बिजनौर – दीपावली के चलते जहाँ एक और चायनीज झालरों से बाजार गुलजार हो रहे हैं वहीं परम्परागत मिट्टी के चिरागों की माँग घटने से कुम्हारों के चाक धूल फांक रहे हैं और कुम्हार हाथ पर हाथ रखे बेठे हैं। जिस कारण कुम्हार जाति के नवयुवक भी अब अपने पुस्तैनी काम को छोड़कर मजदूरी कर पेट पालने को मजबूर हैं।
बताते चलें कि कुछ वर्षों पूर्व दीपावली के त्यौहार आने से दो माह पहले से ही कुम्हारों के चाक का पहिया घूमना शुरु हो जाता था और बाजार में मिटटी के बर्तन बेचने वाले बड़े दुकानदार कुम्हारों के घर जाकर उन्हें हजारों की तादाद में करवे, सुराही, कुल्हिये, दीपक व हांडी आदि मिटटी के बर्तन के ऑर्डर दिया करते थे। जिस कारण कुम्हारों के परिवार के अधिकतर लोग महीनों पहले से बर्तन बनाने के काम में जुट जाते थे। ऑर्डर पूरा करने पर उन्हें अच्छा खासा मुनाफा भी होता था। जिस कारण कुम्हारों की दीपावली भी बड़े धूम धाम से मनती थी।
साथ ही कुम्हार अपने लगे बंधे किसानों व यजमानों के घरों में भी बर्तन पहुंचाते थे जहाँ से उन्हें बदले में धान मिलते थे जिससे उनके घर खाने लायक चावल हो जाते थे। परन्तु आधुनिकता की अंधी दौड में सब कुछ बदल गया है। अब चायनीज बल्ब, दीपक, मोमबत्ती व झालरों के आने से कुम्हार बिरादरी के लोगों के सामने रोजी रोटी का संकट आ खडा हुआ है। कुम्हार रामसिंह, नन्दराम सिंह, शेर सिंह, उमराव सिंह, महिपाल सिंह, नन्दकिशोर आदि ने बताया कि अब कोई भी दुकानदार मिटटी के बर्तन बनाने का ऑर्डर नहीं देता है। अब तो वे स्वयं ही बाजार में फड़ लगाकर या घर घर जाकर दिये व बर्तन बेचते हैं।
केवल 40 से 50 रूपए प्रति 100 दिए के रेट बड़ी मुश्किल से मिल पाते हैं। जबकि उन्हें बनाने में ईंधन व शारीरक श्रम अधिक लगाना पडता है। जिस कारण लागत भी पूरी नहीं हो पाती है। इसलिये अब रोजी रोटी के लिए भी उन्हें काफी मशक्कत करनी पड़ रही है। वहीं युवा कुम्हार सोमेन्द्र कुमार, ललित कुमार, शीतल प्रजापति, अजय प्रजापति, अरविन्द कुमार दक्ष आदि ने बताया कि उनका मन अब अपने पुस्तैनी काम में नहीं लगता है क्योंकि सारे दिन काम करके भी एक मजदूर के बराबर भी मजदूरी उन्हें नहीं मिल पाती है। केंद्र अथवा राज्य सरकार की ओर से भी कुम्हारों को किसी भी योजना का लाभ नहीं मिल पा रहा है।
माटी कला बोर्ड का गठन जरूर हुआ है परन्तु इससे अभी तक किसी कुम्हार को कोई लाभ नहीं हुआ है। जिस कारण अब कुम्हार जाति का अपने पुस्तैनी कारोबार से मन ऊब गया है और अब वे अन्य प्रकार की मजदूरी करके अपना जीवन यापन कर रहे हैं। वहीं राष्ट्रीय प्रजापति महासंघ उत्तर प्रदेश के प्रदेश प्रभारी पंकज कुमार दक्ष का कहना है कि माटी कला विलुप्त होती जा रही है। अगर जल्द ही सरकार द्वारा कुम्हारों के इस धंधे को बचाने के लिये कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया तो आने वाले समय में इस बात की प्रबल संभाबना है कि परम्परागत पूजन के लिये दीपावली जैसे बडे त्यौहारों पर भी मिटटी के दीपक व बर्तन ढूढें नहीं मिलेगें।
महकार सिंह तोमर की रिपोर्ट


















