संगीत एवं मंच कला संकाय में दो दिवसीय शास्त्रीय गायन कार्यशाला आरंभ

वाराणसी, 13 फरवरी 2026। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के संगीत एवं मंच कला संकाय द्वारा कोस्तुभ जयंती समारोह के अंतर्गत आयोजित दो दिवसीय शास्त्रीय गायन कार्यशाला का शुभारंभ पं. लालमणि मिश्र सभागार में हुआ। महामना की बगिया कहे जाने वाले विश्वविद्यालय परिसर में आयोजित इस कार्यशाला ने संपूर्ण वातावरण को सुरमयी बना दिया।
कार्यशाला के आमंत्रित विषय विशेषज्ञ प्रो. समीर दुबले, विभाग–गायन, फ्लेम विश्वविद्यालय, पुणे हैं। वे पंडित जितेंद्र अभिषेकी जी के शिष्य एवं प्रतिष्ठित विद्वान कलाकार हैं। कार्यशाला का विषय “शास्त्रीय गायन के रूप” है, जिसके अंतर्गत शास्त्रीय संगीत की विविध शैलियों, उनकी प्रस्तुति-पद्धति, संरचना, राग-विस्तार, बंदिश, लयकारी तथा व्यावहारिक पक्षों पर विस्तारपूर्वक मार्गदर्शन प्रदान किया जा रहा है।
प्रथम दिवस के सत्र में प्रो. समीर दुबले ने झपताल में निबद्ध राग दिन की पुरिया की बंदिश — “कैसे ये नी लागे सांझ सुहावन, सुन पी के आवन की बात” — तथा एकताल द्रुत में निबद्ध बंदिश — “भरन गगर ना देत, ऐसों ढीठ लगर, घर जाने दे मोहे सांझ भई” — का अभ्यास कराया। उन्होंने राग-विस्तार, स्वर-साधना, आलाप, तान तथा लयकारी की बारीकियों पर विशेष प्रकाश डाला। विद्यार्थियों ने उत्साहपूर्वक सहभागिता करते हुए अभ्यास किया और अपनी जिज्ञासाओं का समाधान प्राप्त किया।
कार्यक्रम में हारमोनियम पर डॉ. विजय कपूर तथा तबला पर सिद्धार्थ चक्रवर्ती ने संगत प्रदान की। इस अवसर पर प्रो. संगीता सिंह, प्रो. प्रेम किशोर मिश्र, पंडित कुबेरनाथ मिश्रा तथा प्रो. के. शशिकुमार की गरिमामयी उपस्थिति रही।
कार्यक्रम की संयोजक प्रो. संगीता पंडित, संकाय प्रमुख एवं विभागाध्यक्षा, गायन एवं संगीतशास्त्र विभाग हैं। आयोजन सचिव के रूप में डॉ. रामशंकर एवं डॉ. कुमार अंबरीश चंचल तथा सह-आयोजन सचिव के रूप में डॉ. ज्ञानेश चंद्र पांडे सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं।
कार्यशाला में संकाय के शिक्षकगण, शोधार्थी एवं विद्यार्थी बड़ी संख्या में उपस्थित रहे। यह आयोजन विद्यार्थियों के व्यावहारिक कौशल के विकास तथा शास्त्रीय संगीत की समृद्ध परंपरा के संरक्षण की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल है।
























