पीएम के संसदीय क्षेत्र में ‘स्मार्ट भ्रष्टाचार’ का आरोप

वाराणसी बिजली विभाग में तबादलों की खुली बोली?
वाराणसी | 02 जनवरी
प्रधानमंत्री के संसदीय क्षेत्र वाराणसी में जहाँ एक ओर ‘स्मार्ट सिटी’ और पारदर्शी शासन के दावे किए जा रहे हैं, वहीं दूसरी ओर पूर्वांचल विद्युत वितरण निगम (PVVNL) में तबादला-पोस्टिंग को लेकर गंभीर आरोप सामने आ रहे हैं।
सूत्रों के अनुसार, सहायक अभियंताओं (AE) के प्रमोशन के बाद खाली हुए पदों पर तैनाती के लिए पैसे लेकर पोस्टिंग का कथित खेल चल रहा है।
कहाँ से उठा सवाल?
बीते दिनों PVVNL में प्रमोशन के बाद बड़ी संख्या में AE पद रिक्त हुए। इसके तुरंत बाद विभागीय गलियारों में यह चर्चा तेज हो गई कि—
“वाराणसी ग्रामीण मंडल में पोस्टिंग के लिए 5 से 6 लाख रुपये तक की बोली लग रही है।”
यहीं से जन्म लेता है सवाल—
क्या बिजली विभाग में ‘प्रीमियम काउंटर’ सच में खुल चुका है?
कौन है आरोपों के केंद्र में?
इस पूरे मामले में उभरकर सामने आता है नाम—
राकेश पांडेय
मुख्य अभियंता, वाराणसी जोन-प्रथम
सूत्रों का दावा है कि:
- अरविंद नायक के तबादले के बाद
- वाराणसी जोन में तबादलों की निर्णायक भूमिका
- मुख्य अभियंता राकेश पांडेय के हाथों में केंद्रित हो गई है
हालाँकि, अब तक राकेश पांडेय की ओर से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।
मुख्य अभियंता कार्यालय बना ‘मंडी’?
विभागीय सूत्र बताते हैं कि—
- बीते कुछ दिनों में
- मुख्य अभियंता कार्यालय में
- सामान्य कामकाज से अधिक
- “पोस्टिंग चाहने वाले अभियंताओं” की आवाजाही बढ़ी है
इसी आधार पर इसे “इंजीनियरों की मंडी” कहा जाने लगा है।
⚠️ महत्वपूर्ण तथ्य
अब तक:
- कोई ऑडियो/वीडियो प्रमाण
- कोई लिखित शिकायत
- कोई विजिलेंस ट्रैप
सार्वजनिक नहीं हुआ है।
ग्रामीण मंडल ही क्यों सबसे महंगा?
सूत्रों का कहना है कि ग्रामीण क्षेत्रों की पोस्टिंग को “कमाऊ” माना जाता है, क्योंकि—
- लाइन लॉस
- बकाया वसूली
- ठेकेदारी कार्य
- मीटरिंग और मेंटेनेंस
इन सभी में अनियमितताओं की संभावना बताई जाती है।
इसी कारण ग्रामीण मंडल की पोस्टिंग को सबसे “महंगा” बताया जा रहा है।
शासन और UPPCL की चुप्पी
सबसे बड़ा सवाल यह है कि—
- इतने गंभीर आरोपों के बावजूद
- न तो डिस्कॉम मुख्यालय की ओर से
- न ही शासन स्तर से
कोई स्पष्टीकरण या जांच आदेश सामने आया है।
क्या यह चुप्पी—
- आरोपों की अनदेखी है?
- या फिर किसी बड़े खुलासे से पहले की खामोशी?
कानूनी कसौटी पर आरोप*
यदि ये आरोप सत्य सिद्ध होते हैं, तो यह मामला सीधे तौर पर जुड़ता है—
.भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988
.सरकारी सेवा नियमावली
.IPC की गंभीर धाराओं से
लेकिन कानून की नजर में
आरोप तभी अपराध बनते हैं, जब शिकायत और प्रमाण सामने आएँ।
~खोजी पत्रकारिता के स्तर पर यह सवाल उठता है—~
- क्या पिछले 6–12 महीनों के तबादलों का ~ऑडिट~ होगा?
- क्या पोस्टिंग प्रक्रिया की ~सूची सार्वजनिक~ की जाएगी?
- क्या विजिलेंस या ऊर्जा विभाग ~स्वतंत्र जांच~ शुरू करेगा?
- क्या कोई अभियंता सामने आकर लिखित शिकायत देगा?
~निष्कर्ष~
यह रिपोर्ट किसी को दोषी ठहराने का दावा नहीं करती, लेकिन यह जरूर बताती है कि—
प्रधानमंत्री के संसदीय क्षेत्र में बिजली विभाग से जुड़े ये आरोप साधारण नहीं हैं।
या तो—
ये आरोप पूरी तरह निराधार हैं, और तत्काल खंडन होना चाहिए
या फिर—
यह प्रशासनिक व्यवस्था में गहरे बैठे भ्रष्टाचार की ओर इशारा करता है
सच क्या है, यह सिर्फ स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच ही बता सकती है।





