वाराणसी/उत्तरप्रदेश

108 थालों चढावा के साथ नौ गौरी–नौ दुर्गा मंत्रों से अभिमंत्रित हल्दी से सजा गौरा का दिव्य रूप

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दुर्गा मंदिर से आई पावन हल्दी,टेढ़ीनीम महंत आवास में भव्यता के साथ संपन्न हुआ गौने का अनुष्ठान वेद मंत्रों,शंखध्वनि और मंगलगीतों के बीच काशी बनी साक्षी, रंगभरी एकादशी तक चलेगा मांगलिक क्रम ||

वाराणसी :- देवाधिदेव की अनादि नगरी काशी में मंगलवार की संध्या शिव–गौरा विवाह परंपरा का अत्यंत भावपूर्ण और लोकआस्था से ओत-प्रोत अध्याय साकार हो उठा | माता गौरा के गौने की परंपरागत हल्दी रस्म टेढ़ीनीम स्थित महंत आवास में विधि-विधानपूर्वक संपन्न हुई | 108 थालो में भोग के साथ नौ गौरी–नौ दुर्गा के आव्हान मंत्रों से अभिमंत्रित पावन हल्दी जब माता गौरा की चल प्रतिमा के अंग -अंग पर अर्पित की गई तब पूरा परिसर ‘हर-हर महादेव’ और ‘जय गौरा’ के उद्घोष से गुंजायमान हो उठा | यह आयोजन केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं,बल्कि काशी की जीवंत सांस्कृतिक चेतना और लोकविश्वास का अद्भुत संगम है जहां देवी -देवताओं को परिवार का सदस्य मानकर उनके विवाह और गौने की रस्में उसी आत्मीयता से निभाई जाती हैं जैसे किसी घर-आंगन में बेटी का गौना होता है |

दुर्गा मंदिर में हुआ विशेष पूजन, मंत्रोच्चार से अभिमंत्रित हुई हल्दी
गौने की हल्दी की परंपरा के अनुसार मंगलवार प्रातः काशी के प्रसिद्ध दुर्गा मंदिर में विशेष अनुष्ठान संपन्न हुआ | वैदिक ब्राह्मणों ने नौ गौरी और नौ दुर्गा के आव्हान मंत्रों के साथ हल्दी का विधिवत पूजन किया | शंखध्वनि,घंटानाद और वैदिक ऋचाओं के मध्य हल्दी को अभिमंत्रित कर मंगलमय बनाया गया |

मंदिर के महंत कौशल द्विवेदी ने बताया कि यह हल्दी केवल प्रतीकात्मक नहीं, बल्कि श्रद्धा और शास्त्र का सजीव रूप है | काशी की लोकपरंपरा के अनुसार गौरा के गौने की जिम्मेदारी स्वयं काशीवासियों की होती है | विवाह के उपरांत जिस प्रकार कन्या को ससुराल विदा करने से पूर्व हल्दी की रस्म निभाई जाती है उसी भाव से माता गौरा को भी यह मंगल अनुष्ठान अर्पित किया जाता है | पूजन उपरांत महंत परिवार के पंडित कौशल पति द्विवेदी,पंडित केवल कृष्ण द्विवेदी,पंडित आनंद गोपाल द्विवेदी, अवनीश शुक्ला,संजय दुबे के साथ शोभायात्रा के रूप में हल्दी को टेढ़ीनीम स्थित महंत आवास तक पहुंचाया | मार्ग में श्रद्धालुओं ने पुष्पवर्षा कर इस परंपरा का स्वागत किया |

टेढ़ीनीम महंत आवास में सजा मंगल मंडप
सायंकाल टेढ़ीनीम स्थित महंत आवास में भव्य मंगल मंडप सजाया गया | रंग-बिरंगे पुष्पों,आम्रपल्लव और पारंपरिक सजावट से सुसज्जित परिसर श्रद्धा और उल्लास का केंद्र बना रहा |

