बीएचयू में पाली भाषा एवं भारतीय ज्ञान परंपरा पर अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन का उद्घाटन

वाराणसी, 17 फरवरी 2026: काशी हिन्दू विश्वविद्यालय (बीएचयू) के वैदिक विज्ञान केंद्र में आज तीन दिवसीय अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन “भारतीय ज्ञान प्रणाली में पाली भाषा एवं साहित्य का योगदान” का उद्घाटन किया गया। कला संकाय के पाली एवं बौद्ध अध्ययन विभाग द्वारा आयोजित यह सम्मेलन 17 से 19 फरवरी 2026 तक चलेगा, जिसमें भारत सहित छह देशों के विद्वान, भिक्षु एवं शोधार्थी सहभागिता कर रहे हैं।
उद्घाटन सत्र का प्रारंभ भगवान बुद्ध की प्रतिमा तथा बीएचयू के संस्थापक महामना पंडित मदन मोहन मालवीय की प्रतिमा पर पुष्पांजलि अर्पित कर किया गया। इसके पश्चात बौद्ध मंगलाचरण तथा विश्वविद्यालय कुलगीत प्रस्तुत किया गया।
विभागाध्यक्ष डॉ. अरुण कुमार यादव ने स्वागत भाषण में सभी विशिष्ट अतिथियों एवं अंतरराष्ट्रीय प्रतिनिधियों का अभिनंदन किया तथा सम्मेलन में उनकी सहभागिता के लिए आभार व्यक्त किया।
सम्मेलन संयोजक डॉ. बुद्ध घोष ने बताया कि सम्मेलन हेतु कुल 141 सार (Abstract) प्राप्त हुए थे, जिनमें से 81 शोध-पत्र प्रस्तुति के लिए चयनित किए गए हैं।
कला संकाय की अधिष्ठाता प्रो. सुषमा घिल्डियाल ने इस आयोजन को “बौद्धिक प्रतिभाओं की आकाशगंगा” बताते हुए विश्वास व्यक्त किया कि सम्मेलन से महत्वपूर्ण शैक्षणिक परिणाम प्राप्त होंगे। उन्होंने कला संकाय को भाषा एवं भारतीय ज्ञान परंपराओं के अध्ययन का एक सशक्त केंद्र भी बताया।
मुख्य अतिथि डॉ. केंजी ताकाहाशी, टोयो विश्वविद्यालय (जापान) ने भारत और जापान के मध्य गहरे सांस्कृतिक एवं बौद्धिक संबंधों पर प्रकाश डाला तथा जापान में पाली साहित्य के संरक्षण में विद्वानों के योगदान को रेखांकित किया।
विशिष्ट अतिथि एवं नावा नालंदा महाविहार के कुलपति प्रो. सिद्धार्थ सिंह ने अपने संबोधन में कहा कि बौद्ध धर्म का वैश्विक विस्तार बल या विजय के माध्यम से नहीं, बल्कि करुणा और धम्म के प्रसार से हुआ है। उन्होंने मानव पीड़ा की समझ के लिए अभिधम्म के मनोवैज्ञानिक आयामों की प्रासंगिकता पर बल दिया तथा पाली साहित्य में बढ़ती अंतरराष्ट्रीय रुचि का उल्लेख करते हुए हाल ही में भारत के प्रधानमंत्री को भेंट किए गए वर्ल्ड टिपिटक को सांस्कृतिक आदान-प्रदान और वैश्विक संवाद का महत्वपूर्ण प्रतीक बताया।
अपने मुख्य वक्तव्य में प्रो. के. टी. एस. सराओ ने पाली की मिश्रित भाषिक प्रकृति पर चर्चा करते हुए सम्राट अशोक की भूमिका को बुद्ध के उपदेशों के प्रसार में अत्यंत महत्वपूर्ण बताया। सत्र की अध्यक्षता करते हुए प्रो. रवीन्द्र पंथ ने बुद्ध के संदेश “बहुजनहिताय, बहुजनसुखाय” को धम्म का मूल तत्व बताते हुए इसे दैनिक जीवन में अपनाने की आवश्यकता पर बल दिया।
उद्घाटन सत्र का समापन आयोजन सचिव डॉ. शैलेन्द्र कुमार सिंह द्वारा धन्यवाद ज्ञापन के साथ हुआ। आगामी दो दिनों में सम्मेलन के अंतर्गत विभिन्न तकनीकी सत्रों एवं शैक्षणिक चर्चाओं का आयोजन किया जाएगा।























