बिना रुकावट के शासन बुनियादी ढांचे के लिए भारत की संस्थागत संरचना – अरिहन्त कुमार

वाराणसी :- आज़ादी के बाद से बुनियादी ढांचे ने भारत की प्रगति की सोच को आकार दिया है कल्पना साफ़ थी रेलवे दूर-दराज के इलाकों को जोड़ेगी,राजमार्ग राज्यों के बीच व्यापार करेंगे,बांध ऊर्जा और सिंचाई का आधार बनेंगे और बिजली की लाइनें सबसे दूर के गांवों तक रोशनी पहुंचाएंगी जैसे-जैसे प्रोजेक्ट बड़े होते गए, वे और भी उलझते गए | ज़मीन मंज़ूरी का इंतज़ार करती रही,मंज़ूरी डिज़ाइनों का इंतज़ार करती रहीं,डिज़ाइन उपयोग बदलने का इंतज़ार करते रहे और इसके लाभ दूसरे कार्यालय,दूसरे अधिकार क्षेत्र,दूसरी फ़ाइल में दबी मंज़ूरियों का इंतज़ार करती रहीं | हर देरी का एक कारण था,हर कारण का कोई जिम्मेदार था और फिर भी कोई भी असल में नतीजे की ज़िम्मेदारी नहीं लेता था | सालों तक,अनेक परियोजनाएं टुकड़ों- टुकड़ों में चलती रही, जिनकी समीक्षा अलग-अलग की गई,बाद में सफाई दी गई और हमेशा के लिए देरी होती रही जब तरक्की रुकी, तो ज़िम्मेदारी प्रक्रिया में घुल गई | हर जगह हलचल थी, लेकिन कहीं भी गति नहीं थी जिस चीज़ की कमी थी, वह इरादा या निवेश नहीं था, बल्कि एक ऐसा फोरम था जहाँ आपस में जुड़ी हुई रुकावटों को एक साथ देखा जा सके,एक साथ सुलझाया जा सके और उन्हें खत्म किया जा सके | प्रोजेक्ट गवर्नेंस में इसी शांत लेकिन महत्वपूर्ण कमी को प्रगति के नेतृत्व वाले इकोसिस्टम ने भरने का बीड़ा उठाया | प्रगति,समीक्षा की एक नई परत के रूप में नहीं आई,बल्कि एक ऐसे जंक्शन के रूप में आई जहाँ समानांतर ट्रैक आखिरकार मिले | इसकी कल्पना 2015 में की गई यह देखने में एक आसान सा विचार था कि निगरानी से फैसले होने चाहिए और फैसलों का नतीजा डिलीवरी होना चाहिए | प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में यह केन्द्रीय सचिवों और राज्य के मुख्य सचिवों को एक साथ लाया और उन लोगों को एक साथ जोड़ा जिनके पास राष्ट्रीय महत्व की परियोजनाओं और उनकी रुकावटों के बारे में एक ही,साझा नज़रिए के साथ काम करने की शक्ति थी उस कमरे में, देरी अब भाषा के पीछे छिप नहीं सकती थी | विशेष उपलब्धियों की जांच की गई,मुद्दों को सामने लाया गया और सीधे सवाल पूछे गए सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि ज़िम्मेदारी का एक नाम,एक निर्धारित समय और वापस आने की तारीख तय की गई | फिर भी,प्रगति की असली कहानी सिर्फ़ इन उच्चस्तरीय समीक्षाओं के दौरान सामने नहीं आती | यह उस शांत, लगातार चल रहे काम में ज़िंदा रहती है जो इनसे पहले और बाद में होता है यह तैयारी का अनुशासन,संस्थागत स्मृति और फॉलो-थ्रू प्रोजेक्ट मॉनिटरिंग ग्रुप (पीएमजी) द्वारा