“अपराधी कौन-और सज़ा किसे..? धामपुर की घटना ने उठाए मानवाधिकारों पर गंभीर सवाल”-अपराधियों को कठोर से कठोर सजा मिलनी चाहिए: डॉ. तारिक़ ज़की

“अपराधी कौन-और सज़ा किसे..? धामपुर की घटना ने उठाए मानवाधिकारों पर गंभीर सवाल”-अपराधियों को कठोर से कठोर सजा मिलनी चाहिए: डॉ. तारिक़ ज़की
धामपुर/बिजनोर। जनपद बिजनौर के धामपुर हुसैनपुर उर्फ पुराना धामपुर क्षेत्र में 14 मार्च को हुए हमले के बाद एक संवेदनशील और मानवीय पक्ष सामने आया है, जिसने कानून, न्याय और मानवाधिकारों के संतुलन पर गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए हैं। घटना के तीसरे दिन आरोपी पक्ष के परिवार की महिलाएं अपने मासूम बच्चों के साथ संघ के जिला कार्यवाहक के घर पहुंचीं और हाथ जोड़कर माफी की गुहार लगाई।
रोती-बिलखती महिलाओं ने कहा कि “अपराध किसी एक व्यक्ति ने किया है, लेकिन उसकी सज़ा पूरे परिवार और विशेषकर निर्दोष बच्चों को क्यों दी जा रही है?” यह सवाल अब केवल एक परिवार तक सीमित नहीं, बल्कि मानवाधिकारों के मूल सिद्धांतों को चुनौती देता प्रतीत हो रहा है।

महिलाओं का कहना है कि:
उनका घटना से कोई प्रत्यक्ष संबंध नहीं है
परिवार सामाजिक और मानसिक रूप से पहले ही टूट चुका है
बच्चों का भविष्य भय और अनिश्चितता के साये में है
यह स्थिति उस संवैधानिक सिद्धांत पर प्रश्नचिह्न लगाती है, जिसमें कहा गया है— “दोषी को दंड मिले, निर्दोष को संरक्षण।” प्रशासनिक कार्रवाई और जमीनी हकीकत यह है कि
घटना के तीसरे दिन भी क्षेत्र में भारी पुलिस बल तैनात रहा
आरोपी परिवार के घरों पर ताले लटकते रहे
प्रशासन द्वारा संपत्ति की जांच एवं संभावित बेदखली की प्रक्रिया जारी रही
हालांकि प्रशासन का कहना है कि कार्रवाई केवल दोषियों तक सीमित रहेगी, लेकिन जमीनी स्तर पर पूरा परिवार दंडात्मक दबाव का सामना करता दिखाई दे रहा है।
यह मामला सीधे तौर पर भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) से जुड़ा हुआ है।
बिना पूर्ण जांच के बेदखली या कठोर कार्रवाई प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के विरुद्ध हो सकती है
आरोपी के परिवार को प्रताड़ित करना मानवाधिकार उल्लंघन की श्रेणी में आ सकता है
पुलिस प्रशासन ने क्षेत्र में शांति बनाए रखने की अपील की है, वहीं संघ के जिला कार्यवाहक की सुरक्षा भी बढ़ा दी गई है।
सामाजिक एवं मानवाधिकार कार्यकर्ता तथा वर्ल्ड एक्रेडिटेशन ऑफ ह्यूमन राइट्स के राष्ट्रीय जनरल सेक्रेटरी डॉ. तारिक़ ज़की ने कहा कि:
“अपराधियों को कठोर से कठोर सजा मिलनी चाहिए, लेकिन निर्दोष परिवार, विशेषकर महिलाओं और बच्चों को दंडित करना न्याय की भावना के विपरीत है।”
उन्होंने आगे कहा कि यह समय है जब प्रशासन कानून के साथ-साथ मानवता को भी प्राथमिकता दे, ताकि न्याय केवल दंडात्मक न होकर संतुलित और संवेदनशील प्रक्रिया बने।



























