भारत की अगली अंतरिक्ष कहानी में पूर्वोत्तर की अहम भूमिका

▪️SIA-India राष्ट्रीय अंतरिक्ष उद्योग संवाद को गुवाहाटी ले जाएगा
नॉर्थईस्ट इंडिया स्पेस वर्कशॉप 2026 . 26–27 अगस्त 2026 | गुवाहाटी, असम
गुवाहाटी: स्पेस इंडस्ट्री एसोसिएशन ऑफ इंडिया (SIA-India), नॉर्थ ईस्टर्न स्पेस एप्लीकेशंस सेंटर (NESAC) के सहयोग से 26–27 अगस्त 2026 को गुवाहाटी स्थित FREMAA, असम वाटर सेंटर में नॉर्थईस्ट इंडिया स्पेस वर्कशॉप 2026 का आयोजन करेगा। इसमें सरकार, रक्षा, अंतरिक्ष, दूरसंचार, उद्योग, स्टार्टअप, निवेश, शिक्षा जगत और अंतरराष्ट्रीय संगठनों से 200 से अधिक हितधारकों के शामिल होने की उम्मीद है।
“Leveraging Space Technology: Regional Transformation to Global Reach” विषय पर आयोजित यह कार्यशाला इस बात पर विचार करेगी कि क्या पूर्वोत्तर भारत अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी के केवल उपयोगकर्ता की भूमिका से आगे बढ़कर अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी के विकास, परीक्षण, वाणिज्यिक उपयोग और दक्षिण-पूर्व एशिया तथा ग्लोबल साउथ के लिए अंतरिक्ष-आधारित समाधानों के प्रवेश द्वार के रूप में उभर सकता है।
राष्ट्रीय अंतरिक्ष दिवस के संदर्भ में आयोजित यह कार्यशाला 23 अगस्त 2023 को चंद्रयान-3 की चंद्रमा पर ऐतिहासिक सॉफ्ट लैंडिंग के महत्व से आगे बढ़ते हुए भारत की अंतरिक्ष यात्रा के अगले चरण पर ध्यान केंद्रित करेगी—यानी देश की तेजी से बढ़ती अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था में कौन भाग लेता है, किसे इसका लाभ मिलता है और कौन इसमें योगदान देता है, इसका दायरा व्यापक करना। यह पहल नई दिल्ली के बाहर SIA-India की पहली बड़ी क्षेत्रीय पहल है।
भारत का अंतरिक्ष क्षेत्र अब वाणिज्यिक क्रियान्वयन के एक नए चरण की ओर बढ़ रहा है। 2021 से अब तक भारतीय SpaceTech स्टार्टअप्स ने 285 कंपनियों से जुड़े 241 फंडिंग राउंड में लगभग 871 मिलियन अमेरिकी डॉलर जुटाए हैं, जबकि 2021 में 12 राउंड के जरिए यह राशि लगभग 43 मिलियन अमेरिकी डॉलर थी। अकेले 2026 में स्टार्टअप्स ने इक्विटी फंडिंग के रूप में लगभग 113 मिलियन अमेरिकी डॉलर आकर्षित किए हैं। जुलाई 2026 तक IN-SPACe ने निजी संस्थाओं को 105 प्राधिकरण जारी किए थे। वहीं, सफल विक्रम-1 मिशन के साथ भारत निजी ऑर्बिटल लॉन्च क्षमता के एक नए चरण में प्रवेश कर चुका है।
SIA-India का मानना है कि इस अगले चरण में पूर्वोत्तर भारत महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। क्षेत्र के आठ राज्य भारत के कुल भौगोलिक क्षेत्रफल का 7.97 प्रतिशत हिस्सा हैं और पांच देशों के साथ 5,484 किलोमीटर लंबी अंतरराष्ट्रीय सीमा साझा करते हैं। इसकी रणनीतिक स्थिति, चुनौतीपूर्ण भौगोलिक परिस्थितियां और प्राकृतिक आपदाओं के प्रति उच्च संवेदनशीलता उपग्रह संचार, पृथ्वी अवलोकन, SAR, जियोस्पेशियल इंटेलिजेंस और अंतरिक्ष-आधारित आपदा-रोधक क्षमता की मांग पैदा करती है। इनका उपयोग कनेक्टिविटी, आपदा प्रबंधन, कृषि, बुनियादी ढांचे, प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन और सीमा निगरानी जैसे क्षेत्रों में किया जा सकता है।
