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मासिक धर्म के दौरान छुट्टी वाली याचिका सुप्रीम कोर्ट ने की खारिज दिया ये तर्क

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दिल्ली आईरा न्यूज़ नेटवर्क राजेश सिंघल

दिल्ली। मासिक धर्म के दौरान छात्राओं और कामकाजी महिलाओं को छुट्टी देने की बात पर सोशल मीडिया से लेकर तमाम अन्य मंचों पर बहस होती रही है। इस बारे में सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका भी दायर की गई, हालांकि शुक्रवार को देश की शीर्ष अदालत ने इस पर विचार करने से इनकार कर दिया। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि वह यह मुद्दा सरकार के नीतिगत दायरे में आता है ऐसे में निर्णय लेने के लिए संबंधित मंत्रालय में रिप्रेजेंटेशन फाइल की जा सकती है।

भारत के मुख्य न्यायाधीश डी.वाई. चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि यदि नियोक्ताओं को मासिक धर्म की छुट्टी देने के लिए मजबूर किया जाता है, तो यह महिला कर्मचारियों की भर्ती में बाधा बन सकता है। पीठ ने याचिकाकर्ता अधिवक्ता शैलेंद्र मणि त्रिपाठी को अपनी याचिका के साथ महिला एवं बाल विकास मंत्रालय से संपर्क करने को कहा। पीठ ने कहा, यह एक नीतिगत मामला है, इसलिए हम इससे नहीं निपट रहे हैं।

कई देश पहले से ही दे रहे पीरियड्स लीव
याचिकाकर्ता के अधिवक्ता विशाल तिवारी ने पिछले हफ्ते याचिका को तत्काल सूचीबद्ध करने की मांग भी की थी।याचिका में कहा गया था कि यूनाइटेड किंगडम, चीन, वेल्स, जापान, ताइवान, इंडोनेशिया, दक्षिण कोरिया, स्पेन और जाम्बिया जैसे देशों में पहले से ही पीरियड्स लीव दी जा रही है।

अधिनियम होने के बाद भी नही होता पालन
सुप्रीम कोर्ट में दायर की गई याचिका में कहा गया था कि मातृत्व लाभ अधिनियम के तहत कानून के ये प्रावधान कामकाजी महिलाओं के मातृत्व और मातृत्व को पहचानने और सम्मान देने के लिए संसद या देश के लोगों द्वारा उठाए गए सबसे बड़े कदमों में से एक हैं। हालांकि, फिर भी कानून होने के बाद भी इनका सख्ती से पालन नहीं होता है।

बिहार में मिलती है महिलाओं को पीरियड्स लीव
बता दें कि बिहार भारत का एकमात्र ऐसा राज्य है जो 1992 से महिलाओं को दो दिन का विशेष मासिक धर्म दर्द अवकाश प्रदान कर रहा है। 1912 में, कोच्ची (वर्तमान एर्नाकुलम जिला) की तत्कालीन रियासत में स्थित त्रिपुनिथुरा में सरकारी गर्ल्स स्कूल ने छात्रों को उनकी वार्षिक परीक्षा के समय ‘पीरियड लीव’ लेने की अनुमति दी थी

अधिवक्ता शैलेंद्र मणि त्रिपाठी द्वारा दायर याचिका में कहा गया है कि कुछ राज्यों ने मासिक धर्म को लेकर सहायक लाभ प्रदान किए, उनके समकक्ष राज्यों में महिलाएं अभी भी ऐसे किसी भी लाभ से वंचित हैं। तदनुसार यह संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन है, क्योंकि मातृत्व लाभ अधिनियम संघवाद और राज्य की नीतियों के नाम पर महिलाओं को अलग करता है।

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