स्कूली बच्चों के कांधो पर बस्ते का बोझ , या दूकानदारों से निजी स्कूलों का कमीशन का खेल

काशीपुर / उत्तराखंड (रिज़वान अहसन ),,,,,,प्रदेश भर मे ncert लागू होने के बाद भी निजी स्कूलों की मनमानी चरम पर है शहर की सड़कों पर स्कूल बसें अब भी नियत समय से दौड़ती हैं। बच्चों के कांधो पर बैग अब भी भारी हैं। फर्क बस इतना है कि इन बैगो पर वजन अब किताबों से ज्यादा, कमीशन का है। सवाल यह है कि पढ़ाई महंगी है या उसे महंगा बनाया जा रहा है? निजी स्कूलों द्वारा किताबों, ड्रेस और अन्य शैक्षणिक सामग्री में भारी कमीशनखोरी की खबरें अब फुसफुसाहट नहीं रहीं। अभिभावकों की जेब पर बोझ है, पर आवाज़ हल्की है। क्योंकि मामला बच्चों की पढ़ाई का है। और इस देश में सबसे आसान काम है मां-बाप की चिंता को बाजार में बदल देना। अभिभावकों का आरोप है कि स्कूल विशिष्ट दुकानों से ही किताबें और यूनिफॉर्म खरीदने का दबाव बनाते हैं। बाहर से खरीदने पर सूक्ष्म-सी चेतावनी स्कूल की निर्धारित किताबें ही मान्य होंगी। किताबों को छोड़िये नोट बुक भी स्कूल के नाम के प्रिंट वाली ही होनी चाहिये, किताबें वही, सिलेबस वही, लेकिन दाम अलग। और अंतर का नाम है और वो नाम है मोटा कमीशन। नाम न छापने की शर्त पर एक बड़े स्कूल के संचालक कहते हैं, निर्धारित दुकानों से सामान खरीदने पर हमें मोटा कमीशन और गिफ्ट ऑफर होता है। हम तो दुकानदारों से इतना ही कहते हैं कि बच्चों के अभिभावकों को कुछ छूट दे दें। हम उसी से खुश हैं। यह कुछ छूट इतनी बड़ी रकम है, जिसका हिसाब किताब आगे की कड़ी में करेंगे। लेकिन हाँ अभिभावकों का बजट जरूर गड़बड़ा गया है। एक अन्य स्कूल संचालक बेबाकी से कहते हैं, जो लोग निजी स्कूलों को बिना लाभ का व्यापार बताते हैं, वे झूठ बोलते हैं। आप पुराने स्कूलों को देखिए कितनी ब्रांच खुल गईं। बड़े उद्योगपति इस क्षेत्र में निवेश कर रहे हैं। फ्रेंचाइजी मॉडल पर स्कूल शहर-शहर खुल रहे हैं। सरकार चाहे तो हमें कमर्शियल श्रेणी में डाल दे। यह बयान अपने आप में बहस है। क्या शिक्षा सेवा है या उद्योग? अगर उद्योग है तो क्या उसके नियम वही होंगे जो किसी मॉल या होटल के होते हैं? और अगर सेवा है तो फिर यह मुनाफा किस नाम पर? कुछ अभिभावकों से बात हुई। पहचान सार्वजनिक न करने की शर्त पर बोले, हमें अपने बच्चे की पढ़ाई पर फोकस करना है। आवाज उठाएंगे तो बच्चे पर असर पड़ेगा। संगठन बने, शोर हुआ, लेकिन हुआ क्या? यह खामोशी डर की है या विवशता की? शायद दोनों की। जनप्रतिनिधि, प्रशासन सबको पता है, ऐसा अभिभावक कहते हैं। फिर कार्रवाई क्यों नहीं? क्या रसूख इतना मजबूत है कि सवाल पूछना भी मुश्किल हो गया है? कमीशनखोरी की चर्चा नई नहीं है। लेकिन हर साल एडमिशन सीजन में यह मुद्दा फिर सामने आता है और फिर धीरे-धीरे दब जाता है। शिक्षा विभाग और स्थानीय प्रशासन की भूमिका भी सवालों के घेरे में है। नियम हैं पर क्या उनका पालन है? निरीक्षण है पर क्या निष्पक्ष है? जब शिक्षा का केंद्र ज्ञान से हटकर गणित हो जाए कितना कमीशन, कितना मार्जिन तब समाज को ठहरकर सोचना चाहिए। यहां सवाल उठता है कि क्या स्कूलों को किसी विशेष दुकान से खरीद की अनिवार्यता का अधिकार है?क्या अभिभावकों को विकल्प देने की व्यवस्था सुनिश्चित की गई है? क्या किताबों और यूनिफॉर्म की कीमतों पर कोई पारदर्शिता है? और सबसे बड़ा सवाल क्या शिक्षा सच में सेवा है या खुला बाजार? यह कहानी सिर्फ एक शहर की नहीं हो सकती। यह उस प्रवृत्ति का आईना है जिसमें स्कूल भवन ऊंचे होते जा रहे हैं और भरोसा छोटा। क्योंकि अब मासूम बच्चों की किताबों में अक्षर कम, मार्जिन ज्यादा दिखने लगे हैं। शिक्षा का पन्ना पलटिए, कहीं उस पर मूल्य-टैग तो नहीं लगा? अब देखना है इस खबर के बाद क्या बदलता है। या फिर यह भी हर साल की तरह सत्र बदलने के साथ बदल जाएगी।
*साभार -राजेश सरकार




























