“सीएचसी स्योहारा में नवजात की मौत पर मानवाधिकार आयोग सख्त-डॉ. तारिक ज़की ने दायर की याचिका-योग्य महिला चिकित्सक, नवजात आपात चिकित्सा सुविधा की माँग
“सीएचसी स्योहारा में नवजात की मौत पर मानवाधिकार आयोग सख्त – डॉ. तारिक ज़की की याचिका से प्रशासन में हलचल”
बिजनौर/लखनऊ।
जनपद बिजनौर के स्योहारा स्थित सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (सीएचसी) में नवजात शिशु की असामयिक मृत्यु का मामला अब मानवाधिकार आयोग तक पहुंच गया है। इस गंभीर प्रकरण में Dr. Mohd Tariq Zaki, राष्ट्रीय जनरल सेक्रेटरी, World Accreditation of Human Rights ने हस्तक्षेप करते हुए मामला Uttar Pradesh State Human Rights Commission के समक्ष उठाया है।
डॉ. ज़की द्वारा प्रस्तुत विस्तृत शिकायत में मीडिया में प्रकाशित समाचारों के आधार पर आरोप लगाया गया है कि सीएचसी स्योहारा में नियमित एमबीबीएस महिला चिकित्सक की अनुपस्थिति के बावजूद प्रतिमाह 100 से अधिक प्रसव कराए जा रहे हैं। शिकायत के अनुसार संबंधित घटना में प्रसूता को सुबह भर्ती किया गया, प्रसव के बाद नवजात की हालत बिगड़ी और उसे हायर सेंटर रेफर किया गया, किंतु रास्ते में ही उसकी मृत्यु हो गई।

डॉ. ज़की ने मानवाधिकार संरक्षण अधिनियम, 1993 की धारा 12 के अंतर्गत याचिका दायर करते हुए इसे भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 (जीवन एवं व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) का स्पष्ट उल्लंघन बताया है। शिकायत में मृतक नवजात के परिजनों को ₹5 लाख मुआवज़ा देने तथा संबंधित लापरवाह चिकित्सकीय एवं प्रशासनिक अधिकारियों के विरुद्ध दंडात्मक कार्रवाई की मांग की गई है।
आयोग ने मामले का संज्ञान लेते हुए डायरी संख्या 1481/IN/2026 जारी कर दी है, जिससे प्रशासनिक हलकों में हलचल मच गई है। सूत्रों के अनुसार स्वास्थ्य विभाग से विस्तृत आख्या मांगी जा सकती है।
वर्ल्ड एक्रेडिटेशन ऑफ ह्यूमन राइट्स लंबे समय से जनहित और मानवाधिकार संरक्षण के मुद्दों पर सक्रिय भूमिका निभाता रहा है। डॉ. तारिक ज़की का यह हस्तक्षेप दर्शाता है कि संगठन केवल औपचारिक बयानबाजी तक सीमित नहीं, बल्कि ठोस कानूनी कार्रवाई के माध्यम से पीड़ित परिवारों को न्याय दिलाने के लिए प्रतिबद्ध है।
स्थानीय नागरिकों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने इस पहल का स्वागत करते हुए कहा कि यदि सार्वजनिक स्वास्थ्य संस्थानों में जवाबदेही तय नहीं की गई, तो ऐसी घटनाएं दोहराई जाती रहेंगी।
मानवाधिकार के क्षेत्र में यह हस्तक्षेप उन परिवारों के लिए आशा की किरण बनकर उभरा है, जो अक्सर प्रशासनिक उदासीनता के कारण न्याय से वंचित रह जाते हैं।
























