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जल का महत्व जैविक अस्तित्व के लिये आवश्यक – धर्मजीत

AIRA NEWS NETWORK – जल को जीवन की संज्ञा दी जाती है।वास्तव में जल का महत्व जैविक अस्तित्व के लिये आवश्यक है।जीवन की उत्पत्ति का संबंध जल से ही है।जीव जीवन में यह अमृत के समान है।मानव जीवन की प्रत्येक विकासात्मक गतिविधि जल से ही संबंधित है।यह वैश्विक संसाधन है।शुध्द पेयजल आपूर्ति मौलिक अधिकार है।जल जीवन मिशन व ग्रामीण क्षेत्र में नल द्वारा जल की संकल्पना का उद्देश्य भी यही है।दूर-दराज के क्षेत्रों में भी पाइप लाइन द्वारा शुध्द जल की आपूर्ति की पहुंच सुनिश्चित हो रही है।

इसका लाभ भी दिखाई दे रहा है।अधिकारों के साथ सदैव कतिपय महत्वपूर्ण कर्तव्य भी होते हैं।जिनका संबंध प्रत्येक व्यक्ति से है।वर्षा ऋतु प्राकृतिक संसाधनों के संग्रह का महत्वपूर्ण समय होता है।कहा गया है कि प्रकृति में संतुलन स्थापित करने की क्षमता होती है।वर्षा की बूंदों के रूप में प्रकृति उपहार देने का कार्य करती है।जरूरत है बादल की बूंदों का हम अधिक से अधिक संग्रह करें।प्राचीन मानव सभ्यता में प्रमुख सिंधु घाटी की सभ्यता जल संरक्षण के दृष्टिकोण से उन्नत थी।

नगर विन्यास में ड्रैनेज सिस्टम व विशाल स्नानागार की संकल्पना का उद्देश्य जल संरक्षण ही था।ऐतिहासिक विकास की कड़ी में चाहे मगध साम्राज्य के उद्भव की बात करें या 16 महाजनपदों का विश्लेषण,सभी जगह जल को कृषि, व्यापार संपन्नता, सुरक्षा व उन्नति से जोड़ा गया है।वर्तमान परिस्थिति में भी शासकीय योजनाओं में जलापूर्ति व प्रत्येक घर जल पहुंच को सुनिश्चित बनाने का सकारात्मक प्रयास किया जा रहा है।जल संरक्षण की महत्ता भी बताया जाता है।जरूरी है जल संरक्षण व संचयन को प्रत्येक नागरिक सामाजिक क्रान्ति व व्यक्तिगत जिम्मेदारी के रूप में स्वीकार करें।वर्षा की बूंदें व जल की बूंदों को सहेजने की आदत का विकास करना होगा।जल सर्वाधिक मूल्यवान संसाधन हैं।कृषि, उद्योग, पशुपालन व जीवन के लिये जल जरूरी है।

गांव या शहर में बारिश की बूंदों को तालाब या जलाशय में पहुंच के लिये सामाजिक प्रयास जरूरी है।मेघ पर्याप्त रूप में वर्षा ऋतु में पानी देते हैं।इनको जल पोखरों ,तालाबों या जलाशयों से जोड़कर साल भर पानी का उपयोग किया जा सकता है।छतों में पाइप के सहायता से या सोक पिट के माध्यम से भूमि में जल रिचार्ज किया जाना चाहिए।वर्षा की अधिकतर बूंदों को धरा में सोखाने का हर संभव प्रयास व्यक्तिगत रूप से करना चाहिए ।जल संरक्षण व संचयन की योजनाओं का लाभ लेना चाहिए व जल रूपी अमूल्य वैश्विक संसाधन का व्यक्तिगत रूप से बचाव ,संचयन व संरक्षण पर ध्यान देना चाहिये।जल ही संपन्नता व सशक्तता है।बेहतर जीवन शैली का यह अभिन्न अंग है।मानव शरीर के रचना से लेकर संपूर्ण ब्रह्माण्डीय व जैवीय अस्तित्व का संबंध जल से ही है।

अत: प्रकृति के प्रति हमें सजग व सचेत रहना है।प्रकृति का संरक्षण सतत व समावेशी विकास की प्रथम शर्त है।जल का महत्व जीवन, धर्म, कर्म व अस्तित्व से है।दैनिक दिनचर्या में जल उपयोग व बचाव का ध्यान रखना हमारी जिम्मेदारी है।यह व्यक्तिगत व सामाजिक दायित्व है।अनावश्यक जल व्यर्थ न करके अधिक से अधिक भूमिगत रिचार्ज पर ध्यान देना होगा।

जल संरक्षण व संचयन से मानव जीवन के साथ ही असंख्य सूक्ष्मजीव का स्वत: संरक्षण होता है।हरियाली जीवित रहती है।जैव चक्र व पर्यावरण संतुलित रहता है।सूखा जैसी स्थिति नहीं आती।कृषि के अभिनव प्रयोग के आयाम स्थापित होते हैं।पशुपालन भी विकसित होता है।एजोला की खेती व मत्स्यपालन जैसी जीविका के नये साधन विकसित कर सकते हैं।जलाशय या जल संग्रह या संचयन वाले स्थल के आस-पास फलदार व औषधि पौधों को रोप सकते हैं।जल संरक्षण व संचयन की आदत से चहुंमुखी विकास का आयाम स्थापित होता है।इस वर्षा ऋतु अधिक से अधिक अमृत बूंदों को सहेजने का हम सबको प्रयास करना है।

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