ारूक़ आफ़रीदी

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5 अप्रैल पुण्य तिथि पर विशेष

उर्दू और फ़ारसी अदब की विरासत संभालने वाले हिंदुस्तान के महान शाइर रम्ज़ी इटावी का जन्म 1 दिसंबर 1912 को इटावा (उत्तर प्रदेश) में हुआ,
उन्होेने महाराजा उम्मेदसिंह के जमाने में 1932 में राजपुताने को अपना घर बनाया और शिप हाउस पर बने जोधपुर रेडियो पर उर्दू सैक्शन के इंचार्ज बनाए गए। स्वतंत्रता से पहले राजपुताना में अपनी शाइरी से माहौल बनाया और अखंड भारत में धूम मचाई।उन्होंने 1948 में ख़ूनी नुमाइश नामक नज़्म लिखी, जो पंडित नेहरू ने आल इंडिया रेडियो पर प्रसारित करवाई। उनका कलाम भारतीय ज्ञानपीठ के संकलनों में शामिल है। प्रकाश पंडित,
अब्दुल माजिद दरियाबादी, नियाज़ फतेहपुरी, सोहैल अहमद सिदृीकी, अयोध्याप्रसाद गोयलीय, शीन काफ़ निज़ाम, रफीआ नौशीन,नाहीद अख्तर और सलमा सनम आदि ने उन पर आलेख लिखे हैं। प्रोफेसर प्रेमशंकर श्रीवास्तव ने राजस्थान उर्दू अकादमी के लिए उन पर मोनोग्राफ लिखा था।

उन्होंने 5 अप्रैल 2002 को जोधपुर (राजस्थान) में उन्होंने आख़िरी सांस ली, लेकिन उनकी शाइरी आज भी लोगों के दिलों में अपना मक़ाम बनाए हुए है। उनका पूरा नाम ज़हूर अहमद था लेकिन उर्दू अदब में उन्हें उनके तख़ल्लुस (क़लमी नाम): रम्ज़ी इटावी से प्रसिद्धि मिली। उनके पिता मौला बख़्श रहमानी भी स्वयं शाइर थे। उन्होंने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से उर्दू और अंग्रेज़ी में एम.ए. किया। उन्होंने शिक्षा विभाग में अध्यापन किया और आकाशवाणी जोधपुर से भी उनका कलाम प्रसारित होता रहा। अल्लामा सीमाब अकबराबादी उनके उस्ताद थे।

उर्दू की मशहूर पत्रिका ‘शाइर’में उनके लेखों का निरंतर प्रकाशन होता रहा। मशहूर शाइर बेदिल बदायूनी ने उनकी प्राकृतिक कविताओं (नेचुरल नज़्मों) के जादू से प्रभावित होकर उन्हें “मुसव्विर-ए-मनाज़िर” (दृश्यों को चित्रित करने वाला) का ख़िताब दिया। रम्ज़ी साहब तरन्नुम के बजाय तहत तहत में कलाम पढ़ते थे, और मुशायरा लूट लेते थे। जयपुर में मिर्ज़ा इस्माईल की मेज़बानी में आयोजित अखिल भारतीय मुशायरे में उन्होंने उस दौर के प्रतिनिधि शाइरों के साथ कलाम पढ़ा। उनकी मक़बूलियत का आलम यह था कि 1940 से 1980 के दशक तक उनकी हर तरफ़ धूम रही। उर्दू की अधिकतर प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्रिकाओं में उन्हें बड़े सम्मान के साथ प्रकाशित किया जाता रहा। “सहरा में भटकता चाँद” (काव्य संग्रह) राजस्थान उर्दू अकादमी की ओर से 2001 में प्रकाशित प्रमुख कृति है। उनका फ़ारसी कलाम अभी भी अप्रकाशित है। वर्ष 1929 में उनका लेखन प्रारंभ हुआ।

उन्हें अनेक महान हस्तियों जैसे पंडित जवाहरलाल नेहरू, मुंशी प्रेमचंद, हफ़ीज़ जालंधरी, अब्दुल माजिद दरियाबादी, शकील बदायूनी, कैफ़ भोपाली, जोश मलीहाबादी, जिगर मुरादाबादी, फ़ानी बदायूनी, नियाज़ फ़तेहपुरी, निदा फ़ाज़ली व पद्मश्री शीन काफ़ निज़ाम आदि ने सराहा। उनकी रचनाएँ विभिन्न पुस्तकों और शोध कार्यों में शामिल की गईं। मौलाना आज़ाद यूनिवर्सिटी, जोधपुर में उन पर शोध (पीएचडी) भी हुआ है। उनकी एक नज़्म पाँचवीं कक्षा के पाठ्यक्रम में शामिल है, जिसमें उनकी और हफ़ीज़ जालंधरी की नज़्म का तुलनात्मक अध्ययन किया गया है।

