प्रो.श्रद्धा सिंह एवं डॉ.हिमांशु शेखर सिंह की पुस्तक ‘स्त्री चेतना एवं भारतीय मुख्य, कुछ राग-कुछ रंग’ विमोचित

सहनशीलता ही भारतीय ज्ञान परंपरा की आत्मा – प्रो.वशिष्ठ अनूप द्विवेदी
भारतीय ज्ञान परंपरा को सीमाओं में बांधना असंभव – प्रो.निर्मला मौर्या
दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी में प्रस्तुत हुए 80 से ज्यादा शोध पत्र
वाराणसी:- महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ के महामना मदन मोहन मालवीय हिन्दी पत्रकारिता संस्थान तथा पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग और प्रो.वासुदेव सिंह स्मृति न्यास वाराणसी के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी बुधवार को संपन्न हुई | डॉ. भगवान दास केंद्रीय पुस्तकालय के समिति कक्ष में आयोजित ‘भारतीय ज्ञान परंपरा का संप्रेषण सामाजिक,सांस्कृतिक और साहित्यिक परिप्रेक्ष्य’ विषयक संगोष्ठी में भारतीय ज्ञान परंपरा के विविध आयामों पर गहन चर्चा हुई तथा वक्ताओं ने इसे समकालीन समाज से जोड़ने की आवश्यकता पर बल दिया | अध्यक्षता करते हुए हिन्दी विभाग,काशी हिन्दू विश्विद्यालय के अध्यक्ष प्रो.विशिष्ट अनूप द्विवेदी ने कहा कि प्रो.वासुदेव सिंह की विरासत को परिवार जनों जो संजोग कर रखा है यह विस्मरणीय है | वासुदेव जी ने अपने पुस्तकों के माध्यम से भारतीय ज्ञान परम्पराओं को संजो कर रखा है | उपनिषद,पुराणों इत्यादि की जो बात की जाती है व भारतीय ज्ञान परम्परा में ही हैं | प्रो.विशिष्ट अनूप ने कहा कि सहनशीलता ही भारतीय ज्ञान परंपरा की आत्मा है सारे धर्मों का सारांश है मानव हो जाना दया, करुणा,सहनशीलता धार्मिक ग्रंथों का सार है |
मुख्य अतिथि वीर बहादुर सिंह पूर्वांचल विश्वविद्यालय की पूर्व कुलपति प्रो.निर्मला मौर्य ने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा अत्यंत विशाल और समृद्ध है यह ज्ञान परंपरा हमें सिखाती है कि संसार में ऐसी कोई वस्तु या ज्ञान नहीं है जिसे मनुष्य तप,साधना और निरंतर प्रयास से प्राप्त न कर सके | ज्ञान स्वयं में एक तप है आज के युग में भारतीय ज्ञान परंपरा को सीमाओं में बांधना संभव नहीं है | भारतीय ज्ञान परंपरा वेदों,उपनिषदों और पुराणों से लेकर आज तक निरंतर प्रवाहित होती आ रही है यह बहुआयामी और समावेशी है |
तकनीकी सत्र की अध्यक्षता करते हिन्दी विभाग रांची विश्विद्यालय झारखंड के पूर्व अध्यक्ष प्रो.जंग बहादुर पांडेय ने कहा कि प्रगति के लिए आचरण बहुत जरूरी है | भारतीय ज्ञान परंपरा के दो पद ज्यादा समझदारी व जानकारी है,भारतीय ज्ञान परंपरा में जानकारी का बोध बहुत जरूरी है | मुख्य अतिथि हिंदी विभाग,गोरखपुर विश्वविद्यालय के अध्यक्ष प्रो.दीपक प्रकाश त्यागी ने कहा कि संत साहित्य और भारतीय ज्ञान परंपरा में शब्द को ब्रह्म का स्थान प्राप्त है | शब्द साधक को प्रजापति कहा गया है किंतु आज शब्दों से हमारी दूरी बढ़ती जा रही है जो एक बड़ी चुनौती है उन्होंने विद्यार्थियों से शब्दों का अध्ययन और ज्ञान अर्जन करने पर विशेष बल दिया |
