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सोशल मीडिया बच्चों के लिए सार्थकता भरा कम बल्कि भटकाव की परिस्थिति ज्यादा..!!

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सोशल मीडिया से दैनिक दिनचर्या और सेहत पर बुरा प्रभाव

सोशल मीडिया के बढ़ते इस्तेमाल ने हर किसी को सोशल मीडिया का मुरीद बना दिया है। आजकल हर उम्र के लोगों से साथ साथ सोशल मीडिया का बच्चों पर प्रभाव भी देखा जा रहा है। अलग अलग सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म की वजह से बच्चों पर नजर रखना मां बाप के लिए बड़ी मुसीबत बन चुका है। आज के समय में सोशल मीडिया का विस्तार काफी तेजी से हो रहा है और इसमें बच्‍चों की मौजूदगी रफ्तार पकड़ रही है देखा जा रहा है कि बच्चे छोटी उम्र से ही स्मार्टफोन के आदी होते जा रहे हैं और अपना अधिक समय इनके साथ बिताना पसंद कर रहे हैं वहीं बच्चों पर सोशल मीडिया के अच्छे और बुरे प्रभाव दोनों देखे जा रहें हैं!स्कूली बच्चों की बात करें तो स्कूल जाने वाले बच्चे सप्ताह में उतनी नींद खराब कर रहे हैं जितने समय व सोशल मीडिया पर व्यतीत करते है!छोटे बच्चे जो सोशल मीडिया का अधिक उपयोग करते हैं औसतन रात में केवल कुछ घंटे की नींद ही ले पाते हैं।
विचारणीय है कि बच्चों में सोशल मीडिया का जुनून इस कदर हावी है कि न तो उनको रात की नींद की परवाह है और न ही सेहत की चिंता!स्वाभाविक है कि पूर्ण नींद के अभाव में बच्चों में चिड़चिड़ापन आ जाता है और सेहत पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।
कुछ भी हो सोशल मीडिया का बच्चों की मानसिकता पर इतना हावी होना कहीं न कहीं चिंतनीय है!इसमें कोई दो मत नहीं कि दिन बच्चों मे यह लत के समान होती जा रही है अत्यधिक मोबाइल का उपयोग और सोशल मीडिया की करीबी से बच्चों को आंखों की समस्या भूख न लगने की समस्या आम होती जा रही है।
कुछ फीसद बच्चों ने तो साल भर के भीतर किसी न किसी तरह के खेल मे पैसा लगाया और इसमें वे अधिकतर आनलाइन सट्टेबाजी के शिकार भी हुए। यानी सोशल मीडिया बच्चों के लिए सार्थकता भरा कम बल्कि भटकाव की परिस्थिति ज्यादा निर्मित कर रहा है। अभिभावक माता पिता और जवाबदेही और हम सबको सोशल मीडिया की उपयोगिता और करीबी के घातक प्रभाव को बताना होगा। समय के अनुसार उपयोग और भरपूर नींद लेने के लिए प्रेरित करना होगा। बच्चों को भी अपनी जवाबदेही समझनी होगी कि सोशल मीडिया से दैनिक दिनचर्या और सेहत पर बुरा प्रभाव नहीं हो। इसलिए सकारात्मक नीति का निर्माण करना होगा।

विकास अग्रवाल
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