वे राजस्थान उर्दू अकादमी की प्रथम जनरल काउंसिल के सदस्य रहे। राजस्थान मुस्लिम वक़्फ़ बोर्ड और शिक्षा विभाग से भी जुड़े रहे। वे “दबिस्तान-ए-आज़ाद” (मौलाना अबुल कलाम आज़ाद की विचारधारा पर आधारित ) के संस्थापक थे। कैफ़ भोपाली के साथ मुशायरे में उनका संवाद बहुत मशहूर रहा। जब कैफ़ भोपाली ने शेर पढ़ा:
“मेरी क़द्र कर ख़ुदाया कि तुझे ख़ुदा बनाया,
तुझे कौन पूछता था मेरी बंदगी से पहले।”

तो रम्ज़ी साहब ने तुरंत उसी बहर में जवाब दिया:

“तू अदम में सो रहा था ये हयात किसने बख़्शी,
तुझे कौन जानता था तेरी ज़िंदगी से पहले।”

उनकी इस हाज़िर-जवाबी पर उन्हें ख़ूब दाद मिली।

ईमान की कसौटी पर उनका एक शेर बहुत मक़बूल हुआ। उन्हें एक मिसरा दिया गया—”तुझसे मैं हरगिज़ न माँगूँ चाहे कुछ भी हो ख़ुदा।” यह शाइराना अज़मत और ईमान दोनों का इम्तिहान था। उन्होंने मुकम्मल और ख़ूबसूरत शेर इस तरह कहा:

“काफ़िराना मुश्रिकाना ज़िंदगी की दुआ,
तुझसे मैं हरगिज़ न माँगूँ चाहे कुछ भी हो ख़ुदा।”

उनमें इतनी क़ुव्वत और सलाहियत थी कि वे अल्लामा इक़बाल तक के शेर पर बेबाक राय रखते थे। जब किसी ने इक़बाल का ज़िक्र करते हुए कहा—“समंदर से मिले प्यासे को शबनम…” तो रम्ज़ी साहब ने फ़रमाया— “समंदर से मिले प्यासे को ‘क़तरा’ होना चाहिए, ये बख़ीली है, रज़्ज़ाक़ी नहीं। समंदर में शबनम कहाँ होती है!” इस पर सभी शाइर दाद देते हुए हँस पड़े।

प्रकृति चित्रण में अद्भुत दक्षता और गहरी आध्यात्मिकता के साथ चिंतन उनकी विशेषता थी। सरल किन्तु प्रभावशाली भाषा, ग़ज़ल और नज़्म दोनों में समान अधिकार उनके काव्य की विशिष्टता थी।

उनके चयनित सुंदर अशआर इस प्रकार है-

गुलाब-ए-सुर्ख़ का जो मर्तबा है फूलों में,
वही जनाबे मुहम्मद का है रसूलों में।

मैं अगर चाहूँ तसव्वुर में करूँ उनसे कलाम,
मुझको आता है भरी बज़्म में तन्हा होना।

सदियों से अम्न-ए-आलम का ख़्वाब देखते हैं,
ताबीर से हो या रब दिल शादमाँ हमारा।

नज़्म: “मुतालआ-ए-फ़ितरत” (प्रकृति का अध्ययन)

चाँद तारों से मुझको उल्फ़त है,
कोहसारों से मुझको उल्फ़त है।

मैं गुलों से कलाम करता हूँ,
कहकशाँ को सलाम करता हूँ।

ठंडी-ठंडी सफ़ेद झीलें हैं,
जगमगाती हुई सबीलें हैं।

हुस्न-ए-फ़ितरत मुतालअे में है,
रूह गोया मुराक़बे में है।

मेरे अल्लाह ये क्या करिश्मा है,
ज़र्रा-ज़र्रा मक़ाम-ए-सजदा है।

रम्ज़ी इटावी उर्दू और फ़ारसी साहित्य के ऐसे महान शाइर थे, जिन्होंने अपनी रचनाओं से प्रकृति, अध्यात्म और मानवीय मूल्यों को नई ऊँचाइयाँ दीं। वे न केवल एक उत्कृष्ट शाइर थे, बल्कि एक गंभीर चिंतक और प्रभावशाली गद्यकार भी थे। उनकी साहित्यिक विरासत आज भी शोध, पाठ्यक्रम और साहित्यिक चर्चाओं में जीवित है।

Sallauddin Ali

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