इस क्षेत्र में एक मजबूत संस्थागत आधार भी पहले से मौजूद है। NESAC कृषि, आपदा प्रबंधन, प्राकृतिक संसाधन, बुनियादी ढांचे और संचार जैसे क्षेत्रों में अंतरिक्ष अनुप्रयोगों पर काम कर चुका है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, पूरे पूर्वोत्तर में अंतरिक्ष अनुप्रयोगों से जुड़ी करीब 130 परियोजनाएं संचालित की जा चुकी हैं। North Eastern Spatial Data Repository (NeSDR) भूमि, जल, बुनियादी ढांचे, भू-भाग और आपदा से संबंधित जानकारी को कवर करने वाला एक क्षेत्रीय जियोस्पेशियल आधार उपलब्ध कराता है। अब अगला अवसर इन क्षमताओं को निजी उद्यम, निवेश, प्रौद्योगिकी विकास और ग्राहकों से जोड़ने का है।
SIA-India के अध्यक्ष डॉ. सुब्बा राव पावुलुरी ने कहा, “पूर्वोत्तर की रणनीतिक स्थिति, विशिष्ट परिचालन परिस्थितियां और दक्षिण-पूर्व एशिया से इसकी निकटता इसे ऐसी क्षमताएं विकसित करने का अवसर देती हैं, जिनकी प्रासंगिकता पूरे क्षेत्र से कहीं आगे तक हो सकती है। यहां SIA-India की मौजूदगी इसी दोतरफा अवसर को तलाशने के बारे में है—यह समझने के लिए कि अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी पूर्वोत्तर को किस तरह बदल सकती है और पूर्वोत्तर भारत की अंतरिक्ष महत्वाकांक्षाओं को किस तरह आगे बढ़ा सकता है।”
SIA-India के महानिदेशक श्री अनिल प्रकाश ने कहा, “पूर्वोत्तर के लिए अगला कदम उसकी मौजूदा वैज्ञानिक और संस्थागत क्षमताओं को वाणिज्यिक अंतरिक्ष इकोसिस्टम से जोड़ना है। अवसर एक और संस्थागत परत बनाने का नहीं, बल्कि अनुसंधान, स्टार्टअप्स, सरकारी आवश्यकताओं, निवेश और ग्राहकों के बीच मजबूत रास्ते तैयार करने का है। यदि हम इस कड़ी को सही ढंग से स्थापित कर पाते हैं, तो पूर्वोत्तर डाउनस्ट्रीम अनुप्रयोगों के लिए वास्तविक परिस्थितियों में परीक्षण का केंद्र बन सकता है और इन समाधानों को भारत से बाहर के बाजारों तक पहुंचाने के लिए एक लॉन्चपैड की भूमिका निभा सकता है।”
आसियान देशों के करीब होने और दक्षिण-पूर्व एशिया तथा ग्लोबल साउथ के साथ समान परिचालन परिस्थितियों के कारण, भारत के Act East जुड़ाव के और मजबूत होने के साथ पूर्वोत्तर एक महत्वपूर्ण तकनीकी सेतु की भूमिका निभा सकता है। अवसर केवल पूर्वोत्तर के लिए अंतरिक्ष अनुप्रयोग विकसित करने का नहीं, बल्कि पूर्वोत्तर से अंतरिक्ष समाधान विकसित करने का है—ऐसी क्षमताएं तैयार करने का, जो कठिन भौगोलिक परिस्थितियों, चरम मौसम और दूर-दराज में बसी आबादी की जरूरतों को पूरा कर सकें और जिन्हें पूरे क्षेत्र में बड़े पैमाने पर लागू किया जा सके।






