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कलंक है मानवता के लिए #बाल_भिक्षावृत्ति

राशिद-अर्शी

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“” मुमकिन है हमे गांव ही पहचान भी ना पाए।
बचपन मे ही हम घर से कमाने निकल आये।।
( अनाम )

" कलंक है मानवता के लिए  #बाल_भिक्षावृत्ति
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                                     राशिद-अर्शी

               दुनिया का हर एक व्यक्ति अपने बचपन की ओर लौटने की ख्वाहिश रखता है। जहां उसकी यादों में बसा है उंसका वो अतीत, जो बेहद मासूम, बेफिक्र और ज़िम्मेदारियों से अलग था।
               लेकिन कुछ ऐसे बचपन भी है, जिन्हें वक़्त और हालात ने कभी बच्चा नही रहने दिया। कुछ वक़त की ठोकर और कुछ अपने दुर्भाग्य के हाथों मजबूर होकर अपना और अपने परिवार का पेट पालने के लिए मज़दूर और नोकर बनकर अपना शहर छोड़ने पर मजबूर हो गए। तो कुछ भिखारी तक बनकर सड़क पर उतरने के लिए मजबूर हो गए।
               भारत वर्ष में बाल भिखारियों की एक बहुत बड़ी तादाद मौजूद है। ये एक राष्ट्रीय समस्या का रूप ले चुकी है। बाल भिक्षा बृत्ति के कारणों  पर अगर एक नज़र डाली जाए तो इसमें आर्थिक, सामाजिक, पारिवारिक कारणों के अतिरिक्त संगठित आपराधिक गिरोहों का भी बहुत बड़ा हाथ है। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की एक रिपोर्ट के अनुसार देश मे प्रत्येक वर्ष लगभग 40000 हजार बच्चे अपहृत या गुम हो जाते हैं। जिनमे से 25% बच्चे कभी नही मिल पाते। इन्ही 25% बच्चों में से ये अपराधी गिरोह भिक्षावर्त्ति के लिए मजबूर करते हैं। समाज मे इन बच्चों के प्रति सहानुभूति उत्तपन करने के लिए, ये अपराधी गिरोह इन बच्चों को विकलांग बनाने में भी नही चूकते। छोटे बड़े शहरों क़स्बों में ये अपराधी इन बच्चों को चौराहों, बाज़ारों, सड़कों, लाल बत्ती और मोहल्लों में उतार देते हैं। साथ ही ये दूर रहकर इन बच्चों पर नज़र रखते हैं कि कहीं कोई व्यक्ति इन बच्चों से भीख मांगने का कारण ना मालूम कर सके या कोई बच्चा भाग जाने की कोशिश ना कर सके।
               बाल भिक्ष्वर्त्ति के दूसरे कारणों में पारिवारिक आर्थिक स्थिति भी एक बड़ा कारण है। वहीं दूसरी ओर कुछ लोग इसे पेशे के रूप में भी सदियों से अपनाए हुए हैं। मुम्बई के रहने वाले भरत सम्भवतः देश के सबसे अमीर भिखारियों में से एक हैं। ये सज्जन छत्रपति शिवाजी टर्मिनल और आज़ाद मैदान के इर्द गिर्द भीख मांगते हुए मिल जाएंगे। इनकी प्रतिदिन की कमाई 2000 से 2500 रु0 के बीच है। इनके पास परेल इलाके में बी एच के डुप्लेक्स अपार्टमेंट है जिसकी कीमत 7.50 करोड़ है। मांडुप एरिया में एक दुकान है जिसका किराया 20 हजार रु0 प्रति माह है। दरअसल ये एक ऐसा सुरक्षित पेशा है जहां कोई रिस्क नही है। यही कारण है कि अपराधी प्रवर्ति के लोग गिरोह बनाकर बच्चों से भीख मंगवाकर खुद करोड़ों में खेल रहें हैं। या फिर इन बच्चों के माता पिता और परिवार ऐश की ज़िंदगी जी रहे हैं।
               जैसे भिक्षा वर्त्ति समाज पर एक कलंक है, तो बाल भिक्षावर्त्ति कोढ़ से कम नही है। सामाजिक न्याय मंत्री श्री थावर चन्द गहलोत ने लोकसभा में एक प्रश्न के उत्तर में बताया था कि वर्ष 2011 की जनगणना के अनूसार देश मे भिखारियों की संख्या 4 लाख से ऊपर है। लेकिन वास्तविकता उससे कहीं अलग है।
               नोबल पुरस्कार विजेता कैलाश सत्यार्थी जिन्होंने   " बचपन बचाओ " आंदोलन की शुरूआत की थी कहते हैं।प्रत्येक बच्चे की तरह बाल भिखारी की भी अपने सपनो की एक दुनिया होती है। वो भी शिक्षित होकर समाज मे प्रतिष्ठा और सम्मान पाने की इच्छा रखता है। लेकिन कहीं तो उसकी पारिवारिक मजबूरियां उसे भीख मांगने पर मजबूर करती हैं, तो कहीं उसके अपने परिवार द्वारा या फिर कहीं आपराधिक गिरोहों द्वारा उसे ये पेशा अपनाने पर मजबूर कर दिया जाता है।
               हालांकि देश मे भिक्षावृत्ति कानूनन अपराध है। भारतीय दण्ड सहिंता 1860 की धारा 363A के अनुसार किसी बच्चे को जबरन विकलांग बनाकर भिक्षावृत्ति कराने पर 10 वर्ष सश्रम कारावास का प्रावधान है। वहीं कई राज्यों ने अपने यहां बॉम्बे प्रवेशन ऑफ भीख अधिनियम 1959 लागू कर रखा है। जिसमे भिक्षा मांगना अपराध है। साथ ही बाल अधिनियम के अंतर्गत 5 साल से कम बच्चे से भीख मंगवाने के जुर्म में बच्चे को हिरासत में लिया जाएगा तथा उसके साथ ही उसकी देखभाल के लिए, बच्चे की माँ को भी हिरासत में लिया जाएगा। रेलवे अधिनियम 1960 के अंतर्गत रेल में भीख मांगने पर 1 साल कारावास के दण्ड का प्राविधान है।
               जहां एक ओर सरकार कानून द्वारा इस प्रथा पर लगाम लगाने की कोशिश कर रही है। वहीं दूसरी ओर कई सामाजिक संस्थाओं और एन जी ओ को, इन मासूम बच्चों का भविष्य बचाने के लिए आर्थिक सहायता भी दे रही है। बाल शोषण की किसी भी शिकायत के लिए सरकार द्वारा चाइल्ड हेल्प लाइन न0 1098 दिया गया है। ज़रूरत इस बात की है हमारा समाज इन बच्चों को बचाने की ईमानदार पहल करे। सामाजिक संस्थाएं, सामाजिक संगठन, सामाजिक एंव राजनीतिक कार्यकर्ता इन मासूम बच्चों को अपराधी गिरोहों  से बचाएं। इनके परिवारों के पुनर्वास का स्थायी समाधान तलाश किया जाय। एन जी ओज के माध्यम से सरकारी सहायता द्वारा इनकी शिक्षा दीक्षा का उचित प्रबंध होना चाहिए।
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