विद्युत विभाग :किसकी साज़िश, किसकी नीति? पूर्वांचल डिस्कॉम में संविकर्मीयो की छंटनी के पीछे का खेल

छंटनी की तलवार: पूर्वांचल डिस्कॉम में आंदोलन के आसार!
वाराणसी । पूर्वांचल विद्युत वितरण निगम में इन दिनों बिजली की आवाजाही से ज्यादा ‘नौकरियों की कटौती’ की चर्चा गर्म है। एमडी शंभू कुमार के एक ताजा मौखिक फरमान ने विभाग के भीतर और संविदा कर्मियों के बीच आक्रोश की ज्वाला भड़का दी है। सवाल उठ रहा है कि जिस मैनपावर की जरूरत एक साल पहले थी, वह आज अचानक ‘बोझ’ कैसे बन गई?
साल भर में बदल गए हालात: सहमति से छंटनी तक का सफर
हैरानी की बात यह है कि करीब एक साल पहले खुद एमडी शंभू कुमार ने संविदा कर्मियों की संख्या बढ़ाने पर अपनी सहमति दी थी। तब तत्कालीन एजेंसियों ने जरूरत के मुताबिक भर्तियां कीं और इन कर्मियों ने विभाग की व्यवस्था को संभाला। लेकिन अब, जब वर्तमान एजेंसियों का कार्यकाल समाप्त होने वाला है, एमडी द्वारा स्थानीय अधिकारियों पर ‘छंटनी’ का भारी दबाव बनाया जा रहा है।
सुलगते सवाल:आखिर पर्दे के पीछे क्या चल रहा है?
विभागीय विरोधाभास:
नाम न छपने की शर्त पर एक मुख्य अभियंता ने बताया कि सर्दियों में छंटनी करना आत्मघाती कदम है। यदि अभी स्टाफ हटाया गया, तो गर्मियों में जब बिजली की मांग चरम पर होगी, तब व्यवस्था कौन संभालेगा?
शासन की किरकिरी की तैयारी?
दबी जुबान में अधिकारी कह रहे हैं कि यह कदम जानबूझकर गर्मियों में बिजली संकट पैदा करने और शासन की छवि खराब करने की साजिश भी हो सकता है।
मानवीय संकट:
“एक साल पहले हमारी जरूरत थी, अब हम फालतू हो गए?”—यह उस संविदा कर्मी का दर्द है जिसका परिवार नौकरी जाने की खबर से सदमे में है।
अधिकारियों का ‘मौन’ और संगठन का ‘आक्रोश
संविदा संगठनों ने इसे एमडी का ‘तानाशाही रवैया’ करार दिया है। संगठन का साफ कहना है कि यदि छंटनी पर तुरंत रोक नहीं लगी, तो वे उग्र आंदोलन को बाध्य होंगे। यह भी कहा कि इस छंटनी से गर्मी में सिस्टम का चरमराना तय है।
“यह प्रबंधन की अदूरदर्शिता है।
एक साल पहले भर्ती की अनुमति देना और अब बिना किसी ठोस आधार के छंटनी का दबाव बनाना, जांच का विषय है। इसमें जो भी दोषी हो, उस पर कार्रवाई होनी चाहिए।” — प्रतिनिधि, संविदा कर्मचारी संगठन
बड़ा सवाल: क्या यह ‘पॉलिसी’ है या ‘पर्सनल गेम’?
विभागीय गलियारों में चर्चा है कि क्या यह छंटनी किसी नई एजेंसी को ‘सेट’ करने के लिए की जा रही है या फिर यह वाकई वित्तीय घाटे को कम करने का प्रयास है?
लेकिन, तकनीकी काम में माहिर अनुभवी कर्मियों को हटाकर विभाग रिस्क क्यों ले रहा है?
उपभोक्ता की आवाज समाचार का मत है कि एक तरफ उत्तर प्रदेश सरकार निर्बाध बिजली आपूर्ति का दावा कर रही है, वहीं पूर्वांचल डिस्कॉम का यह ‘छंटनी मॉडल’ आने वाली गर्मियों में जनता के लिए बड़ी मुसीबत बन सकता है।
पूर्वांचल डिस्कॉम का कार्यक्षेत्र कोई साधारण इलाका नहीं
बल्कि मुख्यमंत्री का गृह जनपद गोरखपुर, ऊर्जा मंत्री का मऊ और प्रधानमंत्री का संसदीय क्षेत्र वाराणसी जैसे वीआईपी जिले इसमें शामिल हैं। ऐसे संवेदनशील और राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण क्षेत्रों की बिजली व्यवस्था से खिलवाड़ करना केवल प्रशासनिक चूक नहीं, बल्कि सीधे शासन की प्राथमिकताओं पर सवाल खड़ा करता है। अब देखने वाली बात यह होगी कि इस नीति और उसके क्रियान्वयन पर चेयरमैन आशीष गोयल और प्रबंध निदेशक पंकज कुमार की पैनी निगाह पड़ती है या फिर यह मामला आगे आने वालों के लिए मुसीबत बनाकर छोड़ दिया जाएगा।





