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SHRC का सख्त एक्शन तीन नोटिस बेअसर, DM बिजनौर को आयोग में हाज़िर होने का आदेश मानवाधिकार मामले में प्रशासन की खुली अवहेलना उजागर

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SHRC का सख्त एक्शन
तीन नोटिस बेअसर, DM बिजनौर को आयोग में हाज़िर होने का आदेश
मानवाधिकार मामले में प्रशासन की खुली अवहेलना उजागर

बिजनोर-ब्रेकिंग न्यूज़
उत्तर प्रदेश राज्य मानवाधिकार आयोग (SHRC) ने बिजनौर जनपद से जुड़े एक गंभीर मानवाधिकार मामले में जिला प्रशासन की लगातार लापरवाही पर सख्त रुख अपनाया है। आयोग ने तीन-तीन नोटिस जारी होने के बावजूद रिपोर्ट दाखिल न किए जाने को गंभीर अवमानना मानते हुए जिला मजिस्ट्रेट, बिजनौर को व्यक्तिगत रूप से या प्रतिनिधि के माध्यम से आयोग के समक्ष उपस्थित होने का आदेश दिया है।


मामला ग्राम सबदलपुर, थाना स्योहारा निवासी भूदेव सिंह से जुड़ा है, जिसमें वर्ल्ड एक्रेडिटेशन ऑफ ह्यूमन राइट्स के राष्ट्रीय जनरल सेक्रेटरी डॉ तारिक़ ज़की द्वारा मानवाधिकार उल्लंघन की शिकायत दर्ज कराई गई थी। आयोग ने शिकायत पर संज्ञान लेते हुए 24 सितंबर 2025 को जिला मजिस्ट्रेट को जाँच कर 13 नवंबर 2025 तक रिपोर्ट प्रस्तुत करने के निर्देश दिए थे।
आदेशों की अनदेखी, नोटिस पर नोटिस
निर्धारित समय सीमा में रिपोर्ट न मिलने पर आयोग ने
14 नवंबर 2025
और पुनः 16 दिसंबर 2025
को नोटिस जारी किए, लेकिन इसके बावजूद जिला प्रशासन की ओर से कोई रिपोर्ट आयोग को नहीं भेजी गई।
आयोग का कड़ा संदेश
आयोग की कार्यवाही में स्पष्ट शब्दों में दर्ज किया गया है कि बार-बार आदेशों की अनदेखी को हल्के में नहीं लिया जा सकता। मामले की गंभीरता को देखते हुए आयोग ने निर्देश दिया है कि—
“जिला मजिस्ट्रेट, बिजनौर स्वयं उपस्थित होकर या अपने प्रतिनिधि के माध्यम से स्पष्टीकरण सहित रिपोर्ट प्रस्तुत करें।”
इस प्रकरण की अगली सुनवाई 20 जनवरी 2026 को दोपहर 12:30 बजे तय की गई है।
प्रशासनिक जवाबदेही कटघरे में
मानवाधिकार जैसे संवेदनशील मामलों में आयोग के निर्देशों की अवहेलना ने प्रशासनिक कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। जानकारों के अनुसार यदि अगली सुनवाई तक भी रिपोर्ट प्रस्तुत नहीं की जाती है, तो आयोग द्वारा सख्त अनुशंसा, प्रतिकूल टिप्पणी या उच्च स्तर पर कार्रवाई की संस्तुति की जा सकती है।
यह मामला अब केवल एक शिकायत नहीं, बल्कि मानवाधिकार संरक्षण बनाम प्रशासनिक उदासीनता का प्रतीक बनता जा रहा है।

वही डॉ तारिक़ ज़की ने कहा कि “जिला प्रशासन की निरंतर लापरवाही पीड़ित के मानवाधिकारों का उल्लंघन है।”

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