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केराकत में तालाब पट्टा घोटाला: मछली पालन का सीजन खत्म, गरीब पट्टाधारियों व सरकार के ₹1 करोड़ से अधिक डूबे

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जौनपुर | केराकत
तहसील केराकत, जनपद जौनपुर में सरकारी तालाबों के पट्टों को लेकर एक बड़ा प्रशासनिक घोटाला सामने आया है, जिसने सैकड़ों गरीब मछुआरों और किसानों की आजीविका पर गहरा संकट खड़ा कर दिया है। इस मामले में न सिर्फ गरीब पट्टाधारियों को भारी आर्थिक नुकसान हुआ है, बल्कि सरकारी राजस्व को भी करोड़ों रुपये की क्षति पहुंचने की बात सामने आ रही है।

जून में खत्म हुए पुराने पट्टे, अगस्त में हुई नई नीलामी

जानकारी के अनुसार तहसील केराकत क्षेत्र में जून 2025 में सभी पुराने सरकारी तालाब पट्टों की अवधि समाप्त हो गई थी। इसके बाद अगस्त 2025 में प्रशासन द्वारा करीब 400 से अधिक सरकारी तालाबों की दोबारा नीलामी कराई गई। इस नीलामी में बड़ी संख्या में गरीब मछुआरे, किसान, स्वयं सहायता समूह और स्थानीय लोग शामिल हुए।

नीलामी प्रक्रिया पूरी होने के बाद प्रशासन ने सफल बोलीदाताओं से करीब ₹2 करोड़ रुपये से अधिक की राशि जमा कराई, लेकिन हैरानी की बात यह है कि चार महीने से अधिक समय बीत जाने के बावजूद आज तक किसी भी पट्टाधारी को आधिकारिक पट्टा पत्र (लीज ऑर्डर) उपलब्ध नहीं कराया गया।

₹1 करोड़ से अधिक राशि का कोई हिसाब नहीं

सूत्रों के मुताबिक पट्टाधारियों द्वारा जमा कराई गई कुल राशि में से करीब ₹1 करोड़ से अधिक रुपये न तो सरकारी खाते में स्पष्ट रूप से दर्ज दिखाई दे रहे हैं और न ही संबंधित पट्टाधारियों को वापस किए गए हैं। अब जबकि वर्ष 2025 का मछली पालन का पूरा सीजन समाप्त हो चुका है, यह साफ हो गया है कि यह रकम न तो सरकार के किसी काम आई और न ही गरीब पट्टाधारियों के — यानी यह पैसा पूरी तरह डूब चुका है।

पट्टा न मिलने से पूरा मछली पालन सीजन बर्बाद

पट्टाधारियों का कहना है कि बिना आधिकारिक पट्टा पत्र के वे तालाबों में मछली बीज डालने, चारा डालने या किसी भी प्रकार का कार्य नहीं कर सके। प्रशासनिक अनुमति के अभाव में उन्हें डर बना रहा कि कहीं अवैध कब्जे या कार्रवाई का शिकार न हो जाएं।

परिणामस्वरूप साल 2025 का पूरा मछली पालन सीजन पूरी तरह बर्बाद हो गया, जिससे सैकड़ों परिवारों की आमदनी शून्य हो गई। अब अगला मछली पालन सीजन वर्ष 2026 से ही शुरू हो पाएगा।

तहसील के चक्कर काट रहे पट्टाधारी, कोई जिम्मेदारी लेने को तैयार नहीं

पीड़ित पट्टाधारियों का आरोप है कि वे पिछले कई महीनों से रोजाना तहसील केराकत के चक्कर काट रहे हैं, लेकिन न तो कोई अधिकारी स्पष्ट जवाब दे रहा है और न ही किसी प्रकार का लिखित आदेश या फाइल दिखाई जा रही है। कभी लेखपाल, कभी नायब तहसीलदार तो कभी तहसीलदार कार्यालय भेजकर उन्हें टाल दिया जा रहा है।

दबंगों और माफिया तत्वों के कब्जे के आरोप

इस बीच कई तालाबों पर दबंगों और माफिया तत्वों द्वारा अवैध कब्जे की शिकायतें भी सामने आ रही हैं। आरोप है कि जिन तालाबों की नीलामी हो चुकी है, वहां कुछ प्रभावशाली लोग जबरन मछली पालन कर रहे हैं, जबकि वैध पट्टाधारी सिर्फ दफ्तरों के चक्कर काटने को मजबूर हैं।

प्रशासनिक मिलीभगत की आशंका

इस पूरे मामले में प्रशासनिक लापरवाही के साथ-साथ मिलीभगत की भी आशंका जताई जा रही है। सवाल यह उठता है कि जब पट्टाधारियों से करोड़ों रुपये वसूल लिए गए, तो अब तक पट्टा पत्र क्यों जारी नहीं किए गए? जमा की गई राशि का पूरा लेखा-जोखा कहां है और किसकी जिम्मेदारी तय की जाएगी?

पट्टाधारियों की दो टूक मांग

पीड़ित पट्टाधारियों ने प्रशासन से साफ तौर पर मांग की है कि
या तो तत्काल सभी वैध पट्टाधारियों को पट्टा पत्र जारी किए जाएं,या फिर उनकी जमा की गई पूरी राशि ब्याज सहित वापस की जाए।

आंदोलन की चेतावनी

पट्टाधारियों ने चेतावनी दी है कि यदि जल्द ही इस मामले में ठोस कार्रवाई नहीं हुई, तो वे जिलाधिकारी कार्यालय जौनपुर और मुख्यमंत्री कार्यालय लखनऊ के समक्ष बड़ा आंदोलन करने को मजबूर होंगे, जिसकी पूरी जिम्मेदारी प्रशासन की होगी।

यह मामला अब न केवल गरीबों की आजीविका से जुड़ा है, बल्कि प्रशासन की पारदर्शिता और जवाबदेही पर भी गंभीर सवाल खड़े करता है।

Sallauddin Ali

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