लखनऊ में अवैध निर्माण पर एलडीए की कार्यवाही सवालों के घेरे में

सभी पत्रकार को पता है कि भ्रष्टाचार उत्तर प्रदेश सरकार खत्म नहीं कर सकती आम जनता को भी पता है फिर भी आर्टिकल खबरें डेली छपती है लेकिन सुधार जीरो
सीलिंग कार्यवाही के बाद भी खड़ी हो गई इमारतें।
राजधानी लखनऊ में अवैध निर्माण के खिलाफ सख्त कार्रवाई के दावों के बीच लखनऊ विकास प्राधिकरण (एलडीए) की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। अमीनाबाद क्षेत्र के श्रीराम चौराहा के पास जिस भवन को 23 फरवरी 2026 को विधिवत सील किया गया था, वही निर्माण अब लगभग पूर्ण अवस्था में दिखाई दे रहा है। इस घटनाक्रम ने यह आशंका पैदा कर दी है कि सीलिंग की कार्रवाई केवल औपचारिकता बनकर रह गई है और उसके पालन को लेकर विभागीय स्तर पर गंभीर लापरवाही या मिलीभगत हो सकती है।
जोन-6 के अंतर्गत आने वाले अमीनाबाद की संकरी गलियों, कैसरबाग स्थित बासमंडी चौराहा, लालकुआ रोड, हजरतगंज में पिस्ता हाऊस के बगल में, नाका हिंडोला क्षेत्र तथा हुसैनगंज में मोहन होटल के निकट स्थित क्षेत्रों में भी इसी प्रकार की स्थिति सामने आई है। इन स्थानों पर पूर्व में सील की गई इमारतें न केवल पुनः निर्मित हो चुकी हैं, बल्कि कुछ भवनों में व्यावसायिक गतिविधियां भी शुरू हो गई हैं।
यह स्थिति तब उत्पन्न हो रही है जब मंडल आयुक्त और एलडीए उपाध्यक्ष द्वारा अवैध निर्माण के विरुद्ध सख्त कार्रवाई के स्पष्ट निर्देश पूर्व में जारी किए जा चुके हैं। ऐसे में इन निर्देशों की अवहेलना न केवल प्रशासनिक अनुशासन पर प्रश्नचिह्न लगाती है, बल्कि शासन की मंशा पर भी प्रतिकूल प्रभाव डालती है।
वही जब ज़ोनल अधिकारी, सहायक अभियंता (AE) और अवर अभियंता (JE) से फोन पर संपर्क करने का प्रयास किया जाता है, तो वे कॉल उठाने से कतराते हैं। यदि कभी फोन रिसीव भी हो जाता है, तो अत्यंत सामान्य तरीके से यह कहकर मामला टाल दिया जाता है कि “कंपाउंडिंग जमा हो चुकी है।” इस प्रकार की प्रतिक्रिया से यह संदेह और गहरा होता है कि विभागीय स्तर पर जवाबदेही से बचने का प्रयास किया जा रहा है।
कानूनी दृष्टिकोण से देखें तो उत्तर प्रदेश शहरी नियोजन एवं विकास अधिनियम 1973 के अंतर्गत किसी भी अवैध निर्माण को ध्वस्त करना अथवा सील करना प्राधिकरण की वैधानिक जिम्मेदारी है। यदि सीलिंग के पश्चात भी निर्माण कार्य जारी रहता है, तो यह न केवल अधिनियम का उल्लंघन है, बल्कि संबंधित अधिकारियों की जवाबदेही भी निर्धारित करता है।
इसके अतिरिक्त, सील तोड़कर निर्माण कार्य करना भारतीय दंड संहिता की धाराओं के अंतर्गत दंडनीय अपराध की श्रेणी में आ सकता है। ऐसी स्थिति में संबंधित व्यक्तियों के विरुद्ध एफआईआर दर्ज कर कठोर कार्रवाई की जानी अपेक्षित है।
स्थानीय स्तर पर यह भी आरोप सामने आ रहे हैं कि कंपाउंडिंग शुल्क जमा होने के आधार पर अवैध निर्माण को वैधता प्रदान करने का प्रयास किया जा रहा है। जबकि विधिक रूप से कंपाउंडिंग केवल सीमित प्रकार के निर्माण विचलनों पर ही लागू होती है और यह किसी भी प्रकार से मानकों के पूर्ण उल्लंघन को वैध नहीं बनाती।
वहीं, जनसामान्य द्वारा आईजीआरएस के माध्यम से की गई शिकायतों पर “मामला विचाराधीन है” या “पुलिस अभिरक्षा में सीलिंग की गई है” जैसे जवाब दिए जा रहे हैं। इसके बावजूद यदि निर्माण कार्य निर्बाध रूप से जारी रहता है, तो यह प्रशासनिक जवाबदेही और पारदर्शिता पर गंभीर प्रश्न खड़ा करता है।
इस पूरे प्रकरण में सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि आखिर किसके संरक्षण में सील तोड़कर निर्माण कार्य पुनः प्रारंभ किया जा रहा है। यदि यह स्थिति यथावत बनी रहती है, तो यह न केवल कानून के शासन (Rule of Law) के सिद्धांत को कमजोर करेगा, बल्कि शहरी नियोजन व्यवस्था को भी प्रभावित करेगा।
अब यह देखना शेष है कि क्या इस प्रकरण में उच्च स्तर पर संज्ञान लिया जाएगा या फिर मामला न्यायालय की शरण में जाएगा। वर्तमान परिस्थितियों को देखते हुए जनहित याचिका (PIL) दायर करना एक प्रभावी कानूनी विकल्प के रूप में उभर सकता है, जिसके माध्यम से संबंधित अधिकारियों की जवाबदेही सुनिश्चित की जा सकती है।
यदि समय रहते इस पर कठोर और निष्पक्ष कार्रवाई नहीं की गई, तो अवैध निर्माण का यह सिलसिला भविष्य में और अधिक गंभीर शहरी अव्यवस्था को जन्म दे सकता है।


