इंदिरा गांधी राष्ट्रीय जनजातीय विश्वविद्यालय,अमरकंटक,मध्य प्रदेश के मानविकी एवं भाषा संकाय की अध्यक्ष प्रो.रेनू सिंह (ऑनलाइन माध्यम से) ने कहा कि वसुधैव कुटुम्बक की परंपरा रखने वाली परंपरा सांस्कृतिक,सामाजिक व साहित्य की भूमिका हैं | भारतीय चिंतन में ज्ञान का बोध करुणामय व विवेकपूर्ण बनाता है भारतीय ज्ञान परंपरा ज्ञान विज्ञान,कला,सामाजिक साहित्यिक व कई विधा को समाहित करती है भारतीय ज्ञान परंपरा साहित्य के माध्यम से आगे बढ़ती रही हैं |
शशि प्रकाश सिंह एस.जे.आई.,प्रयागराज ने कहा कि समाज सभ्यता व संस्कृति का बोध भाषा से ही होता है | असीमित विस्तार के दौर में हमें उसको व्यापकता पर बात करना चाहिए | भारतीय भाषाएं एक ही परिवार की भाषा है प्रो.श्रद्धानंद ने कहा कि गुरु का काम ही प्रकाश देना है | काशी विद्यापीठ,ज्ञान मण्डल की परंपरा को आगे बढ़ाते हुए भारतीय ज्ञान में वृद्धि कर रहा है गांधी जी की सोच में भी भारतीय ज्ञान के मूलसूत्र स्पष्ट हैं |
डॉ.मनोहर लाल ने अपने संबोधन में विद्यार्थियों को पुस्तकों से अध्ययन करने और पढ़ने की परंपरा अपनाने पर जोर दिया | डॉ.मुंकेश कुमार शुक्ल ने बताया कि किस्से कहानी हमारे चेतना में रहते है उन्होंने यह भी बताया कि नालंदा में 90 लाख लीपिया जला दी गई थी आज अथक प्रयास से ढाई लाख लिपिया पुनः प्राप्त किया गया है |
इस मौके पर प्रो.श्रद्धा सिंह एवं डॉ.हिमांशु शेखर सिंह की पुस्तक ‘स्त्री-चेतना एवं भारतीय मुख्य,कुछ राग-कुछ रंग’ का विमोचन भी हुआ | दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी के चार तकनीकी सत्रों में देशभर के प्राध्यापकगण एवं शोधार्थियों ने 80 से ज्यादा शोध पत्र प्रस्तुत किया | कार्यक्रम में भारत के 22 राज्य के प्रतिनिधियों ने प्रतिभाग एवं शोध पत्रों का वाचन किया |
संगोष्ठी में प्रो.सुमन जैन,डॉ.दयानन्द,डॉ. नागेंद्र पाठक,डॉ.शिवजी सिंह,डॉ.आशा यादव,डॉ.धीरेन्द्र राय आदि ने अपना विचार व्यक्त किया | प्रो.श्रद्धा सिंह ने दो दिवसीय संगोष्ठी की रिपोर्ट प्रस्तुत कीं | स्वागत डॉ.हिमांशु शेखर सिंह,संचालन डॉ.राहुल अवस्थी एवं धन्यवाद ज्ञापन महामना मदन मोहन मालवीय हिन्दी पत्रकारिता संस्थान के निदेशक डॉ.नागेन्द्र कुमार सिंह ने किया |
इस अवसर पर डॉ.संतोष मिश्र,डॉ.जय प्रकाश श्रीवास्तव,डॉ.सुधांशु शेखर सिंह, डॉ.प्रभा शंकर मिश्र,डॉ.श्रीराम त्रिपाठी, डॉ.वैष्णवी शुक्ला,डॉ.अजय वर्मा,डॉ. चन्द्रशील पाण्डेय,खुश्बू सिंह,गुरू प्रकाश सिंह,गणेश राय,देवेन्द्र गिरि,सपना,डॉली, पुलकित,मनीष,समर,स्तुति,वंशिका, दिशान,जूली,शाजिया,अनुष्का,जाह्नवी,
श्रेया,रिद्धि सहित इत्यादि उपस्थित रहे ||






