अयातुल्लाहख़ामेनेईशेर-दिल की ज़िंदगी और शहादत

आईन-ए-जवां-मर्दां हक़-गोई ओ बे-बाकी, अल्लाह के शेरों को आती नहीं रूबाही… बेशक! इस्लाम में शहीद का मक़ाम इतना बुलंद है कि मौत नहीं, बल्कि ज़िंदगी की कामयाबी है। अयातुल्लाह अली ख़ामेनेई, जो ईरान के सुप्रीम लीडर थे, अपनी उम्र के 86 साल में भी ऐसा हौसला रखते थे कि दुश्मन की आंखों में खटकते थे। उनकी जवांमर्दी की मिसाल मिलना मुश्किल है, क्योंकि वो अहले बैत और शोहदा-ए-करबला को अपना आदर्श मानते थे। कल 28 फरवरी को इजरायल-अमेरिका के हमले में उनकी शहादत ने दुनिया को हिला दिया। लेकिन इस्लाम की तालीम के मुताबिक, शहीद कभी मरते नहीं, वो जन्नत में ज़िंदा रहते हैं। आइए, उनकी जिंदगी पर नज़र डालें, जहां से पता चलता है कि ये मुजाहिद कैसे बने ?
पैदाइश और शुरूआती ज़िंदगी
अयातुल्लाह ख़ामेनेई का जन्म 19 अप्रैल 1939 को मशहद शहर में हुआ, जो शिया मुसलमानों का पवित्र जगह है। उनके वालिद एक मामूली आलिम थे, और घर में गरीबी थी, लेकिन इल्म-ओ-अमल की रौशनी थी। चार साल की उम्र में कुरान सीखना शुरू किया, और 11 साल में शिया क्लेरिक बन गए। मशहद से नजफ और कुम जाकर इल्म हासिल किया, जहां वो अयातुल्ल
























