निजी विद्यालयों एवं बुक स्टेशनरी संचालकों की जालसाजी अभिभावकों को लग रही करोड़ों का चूना

निजी विद्यालयों एवं बुक स्टेशनरी संचालकों की जालसाजी अभिभावकों को लग रही करोड़ों का चूना
एक्सक्लूसिव खबर:
सुमत सिसोदिया की कलम से
आपको बता दें कि हर साल मार्च अप्रैल के महीने में जब निजी विद्यालयों में जब पढ़ाई का नया सत्र शुरू होता है तो इसी के साथ शुरू हो जाता है करोड़ों रुपए का गोरखधंधा इस कालाबाजारी को निजी विद्यालय संचालक एवं बुक स्टेशनरी संचालक दोनों मिलकर अंजाम देते और सदैव की तरह पिसता चला आ रहा है बेचारा अभिभावक जी हां हम बात कर रहे हैं हर साल मार्च अप्रैल के महीने में स्कूल प्रशासन एवं बुक स्टेशनरी संचालकों की मिलीजुली साथ गांठ से पाठ्यक्रम के नाम पर होती चली आ रही कालाबाजारी के गोरख धंधे की..…
आपको बता दें कि गरीब गुरबा परिवार के बच्चों को अच्छी शिक्षा दिलवाने के लिए प्रदेश एवं केंद्र सरकार ने कई योजनाएं लागू की हुई हैं जिसके चलते निजी विद्यालयों में भी गरीब परिवार के बच्चों के लिए भी कुछ सीट सुनिश्चित की गई हैं जिसके तहत हर विद्यालय द्वारा इन गरीब बच्चों को प्रवेश दिया जाना अनिवार्य है एवं उनके पाठ्यक्रम से लेकर यूनिफॉर्म तक के लिए प्रदेश एवं केंद्र सरकार ने योजना के तहत उचित व्यवस्था की है इसके बावजूद भी निजी विद्यालय संचालक अपनी करतूत से बाज नहीं आ रहे हैं और हर साल सत्र बदलते ही क्षेत्र के बुक स्टेशनरी संचालकों से अनुबंध कर लेते है जिसके चलते कौड़ियों में मिलने वाले पाठ्यक्रम एवं यूनिफॉर्म को बेचारे अभिभावक मोटी रकम खर्च करके लेने को विवश हो जाते हैं और इस कालाबाजारी में इकट्ठी की गई धनराशि को निजी विद्यालय संचालक एवं बुक स्टेशनरी संचालक आपस में बंदर बांट कर लेते हैं प्रदेश सरकार की लाख कोशिशें के बावजूद भी अपने रसूख के चलते निजी विद्यालय संचालक एवं बुक स्टेशनरी संचालक इसको कृत्य को करने से बाज नहीं आ रहे हैं और कभी अभिभावक मंडलों द्वारा ज्यादा प्रेशर पड़ने पर इन गरीब गुरबा बच्चों का स्कूल से नाम काटने के लिए भी अभिभावक को मजबूर कर देते हैं कुछ स्कूल संचालकों ने तो बेशर्मी की सभी हदें पार करके स्कूल की रिपूटेशन के नाम पर गरीब परिवार के बच्चों को स्कूल में प्रवेश न देकर सरकार की योजनाओं को भी ठेंगा दिखा दिया है बात यहीं खत्म नहीं होती स्कूल संचालक हर साल पाठ्यक्रम में तब्दीली कर देते हैं जिसके पीछे का उद्देश्य केवल इतना है की कहानी नई कक्षाओं में आने वाले बच्चे पुराने छात्रों से उसे कक्षा का पाठ्यक्रम आपस में आदान-प्रदान न कर लें अभिभावकों की जेब पर डकैती डालने के लिए यह षड्यंत्र भी हर साल स्कूल संचालकों द्वारा रचा जाता है।इसी सापेक्ष में बात अगर हापुड़ जनपद की करें तो दीवान पब्लिक स्कूल, दिल्ली पब्लिक स्कूल ,मिनी लैंड कन्वेंट स्कूल, ब्रह्मा देवी इंटर कॉलेज, जीडी गोयंका पब्लिक स्कूल टैगोर शिक्षा सदन, ब्रेनवेव पब्लिक स्कूल, केएमस इंटर कॉलेज, विबग्योर इंटरनेशनल स्कूल एवं टैगोर पब्लिक इंटर कॉलेज यह वह नाम चिन्ह स्कूल है जहां के अभिभावक स्कूल संचालकों एवं बुक स्टेशनरी संचालकों की इस कालाबाजारी को सहने के लिए मजबूर हैं गौर तलब है कि इन निजी विद्यालयों और बुक स्टेशनरी संचालकों की मनमानी पर अंकुश लगाने के लिए प्रदेश सरकार द्वारा हाल फिलहाल में एक जिओ शिक्षा विभाग को भेजा गया है सभी निजी विद्यालयों को कठोरता से उपरोक्त जिओ में निर्धारित नियम व शर्तों का पालन करने की बात कही गई है बावजूद इसके किसी भी निजी विद्यालय में इस जिओ का पालन होता दिखाई नहीं पड़ रहा है अब देखने वाली बात यह है कि जहां एक तरफ प्रदेश एवं केंद्र सरकार नई शिक्षा नीति को लागू करने के लिए हमेशा तत्पर है वहां दूसरी ओर इस शिक्षा पद्धति को लागू करवाने के लिए इन निजी विद्यालयों एवं बुक स्टेशनरी संचालकों द्वारा की जा रही कालाबाजारी पर अंकुश लगाने के लिए सक्षम होगी या अभिभावकों की जेब पर डाका डालते हुए पाठ्यक्रम एवं स्कूल यूनिफार्म के नाम पर निजी विद्यालय और स्टेशनरी संचालक जनपद में चल रहे इस गोरखधंधे को यूं ही अंजाम देते रहेंगे और शासन प्रशासन आंखें बंद किया यह यह नंगा नाच यूं ही देखता रहेगा?
सुमत सिसोदिया
प्रदेश महासचिव
आईरा इंटरनेशनल रिपोर्टर्स एसोसिएशन (उत्तर प्रदेश) जनपद हापुड़






