“वसुधैव कुटुम्बकम् केवल विचार नहीं, भारतीय भाषाओं की जीवंत सच्चाई है”

काशी हिंदू विश्वविद्यालय के कला संकाय द्वारा केंद्रीय भारतीय भाषा संस्थान, मैसूर के सहयोग से आयोजित अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन का आज दूसरा दिन महामना सेमिनार कॉम्प्लेक्स में सम्पन्न हुआ।
सम्मेलन के पहले सत्र की शुरुआत डॉ. रत्ना एस. मिश्रा ने की जिसमें उन्होंने हैदराबाद विश्वविद्यालय से आए प्रो. पंचानन मोहंती और प्रो. रमेश मिश्रा का स्वागत किया।
“वसुधैव कुटुम्बकम् और भारतीय भाषाएँ” विषय पर बोलते हुए प्रो. पंचानन मोहंती ने कहा कि “वसुधैव कुटुम्बकम्” को केवल दो शब्दों तक सीमित नहीं किया जाना चाहिए, बल्कि इसके पूर्ण श्लोक और व्यापक भावार्थ को समझना आवश्यक है। उन्होंने भाषा इतिहास को सामाजिक इतिहास का अभिन्न हिस्सा बताते हुए स्थान के नामों के माध्यम से भारतीय भाषाओं के पारस्परिक संबंधों को स्पष्ट किया। उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि कई स्थान-नाम संस्कृत नहीं, बल्कि द्रविड़ भाषाओं से आए हैं।
“बहुभाषावाद के ज़रिए भारतीय मन की पुनर्खोज” विषय पर प्रो. रमेश मिश्रा ने कहा कि भारत में बहुभाषिकता केवल कौशल नहीं, बल्कि सामूहिक चेतना और अनुभव से जुड़ी प्रक्रिया है। उन्होंने औपनिवेशिक प्रभाव और अंग्रेज़ी वर्चस्व के संदर्भ में भारतीय पहचान के पुनर्मूल्यांकन की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने शास्त्रीय प्रतिस्पर्धा मॉडल और नेटवर्क इकोलॉजी के बीच तुलना भी प्रस्तुत की।
सम्मेलन का द्वितीय सत्र डॉ. विनोद कुमार जायसवाल द्वारा संचालित किया गया। इस सत्र में द्रविड़ विश्वविद्यालय के प्रो. एम. सी. केशव मूर्ति ने “मशीन अनुवाद और भाषाई समावेशन पर इसका प्रभाव” विषय पर व्याख्यान प्रस्तुत किया। अपने वक्तव्य में उन्होंने अनुवाद में तकनीक की भूमिका पर चर्चा की तथा तेलुगु से अंग्रेज़ी अनुवाद के संदर्भ में मुहावरों के उदाहरणों के माध्यम से अनुवाद की सीमाओं और चुनौतियों को स्पष्ट किया।
इसी सत्र में प्रख्यात शिक्षाविद्, कवि एवं लेखक डॉ. राम नारायण तिवारी ने “भोजपुरी लोक में समावेशन” विषय पर विचार प्रस्तुत किया व भोजपुरी भाषा की शुचिता एवम् इसकी समृद्धि से श्रोताओं को अवगत कराया।
इसके अतिरिक्त जेएनयू के प्रो. प्रदीप कुमार दास ने “21वीं सदी में शिक्षा-दर्शन: सीखने के मानवीय, नैतिक एवं आध्यात्मिक आयाम” विषय पर अपना व्याख्यान प्रस्तुत किया।
इसके पश्चात् सम्मेलन में दो तकनीकी सत्रों का आयोजन किया गया। इन सत्रों का समन्वयन डॉ. अनंत खरवाल, डॉ. क़मर आलम, तथा डॉ. आनंद मिश्रा द्वारा किया गया।
सम्मेलन के दूसरे दिन का समापन एक भव्य सांस्कृतिक संध्या के साथ हुआ, जिसमें बनारस घराना सितार की प्रस्तुति पद्मश्री पं. शिवनाथ मिश्रा जी के मार्गदर्शन में पं. देवब्रत मिश्रा एवं उनकी टीम द्वारा दी गई। इस संध्या के समन्वयक डॉ. प्रवीण सिंह राणा रहे। दूसरे दिवस के इस कार्यक्रम में अकादमिक जगत के प्रतिष्ठित विद्वानों के साथ साथ विभिन्न विश्वविद्यालयों से आए शोधार्थियों ने बढ़ – चढ़ कर हिस्सा लिया। यह सम्मेलन आगामी 14 फरवरी तक चलेगा।
