काशी विश्वनाथ मंदिर के महंत पं. वाचस्पति तिवारी के सान्निध्य में 11 वैदिक ब्राह्मणों ने माता गौरा की चल प्रतिमा का विशेष पूजन कराया | वेदमंत्रों की गूंज के बीच माता को मंडप में विराजमान कराया गया | इसके पश्चात परंपरागत रीति से अभिमंत्रित हल्दी अर्पित की गई | हल्दी चढ़ाने की इस रस्म के दौरान उपस्थित श्रद्धालु भावविभोर हो उठे | ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो किसी घर में बेटी का गौना संपन्न हो रहा हो |

हल्दी के बाद हुआ भव्य श्रृंगार
अनुष्ठान के उपरांत माता गौरा का भव्य श्रृंगार किया गया | पारंपरिक बनारसी वस्त्र,रत्नाभूषण,पुष्पमालाएं और सिन्दूरी आभा से सुसज्जित स्वरूप ने श्रद्धालुओं को मंत्रमुग्ध कर दिया | दर्शन के लिए उपस्थित श्रद्धालुओं की लंबी कतारें देर रात तक लगी रहीं | महंत परिवार के अनुसार इस वर्ष भी परंपरा की मर्यादा और शास्त्रीय विधानों का विशेष ध्यान रखा गया सभी अनुष्ठान निर्धारित विधान के अनुरूप संपन्न हुए |

मंगलगीतों और सोहर से गूंज उठा आंगन
गौने की हल्दी रस्म में लोकजीवन की आत्मीयता स्पष्ट दिखाई दी जैसे ही हल्दी अर्पण हुआ | महंत आवास में महिलाओं द्वारा पारंपरिक मंगलगीत और सोहर गूंज उठे | गीतों में दुल्हन की विदाई,ससुराल और शुभकामनाओं के भाव झलक रहे थे |

काशी की मान्यता है कि बाबा और गौरा नगर के आराध्य ही नहीं,बल्कि पारिवारिक सदस्य हैं यही कारण है कि यह आयोजन सामूहिक उत्सव का रूप ले लेता है | श्रद्धालु स्वयं को इस दैवीय पारिवारिक समारोह का सहभागी मानते हैं |

रंगभरी एकादशी तक चलेगा मांगलिक उत्सव
मंगलवार को संपन्न हुई हल्दी रस्म के साथ ही रंगभरी एकादशी तक चलने वाले मांगलिक क्रम का शुभारंभ हो गया है। रंगभरी एकादशी के दिन बाबा विश्वनाथ माता गौरा को ससुराल से अपने धाम लाएंगे उस दिन संपूर्ण काशी अबीर- गुलाल,पुष्पवर्षा और भक्ति के रंगों में सराबोर हो उठेगी |

महंत परिवार ने बताया कि श्रद्धालुओं की सुविधा और सुरक्षा के लिए विशेष व्यवस्थाएं की गई थीं | दर्शन-व्यवस्था सुव्यवस्थित रही और बड़ी संख्या में भक्तों ने अनुष्ठान में सहभागिता की |

काशी की जीवंत आस्था का सशक्त उदाहरण
टेढ़ीनीम महंत आवास में संपन्न हुआ यह आयोजन काशी की सांस्कृतिक निरंतरता और सामूहिक आस्था का सशक्त उदाहरण बनकर उभरा यहां वेद और लोक एक-दूसरे के पूरक दिखाई दिए |

एक ओर ब्राह्मणों का मंत्रोच्चार,दूसरी ओर महिलाओं के मंगलगीत
दुर्गा मंदिर से अभिमंत्रित हल्दी जब माता गौरा के अंग-अंग पर अर्पित हुई तब यह स्पष्ट हो गया कि काशी में परंपराएं केवल निभाई नहीं जातीं उन्हें उत्सव बनाकर जिया जाता है | देवों की इस नगरी में गौरा का गौना केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि लोकसंस्कृति का जीवंत उत्सव है | यह आयोजन हर वर्ष समाज को एक सूत्र में पिरोता है और यह संदेश देता है कि जब आस्था लोकजीवन से जुड़ती है तब संस्कृति पीढ़ियों तक अमर रहती है | काशी ने एक बार फिर सिद्ध कर दिया कि यहां परंपरा केवल इतिहास की धरोहर नहीं,बल्कि वर्तमान की धड़कन है जो हर वर्ष नए उत्साह,नए उल्लास और अटूट श्रद्धा के साथ पुनर्जीवित होती है ||

Sallauddin Ali

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