प्रदान किया जाता है, जो इस ईकोसिस्टम परिचालन की रीढ़ है | मैंने पीएमजी को उस तरह से बढ़ते देखा है जैसे संस्थाएं शायद ही कभी बढ़ती हैं,धैर्य और उद्देश्य के साथ जो एक साधारण डिजिटल इंटरफ़ेस के रूप में शुरू हुआ था,वह एक परिपक्व,टेक्नोलॉजी-संचालित,उपलब्धियों पर आधारित निगरानी प्लेटफ़ॉर्म में विकसित हो गया है जिसने भारत में बुनियादी ढांचा परियोजनाओं पर नजर रखने और समाधान का तरीका बदल दिया है | इस वास्तुकला के भीतर, पीएमजी समेकन और विश्लेषण के पहले बिंदु के रूप में कार्य करता है जो प्रहरी और संचारक दोनों के रूप में काम करता है | टीम परियोजनाओं पर बारीकी से नजर रखती है ज़मीनी हकीकत सुनती है,दावों को प्रमाणित करती है और जटिल इनपुट को प्रगति के तहत उच्च-स्तरीय समीक्षाओं के लिए संरचित जानकारियों में बदलती है जो जानकारी पहले फ़ाइलों, पत्राचार और समय-समय पर होने वाली समीक्षाओं में बिखरी रहती थी वह अब एक ही डिजिटल सिस्टम में समेकित हो गई है जिसमें प्रगति,लागत,समय सीमा,उपलब्धि और ज़मीन से मिली तस्वीरों के सबूतों पर वास्तविक समय के आंकड़े शामिल है | आज कैबिनेट द्वारा स्वीकृत प्रोजेक्ट मंज़ूरी के कुछ ही दिनों के भीतर सिस्टम में आ जाते हैं, उनकी यात्रा लगातार डेटा प्रवाह के माध्यम से मैप की जाती है जिससे पिछली रिपोर्टिंग के बजाय मौजूदा वास्तविकताओं के आधार पर निर्णय लिए जाते हैं |
इस प्लेटफॉर्म की सबसे खास बात इसकी ढांचागत परियोजना और इश्यू ट्रैकिंग फ्रेमवर्क है | कार्यान्वयन में आने वाली रुकावटें अब चिट्ठियों या अटैचमेंट में छिपी नहीं रहतीं उन्हें औपचारिक तौर पर लॉग किया जाता है,टाइम स्टैम्प किया जाता है और संबंधित साझेदार को समाधान के लिए तय टाइमलाइन के साथ साफ तौर पर जिम्मेदारी सौंपी जाती है इसमें शुरू से ही पारदर्शिता शामिल है | केन्द्रीय मंत्रालय,राज्य सरकारें,जिला प्रशासन और परियोजना चलाने वाले सभी एक ही जानकारी एक साथ देखते हैं,टिप्पणियां दे सकते हैं,अपडेट अपलोड कर सकते हैं और काम पूरा होने तक प्रगति पर निगरानी रखकर सकते हैं | यह साझा विजिबिलिटी जवाबदेही को पूरी तरह से बदल देती है रोल-बेस्ड डैशबोर्ड पर्सनलाइज्ड व्यू देते हैं जिससे सीनियर लीडरशिप से लेकर जिला प्रशासन तक के अधिकारी यह देख पाते हैं कि उनके अधिकार क्षेत्र में किस चीज़ पर ध्यान देने की ज़रूरत है | ऑटोमेटेड अलर्ट, रिमाइंडर और कम्प्लायंस ट्रैकिंग यह पक्का करते हैं कि मुद्दे समय के साथ खत्म न हों,बल्कि समाधान होने तक बार-बार सामने आते रहें | मीटिंग के एजेंडा, मिनट्स और समीक्षा दस्तावेज सीधे डेटा से जेनरेट होते हैं जिससे रूटीन रिपोर्टिंग का काम कम होता है और फैसले लेने पर फोकस