सजने लगी शताब्दियों पुरानी पालकी,‘गौरा-सदनिका’ में गूंजेंगी मंगल गीत

27 फरवरी को माता गौरा का गौना,24 से शुरू होंगे चार दिवसीय लोकाचार,खादी की राजसी पोशाक में सजेगे बाबा विश्वनाथ
वाराणसी:- फाल्गुन की मादक बयार और गुलाल की आहट के बीच काशी एक बार फिर अपने सबसे भावनात्मक उत्सव रंगभरी (अमला) एकादशी की तैयारी में डूब गई है | दिनांक 27 फरवरी को होने वाले माता गौरा के गौने को लेकर टेढ़ीनीम स्थित महंत आवास ‘गौरा- सदनिका’ में तैयारियां जोरों पर हैं | शताब्दियों पुरानी पालकी और रजत शिवाला की साफ-सफाई व मरम्मत का कार्य शुरू हो चुका है |
रंगभरी एकादशी पर काशी विश्वनाथ मंदिर से बाबा विश्वनाथ, माता पार्वती और प्रथमेश की चल प्रतिमाओं की पालकी यात्रा निकलेगी | इस प्रतीकात्मक गौने के साथ काशी की लोकपरंपरा अपने चरम पर पहुंच जाती है |
गौरा-सदनिका में बदला महंत आवास,सजी परंपरा की चौखट
महाशिवरात्रि पर शिव-पार्वती विवाह की लोकपरंपरागत रस्म के बाद महंत आवास ‘गौरा-सदनिका’ में परिवर्तित हो जाता है यही वह स्थल है जहां गौने की समस्त तैयारियां होती हैं | आंगन में हल्दी की सुवास,मंगल गीतों की गूंज और श्रृंगार की चहल-पहल ने वातावरण को उत्सवमय बना दिया है |
महंत पुत्र वाचस्पति तिवारी ने बताया कि 24 फरवरी मंगलवार से चार दिवसीय लोकाचार का शुभारंभ माता गौरा के तेल-हल्दी अनुष्ठान से होगा | प्रतिमा के पूजन के बाद हल्दी की रस्म निभाई जाएगी और गौनहारिनों की टोली पारंपरिक गीतों से इस अनुष्ठान को जीवंत बनाएगी |
चौथी पीढ़ी के हाथों में विरासत की पालकी
रंगभरी एकादशी की शोभायात्रा में प्रयुक्त होने वाली शताब्दियों पुरानी पालकी की साफ-सफाई और मरम्मत का जिम्मा काशी के काष्ठ कलाकार पप्पू जी संभाल रहे हैं वे इस सेवा में अपने परिवार की चौथी पीढ़ी का प्रतिनिधित्व करते हैं | लकड़ी की नक्काशी,धातु की जड़ाई और रजत शिवाला की चमक हर हिस्से को सावधानी से संवारते हुए पप्पू कहते हैं कि यह केवल काम नहीं,बल्कि सेवा है उनके हाथों की कारीगरी में काशी की आस्था की झलक दिखती है | रजत शिवाला की चमक को नया आभास देने के साथ-साथ उसकी संरचना को भी मजबूत किया जा रहा है ताकि यात्रा के दौरान कोई व्यवधान न आए |
राजसी खादी की पोशाक में सजेगे बाबा,अलौकिक होगा गौरा का श्रृंगार
गौने के दिन बाबा विश्वनाथ की चल प्रतिमा को परंपरागत खादी से बनी राजसी पोशाक पहनाई जाएगी | यह पोशाक विशेष रूप से तैयार कराई जा रही है जिसमें काशी की पारंपरिक बुनावट और सादगी का संगम होगा | माता गौरा का श्रृंगार भी विशेष अलंकरणों और वस्त्रों से किया जाएगा | लाल,पीत और हरित रंगों के संयोजन में सजी प्रतिमा लोक आस्था का केंद्र बनेगी | महंत परिवार स्वयं इस श्रृंगार को अंतिम रूप देने में जुटा है | श्रृंगार के साथ ही पालकी को भी फूलों और रंगीन कपड़ों से सजाया जाएगा जिससे पूरी शोभायात्रा राजसी आभा से आलोकित हो उठे |
रजत शिवाला की स्थापना और सप्तर्षि आरती
रंगभरी एकादशी के दिन परंपरानुसार रजत शिवाला को काशी विश्वनाथ मंदिर के गर्भगृह में स्थापित किया जाएगा | इसके उपरांत काशी की विशेष सप्तर्षि आरती संपन्न होगी यह क्षण भक्तों के लिए अत्यंत पावन माना जाता है | आरती के पश्चात बाबा,गौरा और प्रथमेश की पालकी ‘गौरा-सदनिका’ से मंदिर की ओर प्रस्थान करेगी | काशीवासी इस पालकी को अपने कंधों पर उठाकर नगर भ्रमण कराते हैं गलियों में ‘हर-हर महादेव’ का उद्घोष गूंजता है और पूरा शहर एक दिव्य उत्सव में डूब जाता है |
लोकगीतों में झलकता है काशी का हृदय
गौने के अवसर पर गौनहारिनों द्वारा गाए जाने वाले मंगल गीत इस परंपरा की आत्मा हैं ये गीत केवल रस्म नहीं,बल्कि काशी की लोकसंस्कृति का जीवंत दस्तावेज हैं | हल्दी की रस्म से लेकर पालकी प्रस्थान तक हर चरण में गीतों की मधुर ध्वनि वातावरण को भावविभोर करती है | इन गीतों में बेटी के विदा होने की करुणा भी है और नववधू के स्वागत का उल्लास भी | शिव-पार्वती के इस दांपत्य प्रसंग में लोकभावना और आध्यात्मिकता का अद्भुत संगम दिखाई देता है |
आस्था और संस्कृति का संगम
रंगभरी एकादशी केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं,बल्कि काशी की सांस्कृतिक पहचान का उत्सव है यह वह दिन है जब शिव-पार्वती विवाह के बाद माता गौरा का प्रतीकात्मक गौना संपन्न होता है और पूरा नगर इस अलौकिक मिलन का सहभागी बनता है | पालकी की खनकती घंटियां,रजत शिवाला की झिलमिल आभा, खादी की राजसी पोशाक और गूंजते मंगल गीत सब मिलकर काशी को एक बार फिर शिवमय बना देते हैं |
27 फरवरी को जब माता गौरा का गौना होगा,तब काशी की गलियों में आस्था का ज्वार उमड़ेगा शताब्दियों से चली आ रही यह परंपरा एक बार फिर यह सिद्ध करेगी कि काशी केवल एक शहर नहीं,बल्कि जीवंत संस्कृति और सनातन श्रद्धा का स्पंदन है ||
























