काशी एवं नेपाल का सांस्कृतिक सम्बन्ध अटूट – स्वामी श्री शंकर पुरी महाराज

महामना मदन मोहन मालवीय जी की तपोभूमि काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के संस्कृतविद्या धर्मविज्ञान संकाय में पहली बार ‘काशीनेपालशास्त्रसङ्गम:’ का आयोजन हुआ।
द्विदिवसीय इस संगम का उद्घाटन वैदिक एवं पौराणिक मंगल उद्घोष के साथ आज दिनांक 13.02.2026 को 11 बजे से संकाय के सभागार में सम्पन्न हुआ। कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए समस्त कार्यक्रम के परिकल्पक व सूत्रधार संकायप्रमुख प्रो. राजाराम शुक्ल ने भारत एवं नेपाल के भौगोलिक, सांस्कृतिक, धार्मिक, सामाजिक, राजनीतिक एवं पारिवारिक सम्बन्धों की प्राचीनता, दृढ़ता एवं महत्ता पर प्रकाश डालते हुए बताया कि बाबा विश्वनाथ के क्षेत्र काशी में जिस प्रकार प्राचीनकाल से ही शास्त्रों के पठन-पाठन एवं शास्त्रार्थ की परम्परा रही है उसी प्रकार बाबा पशुपतिनाथ के क्षेत्र नेपाल में भी रही है। नेपाल की वैदुष्य परम्परा में काशी का तथा काशी की वैदुष्य परम्परा में नेपाल का अतुल्य योगदान रहा है और आज भी है। दोनों राष्ट्रों की एकता एवं समृद्धि हेतु हमें इस परम्परा को और आगे बढ़ाना चाहिए।
कार्यक्रम के मुख्यातिथि काशी के श्रीअन्नपूर्णा मठ-मन्दिर के महन्त स्वामी श्री शंकर पुरी जी महाराज ने धार्मिक दृष्टि से काशी एवं नेपाल के तीर्थ क्षेत्रों पर प्रकाश डाला तथा बताया कि द्वादश ज्योतिर्लिंगों में अन्यतम ज्योतिर्लिंग केदारनाथ जी का दर्शन बाबा पशुपतिनाथ जी के दर्शन के बिना अपूर्ण है। दोनों मिलकर ही पूर्ण ज्योतिर्लिंग बनते है। काशी एवं नेपाल का सांस्कृतिक सम्बन्ध अटूट है।
कार्यक्रम के विशिष्ट तिथि के रूप में नेपाल संस्कृत विश्वविद्यालय, नेपाल से पधारे प्रो. केशव शरण अर्याल ने नेपाल की शास्त्रीय परम्परा में काशी के योगदान पर अपने अत्यन्त ही प्रभावी वक्तव्य से सबको सम्बोधित किया तथा बताया कि आज भी नेपाल में यह लोकोक्ति प्रचलित है कि ”विद्या हराए काशी जानू, न्याय नपाए गोरखा जानू”।
सारस्वत अतिथि के रूप में सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय, वाराणसी से पधारे प्रो. हरि प्रसाद अधिकारी ने भारत व नेपाल की धार्मिक, सांस्कृतिक एकता आदि पर प्रकाश डालते हुए बताया कि आज भी नेपाल में संकल्प बोला जाता है तो कहा जाता है- ”भारतवर्षे आर्यावर्त्तैकदेशान्तर्गते नेपालदेशे” अर्थात् भारतवर्ष व आयावर्त्त के अन्तर्गत ही नेपाल भी है। अत: हम सब एक हैं। हमारी यह एकता सदा बनी रहे और उत्तरोत्तर और दृढ़ता को प्राप्त करती रहे। इसमें इसप्रकार के कार्यक्रम का विशेष योगदान होता है।
कार्यक्रम का संचालन प्रो. ब्रजभूषण ओझा ने किया तथा धन्यवाद ज्ञापन डॉ. नारायण प्रसाद भट्टराई ने किया।
उद्घाटन सत्र में प्रो. हृदयरंजन शर्मा, प्रो. कृष्णकान्त शर्मा, प्रो. कमलेश कुमार जैन, प्रो. हरीश्वर दीक्षित, प्रो. धनंजय कुमार पाण्डेय, प्रो. विनय कुमार पाण्डेय, प्रो. शीतला प्रसाद पाण्डेय, प्रो. शत्रुघ्न त्रिपाठी, प्रो. रामनारायण द्विवेदी, प्रो. पतंजलि मिश्र, प्रो. माधव जनार्दन रटाटे, प्रो. शशिकान्त द्विवेदी, प्रो. शैलेश कुमार तिवारी, डॉ. सुभाष पाण्डेय, डॉ. श्रीराम ए.एस., डॉ. रामेश्वर शर्मा, डॉ. मधुसूदन मिश्र, डॉ. राहुल मिश्र आदि विद्वान, नेपाल से पधारे दशाधिक विद्वान तथा समस्त छात्र उपस्थित रहे।
कार्यक्रम के द्वितीय सत्र में भारत एवं नेपाल के श्री सुवास शर्मा, डॉ. विश्वनाथ धिताल, डॉ. लक्ष्मण आचार्य, डॉ. रामप्रसाद पौडेल, डॉ. उपेन्द्र दाहाल, श्री सुदर्शन गौतम, श्री सात्त्विक जालिहाल, श्री प्रदीप पौडेल, श्री विनीत ठाकर, श्री रामकृष्ण आदि अनेक विद्वानों ने न्याय, व्याकरण, मीमांसा, वेदान्त आदि विषयों में गम्भीर शास्त्रचर्चा प्रस्तुत की जो अत्यन्त ही प्रासंगिक एवं उपयोगी थी। भारत एवं नेपाल के राष्ट्रगान से कार्यक्रम की पूर्णता हुई।
























