सारनाथ को अट्ठारहवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में बाबू जगत सिंह ने किया चिह्नित

सारनाथ के इतिहास में बड़ा बदलाव,बाबू जगत सिंह के उत्खनन को मिली आधिकारिक स्वीकृति ||
इतिहास में सुधार सारनाथ की खोज में बाबू जगत सिंह के योगदान को मिली मान्यता ||
सारनाथ को बाबू जगत सिंह ने कराया था चिह्नित,एएसआई ने दी आधिकारिक मान्यता ||
एएसआई ने बदला शिलापट्ट,सारनाथ के उत्खनन का श्रेय अब बाबू जगत सिंह को ||
सारनाथ की ऐतिहासिक पहचान में बाबू जगत सिंह का नाम हुआ स्थापित ||
सारनाथ के इतिहास में नया अध्याय,बाबू जगत सिंह के योगदान को मिली स्वीकृति ||
शोध के आधार पर बदला इतिहास, सारनाथ के उत्खनन में बाबू जगत सिंह का योगदान स्वीकार ||
सदियों बाद मिला सम्मान बाबू जगत सिंह के उत्खनन से प्रकाश में आया था सारनाथ
वाराणसी:- प्रमाणिक दस्तावेजों एवं प्राथमिक ऐतिहासिक साक्ष्य के विस्तृत अध्ययन के बाद भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण नई दिल्ली ने स्वीकार किया है कि वाराणसी में सारनाथ स्थल बाबू जगत सिंह के द्वारा कराए गए उत्खनन से सर्वप्रथम प्रकाश में आया है | उक्त मान्यता के आलोक में ही पत्रांक संख्या F.No.T-17/10/ 2024-EE (35099) दिनांकित 10 फ़रवरी 2026 को सारनाथ परिसर में नए संशोधित शिलापट्ट को लगाया गया है | उल्लेखनीय है कि बाबू जगत सिंह ने 18वीं सदी के उत्तरार्ध में सारनाथ क्षेत्र में उत्खनन संबंधी कार्य को आरंभ कराया था लंबे समय तक इतिहास के पन्नों में यह तथ्य दबा रहा | विगत वर्षों में जगत सिंह रॉयल फैमिली प्रोजेक्ट शोध समिति के अथक परिश्रम और प्रामाणिक स्रोतों के आधार पर अब इसे आधिकारिक मान्यता मिल गई है विशेषज्ञों का मानना है कि यह निर्णय भारतीय इतिहास लेखन की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है | ज्ञातव्य रहे पिछले वर्ष पत्रांक संख्या F.No.T-17/10/ 2024- EE दिनांकित 26 दिसम्बर 2024 को सारनाथ परिसर में धर्मराजिका शिलापट्ट को भी संशोधित कर नया शिलापट्ट लगाया गया है। बाबू जगत सिंह शोध समिति के संरक्षक प्रदीप नारायण सिंह के अनुसार यह कार्य भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की प्रेरणा से संपन्न हुआ है |
बाबू जगत सिंह रॉयल फैमिली शोध समिति ने उन प्रमाणित दस्तावेजों को भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण नई दिल्ली के समक्ष रखा है जिसके आधार पर औपनिवेशिक शासन के समय से चली आ रही गलत मान्यता अब समाप्त हुई है |
शिलापट्ट परिवर्तन कार्य में काशी के विद्वानों,विश्वविद्यालयों,महाविद्यालयों, जवाहरलाल नेहरू एवं कोलकाता विश्वविद्यालय,लखनऊ तथा पटना विश्वविद्यालय आदि के वर्तमान एवं अवकाश प्राप्त प्रवक्ताओं का हमें योगदान मिला है | वाराणसी गाइड एसोसिएशन एवं भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण नई दिल्ली का भी हमें समर्थन मिला साथ ही काशी के धर्म गुरुओं,इलेक्ट्रॉनिक एवं प्रिंट मीडिया,डिजिटल तथा आकाशवाणी का भी हमें समर्थन मिला है | उक्त योगदान और समर्थन के लिए हम आप सभी को हृदय से नमन करते हैं इस निर्णय से वाराणसी सहित पूरे देश में प्रसन्नता की लहर है |
बाबू जगत सिंह की छठवीं पीढ़ी के वंशज प्रदीप नारायण सिंह ने कहा यह हमारे पूर्वजों के आशीर्वाद आप सभी के सहयोग व समर्थन का ही परिणाम है कि आज उनके ऐतिहासिक योगदान को देश ने स्वीकारा है | यह केवल हमारे परिवार व समिति के लिए ही नहीं अपितु वाराणसी के साथ ही देश की ऐतिहासिक विरासत के लिए भी गर्व का विषय है | श्री सिंह ने कहा हमारा शोध निरंतर जारी है आगे शीघ्र ही कुछ नए तथ्य प्रकाश में आएंगे, देश को उससे अवगत कराया जाएगा |
पत्रकार वार्ता के दौरान शोध समिति के सदस्य,अधिवक्ता त्रिपुरारी शंकर,प्रोफेसर राणा पीबी सिंह,अरविंद कुमार सिंह एडवोकेट,अशोक आनंद,डॉ (मेजर ) अरविंद कुमार सिंह,राजेंद्र कुमार दुबे वरिष्ठ पत्रकार,मनीष खत्री अवनीधर, एहसन अहमद,विकास एवं शमीम उपस्थित रहे | सभी ने एक स्वर में कहा कि सत्य और प्रमाणों पर आधारित,शोध अंततः अपना स्थान बना ही लेता है | इतिहासकारों का मत है कि इस निर्णय से न केवल सारनाथ के इतिहास को नया आयाम मिला है अपितु स्थानीय नायकों के योगदान को भी राष्ट्रीय परिपेक्ष में पुन स्थापित करने का मार्ग प्रशस्त हुआ है सचमुच यह शोध भारतीय इतिहास के पन्नों में सच्चाई की नींव डालने जैसा है |
प्रदीप नारायण सिंह ने आह्वान किया कि उपरोक्त अनुक्रम में नालंदा,भरूच, अमरावती इत्यादि स्थलों पर इतिहासकारों,शोधकर्ताओं को प्राथमिक ऐतिहासिक साक्ष्य के आधार पर नवीन शोध की आवश्यकता है ||


















