वाराणसी पुलिस का दूसरा कड़वा,सच:खाकी में छिपी लूट,जहां पुलिस ही पुलिस की सबसे बड़ी शिकार बनती है

वाराणसी।कल की गिरफ्तारी ने एक बार फिर खोल दिया है पुलिस विभाग का वो घाव जो कभी भरता नहीं—पुलिसकर्मी ही पुलिसकर्मी से सबसे ज्यादा डरते हैं,सबसे ज्यादा लूटते हैं और सबसे ज्यादा फंसाते हैं। चौकी इंचार्ज शिवाकर मिश्रा को 20 हजार की रिश्वत में रंगे हाथ पकड़ा गया,लेकिन ये सिर्फ एक नमूना है। असली कड़वाहट तो विभाग की उस व्यवस्था में है जहां थाने-चौकी हर जगह पुलिस ही पुलिस का शिकार बन रही है।
सच ये है कि पुलिस विभाग में भ्रष्टाचार ‘अपवाद’ नहीं, ‘नियम’ बन चुका है।फाइल सरकाने,जांच प्रभावित करने,केस कमजोर करने के नाम पर सीनियर जूनियर से पैसा वसूलता है,सीनियर जूनियर को दबाता है।एंटी करप्शन की टीम खुद पुलिसवालों से बनी होती है—और जब मौका मिलता है,तो जूनियर अपने ही सीनियर को बेरहमी से घेर लेता है।शिवाकर मिश्रा के साथ जो हुआ,वो हर थाने में रोज होता है—बस कैमरा नहीं होता।उनकी पत्नी शिवानी मिश्रा का आरोप है कि एंटी करप्शन के किसी सदस्य ने उनसे कोई ‘काम’ मांगा था,ठुकराने पर फंसाया गया।सच हो या झूठ,लेकिन ये दावा विभाग की उस कड़वी हकीकत को छूता है जहां ‘टार्गेट’ पूरा करना जरूरी होता है—चाहे अपना ही आदमी क्यों न हो।
फ्रंटलाइन पर तैनात पुलिसकर्मी की जिंदगी तलवार की धार पर चलती है—नेता,बड़ा अफसर,पत्रकार,सबकी नजर।इसलिए ज्यादातर एसटीएफ,विजिलेंस,एंटी करप्शन जैसी ‘साइड पोस्टिंग’ वाली यूनिट्स में भागते हैं—जहां जांच का नाम पर वसूली आसान,हाय-हाय कम।होटल एनओसी,लाइसेंस,छोटे-मोटे केस—सबमें ‘मामला मिले तो माल भी मिले’।करोड़ों के होटल वाले एसटीएफ सिपाही के आगे झुक जाते हैं,कैंटोनमेंट में फ्लैट,लग्जरी गाड़ी—सब ‘पड़ताल जारी’ रहती है।
और सबसे कड़वा सच?पुलिसकर्मी की पुलिस नहीं होती।फंस गया तो खुद और खुदा के सिवा कोई नहीं।कोर्ट में प्रथमदृष्टया दोषी,जनता में पहले से दोषी,विभाग में ‘टार्गेट’।नए बैच के दरोगा गुरुर में गिरेबान नहीं संभाल पाते,जल्दी ट्रैप हो जाते हैं।लेकिन घाघ वाले?वो पकड़े भी नहीं जाते। थाने का वो कारखास जो हर शिकायत हाथ में लेता है,वसूली करता है।स्थानीय त्रस्त,लेकिन जुबान बंद।
शिवाकर मिश्रा अब महीनों झेलेंगे—आर्थिक,मानसिक,सामाजिक तबाही।लेकिन सवाल विभाग पर है: कब तक पुलिस ही पुलिस को खाएगी?कब तक खाकी दागदार होती रहेगी?बनारस जानता है,लेकिन बोलता कम है।क्योंकि डर अब वर्दी में ही बस गया है।





