“मोबाइल के सिपाही, स्क्रीन के शहज़ादे – तारीख़ की सबसे कमज़ोर नस्ल तैयार!”
“मोबाइल के सिपाही, स्क्रीन के शहज़ादे – तारीख़ की सबसे कमज़ोर नस्ल तैयार!”
आईरा न्यूज़ नेटवर्क
खबर वही जो हो सही
धामपुर/बिजनौर —
सन 2000 के बाद पैदा हुई पीढ़ी, जो आज 23-24 साल की उम्र में है, इंसानी तारीख़ की सबसे कमज़ोर नस्ल साबित हो रही है।
ना जिस्मानी ताक़त, ना ज़ेहनी सख़्ती — बस सोशल मीडिया का नशा और बटन दबाकर ‘ब्लॉक-कल्चर’।
👉 पाँच किलोमीटर पैदल चलना मुश्किल,
👉 आधे घंटे धूप में खड़ा होना नामुमकिन,
👉 और मामूली इख़्तिलाफ़ पर अनफ़ॉलो-रिश्ता ख़त्म पक्का।
सब्र 0% और ग़ुस्सा 100%।
बुज़ुर्गों का कहना है कि अगर इस नस्ल पर कभी ग़ज़्ज़ा या यमन जैसी आज़माइश आ गई, तो लकड़ी से आग जलाना तो दूर, इन्हें मशरिक़ और मग़रिब का फ़र्क़ तक मालूम नहीं होगा।
📱 जिनकी तरबियत बुज़ुर्गों ने नहीं, बल्कि व्हाट्सऐप, इंस्टाग्राम और फ़ेसबुक ने की हो — उनसे क्या उम्मीद की जाए?
सोशल मीडिया डाउन होते ही ये ऐसे बौखला जाते हैं जैसे सांस रुक गई हो।
राहे-निजात:
माहिरीन का कहना है, अभी भी वक़्त है। अपनी नस्लों को क़ुरआन, सीरत, ग़ैरत, हया और जद्द-ओ-जहद सिखाइए, वरना ये पूरी कौम सोशल मीडिया की लत में गुम हो जाएगी।
अल्लाह तआला हमारी नस्लों को हिदायत और बेदारी अता फ़रमाए।
आमीन।