बढ़ता है | नतीजतन,ज़्यादातर मुद्दे इस टेक्नोलॉजी सक्षम समन्वय के ज़रिए चुपचाप हल हो जाते हैं जबकि ज़्यादा जटिल,अंतर मंत्रालयी रुकावटों को एक कैलिब्रेटेड फ्रेमवर्क के ज़रिए टॉप प्लेटफॉर्म तक पहुंचाया जाता है | यह वृद्धि नाटकीय नहीं होती यह सोच समझकर की जाती है | इस तरह, पीएमजी को केंद्र में रखकर बनाया गया यह प्रगति इकोसिस्टम,टेक्नोलॉजी और गवर्नेंस को जोड़ता है डेटा को फैसलों में और फैसलों को डिलीवरी में बदलता है | इस सिस्टम में काम पूरा होना सिर्फ एक उम्मीद नहीं है बल्कि एक अपेक्षा है | मैंने देखा है कि मंत्रालयों और राज्यों में व्यवहार कैसे बदला है जब हर कोई एक ही सच देखता है तो बिखराव असहज हो जाता है जब किसी व्यवस्था में सीधे प्रधानमंत्री की देखरेख में देरी को उजागर किया जाता है,उसका नाम लिया जाता है और उस पर दोबारा विचार किया जाता है,तो देरी करना मुश्किल हो जाता है | जो परियोजनाएं सालों से अटकी पड़ी थी एयरपोर्ट,रेल लाइनें,हाईवे,पावर कॉरिडोर वे चलने लगे,इसलिए नहीं कि उनकी प्रकृति बदल गई, बल्कि इसलिए कि उनके आसपास की धुंध छंट गई |
आज 85 लाख करोड़ रुपये से ज़्यादा की तीन हज़ार से ज़्यादा परियोजनाएं इस इकोसिस्टम से गुज़र रही हैं मुद्दे उठते हैं, सुलझते हैं और एक तय संस्थागत लय के साथ खत्म होते हैं यह गवर्नेंस का नाटक नहीं है यह उसका अनुशासन है | नागरिकों के लिए,इसका असर अमूर्त नहीं है यह उस पुल में महसूस होता है जो आखिरकार खुलता है,उस ट्रेन में जो समय पर चलती है उस एयरपोर्ट में जो अब सिर्फ़ घोषणाओं में मौजूद नहीं है हर पूरा होने वाला काम चुपचाप इस विश्वास को बहाल करता है कि सरकार समय का पालन करे,जिससे जनता का पैसा जनता के काम आ सके | जैसे-जैसे भारत आगे बढ़ रहा है,पूंजी मायने रखेगी, महत्वाकांक्षा मायने रखेगी,लेकिन डिलीवरी सबसे ज़्यादा मायने रखेगी और डिलीवरी महत्वपूर्ण बाधाओं को दूर करने या कभी-कभार के हस्तक्षेप पर निर्भर नहीं रह सकती | यह सिस्टम में शामिल, नियमित और मज़बूत होनी चाहिए यही प्रगति इकोसिस्टम की मौन उपलब्धि है इसने गवर्नेंस को वह दिया है जिसकी उसे लंबे समय से कमी थी समय का प्रबंधन करने का एक तरीका | अधिकार को जवाबदेही के साथ,डेटा को फैसलों के साथ और मॉनिटरिंग को काम पूरा होने के साथ जोड़कर इसने देरी को एक बर्दाश्त की जाने वाली आदत से एक अस्वीकार्य नतीजे में बदल दिया है ऐसा करते हुए,यह हमें याद दिलाता है कि प्रगति हमेशा ज़ोरदार नहीं होती | कभी-कभी,यह एक ऐसे तंत्र के रूप में आती है जो बस चीज़ों को हाथ से निकलने नहीं देता | लेखक प्रोजेक्ट मॉनिटरिंग ग्रुप (पीएमजी) में लीड और सीनियर असिस्टेंट वाइस प्रेसिडेंट हैं ||






